बिहार म्यूजियम में सजेगा मिथिला की कला का ‘महाकुंभ’: दीवारों से निकलकर वैश्विक कैनवास तक पहुँची कला की लगेगी प्रदर्शनी; जगदंबा देवी की कालजयी कृतियां होंगी आकर्षण का केंद्र

पटना। बिहार की सांस्कृतिक आत्मा कही जाने वाली मिथिला पेंटिंग अब अपने सुदूर इतिहास से निकलकर राजधानी के सबसे आधुनिक गलियारे ‘बिहार म्यूजियम’ की दीवारों पर अपनी चमक बिखेरने को तैयार है। पटना स्थित बिहार संग्रहालय में आगामी 9 मई 2026 से 8 जून 2026 तक मिथिला पेंटिंग की एक विशेष और भव्य प्रदर्शनी का आयोजन किया जा रहा है। यह आयोजन केवल एक कला प्रदर्शनी मात्र नहीं है, बल्कि यह उस सदियों पुरानी परंपरा का दस्तावेजीकरण है जिसने मिथिला की झोपड़ियों से लेकर वाशिंगटन और पेरिस की आर्ट गैलरियों तक का सफर तय किया है। इस प्रदर्शनी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें मिथिला कला की पहली पद्मश्री सम्मानित कलाकार जगदंबा देवी की दुर्लभ कृतियों से लेकर आधुनिक दौर के लगभग 50-60 ख्यातिप्राप्त कलाकारों की पेंटिंग्स को एक छत के नीचे प्रदर्शित किया जाएगा। शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026 को बिहार संग्रहालय प्रशासन द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, इस प्रदर्शनी के माध्यम से मिथिला कला के क्रमिक विकास, इसकी बदलती शैलियों और इसके वैश्विक प्रभाव को दुनिया के सामने नए नजरिए से पेश किया जाएगा।

इतिहास और विरासत का मिलन: जगदंबा देवी की कृतियों का जादुई संसार

​मिथिला पेंटिंग, जिसे दुनिया मधुबनी कला के नाम से भी जानती है, मूलतः एक घरेलू परंपरा थी जिसे महिलाएं शुभ अवसरों पर अपने घरों की दीवारों (कोहबर) पर उकेरा करती थीं। इस प्रदर्शनी में जगदंबा देवी की कृतियों को शामिल करना इसे ऐतिहासिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है। जगदंबा देवी वह पहली कलाकार थीं जिन्होंने इस कला को घर की चौखट से बाहर निकाला और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। उन्हें 1975 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।

​उनकी कला में प्राकृतिक रंगों का जो सूक्ष्म प्रयोग और रेखाओं की जो सघनता देखी जाती है, वह आज के कलाकारों के लिए किसी विश्वविद्यालय से कम नहीं है। प्रदर्शनी में उनके द्वारा बनाई गई उन शुरुआती पेंटिंग्स को भी रखा जाएगा जब मिथिला कला महज कच्ची दीवारों पर मिट्टी और वनस्पति रंगों से खिलती थी। इसके साथ ही, लगभग 60 अन्य कलाकारों की कृतियां यह दर्शाएंगी कि कैसे एक ही कला रूप में अलग-अलग हाथों ने अपनी-अपनी कल्पनाओं के रंग भरे हैं।

10 मई का विशेष व्याख्यान: कला के विकासवादी सफर पर मंथन

​प्रदर्शनी के दूसरे ही दिन, यानी 10 मई 2026 को बिहार म्यूजियम में एक विशेष व्याख्यान (Lecture) का आयोजन किया जाएगा। यह व्याख्यान कला प्रेमियों, शोधकर्ताओं और छात्रों के लिए ज्ञान का एक बड़ा स्रोत साबित होगा। इस सत्र में मिथिला पेंटिंग के विशेषज्ञ और देश के जाने-माने कला समीक्षक इस बात पर गहन चर्चा करेंगे कि आजादी के बाद से लेकर आज यानी 2026 तक इस कला ने कितने रूप बदले हैं।

​व्याख्यान के दौरान निम्नलिखित बिंदुओं पर विशेष ध्यान दिया जाएगा:

  • शैलियों का बदलाव: कोहबर और अरिपन से शुरू होकर कैसे यह कला तांत्रिक, कचनी और भरनी जैसी शैलियों में विकसित हुई।
  • रंगों का विज्ञान: प्राकृतिक रंगों (जैसे हल्दी, नील, और फूलों के रस) से आधुनिक एक्रेलिक रंगों तक का सफर।
  • विषय वस्तु: धार्मिक और पौराणिक कथाओं (राम-सीता विवाह, राधा-कृष्ण) से निकलकर कैसे आज की पेंटिंग सामाजिक मुद्दों, पर्यावरण और समकालीन जीवन को दर्शा रही है।
  • प्रस्तुति का स्तर: दीवारों (भित्ति चित्र) से कागज, कैनवास और फिर डिजिटल प्लेटफार्म तक का विस्तार।

मनीषा झा की क्यूरेटरशिप: एक विशेषज्ञ की दृष्टि

​इस भव्य कार्यक्रम की जिम्मेदारी प्रसिद्ध मिथिला कलाकार और नेशनल अवार्डी मनीषा झा को सौंपी गई है, जो इस प्रदर्शनी की क्यूरेटर हैं। मनीषा झा स्वयं इस कला की बारीकियों को समझती हैं और उन्होंने वैश्विक स्तर पर मिथिला कला के संवर्धन के लिए काम किया है। एक कलाकार के तौर पर उनकी दृष्टि यह सुनिश्चित करेगी कि प्रदर्शनी में केवल वही कृतियां शामिल हों जो मिथिला की मौलिकता को बनाए रखते हुए आधुनिकता का प्रतिनिधित्व करती हों।

​बिहार संग्रहालय के अपर निदेशक अशोक कुमार सिन्हा ने इस पहल पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बिहार म्यूजियम पहली बार इस तरह की व्यापक प्रदर्शनी आयोजित कर रहा है। उनका मानना है कि इस तरह के प्रयासों से लोगों को यह समझने में मदद मिलेगी कि मिथिला कला कितनी समृद्ध है और इसे संरक्षित करना क्यों जरूरी है। उन्होंने जोर दिया कि यह प्रदर्शनी नई पीढ़ी के लिए अपनी जड़ों से जुड़ने का एक माध्यम बनेगी।

दीवारों से बोतलों तक: मिथिला कला का ‘कमर्शियल अवतार’

​अशोक कुमार सिन्हा ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण राजनैतिक और आर्थिक बदलाव की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि मिथिला कला का सबसे बड़ा रूपांतरण यह है कि यह अब केवल दीवारों की शोभा नहीं रह गई है। आज यह कला हमारे दैनिक जीवन की रोजमर्रा की चीजों पर उतर आई है।

​”यह हमारे लिए एक बड़ी उपलब्धि है कि मिथिला की रेखाएं अब बोतल, साड़ी, शॉल, डायरी, कलम और यहां तक कि जूतों और मोबाइल कवर पर भी नजर आती हैं। यही कारण है कि आज विदेशों से भी इन उत्पादों के लिए भारी संख्या में ऑर्डर आ रहे हैं।” — अशोक कुमार सिन्हा, अपर निदेशक, बिहार संग्रहालय

 

​व्यावसायिक स्तर पर इस कला को बढ़ावा देने के लिए बिहार संग्रहालय की सोविनियर शॉप (Souvenir Shop) में भी मिथिला कला के विभिन्न उत्पादों की बिक्री की जा रही है। इससे न केवल कलाकारों को आर्थिक संबल मिल रहा है, बल्कि पर्यटकों के माध्यम से यह कला दुनिया के हर कोने तक पहुँच रही है। यह प्रदर्शनी यह भी दिखाएगी कि कैसे एक पारंपरिक लोक कला ने अपनी शुद्धता खोए बिना खुद को बाजार की मांग के अनुरूप ढाला है।

संतुलित विकास: परंपरा और आधुनिकता के बीच का सेतु

​मिथिला पेंटिंग के इतिहास पर नजर डालें तो 1960 के दशक में आए भीषण अकाल के बाद इस कला ने एक नया मोड़ लिया था। तब सरकार ने महिलाओं को रोजगार देने के उद्देश्य से इस कला को कागज पर उतारने के लिए प्रेरित किया था। आज, साल 2026 में, यह कला एक पूर्ण उद्योग बन चुकी है। बिहार म्यूजियम की यह प्रदर्शनी इस बात का संतुलित विश्लेषण पेश करेगी कि क्या व्यावसायिकता की दौड़ में इस कला की मौलिकता कम हुई है या फिर इसने एक नई पहचान पाई है।

​प्रदर्शनी में शामिल किए जा रहे नामचीन और प्रतिष्ठित कलाकारों की उत्कृष्ट कृतियां यह साबित करेंगी कि तकनीक बदल सकती है, लेकिन मिथिला की उन रेखाओं में जो ‘अंग’ (अंगिका-मैथिली संस्कृति) की सुगंध है, वह आज भी बरकरार है। यहाँ प्रदर्शित होने वाले चित्र यह बताएंगे कि कैसे एक कलाकार की कूची जलवायु परिवर्तन से लेकर महिला सशक्तिकरण तक के विषयों को अपनी पारंपरिक शैली में पिरो सकती है।

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