
भागलपुर। बिहार के भागलपुर जिले में पत्रकारिता की आड़ में रंगदारी मांगने के चर्चित मामले में कानूनी प्रक्रिया ने एक नया मोड़ ले लिया है। जोगसर थाना क्षेत्र के ‘रॉयल 2.0’ रेस्टोरेंट में घुसकर संचालक को धमकाने और मासिक उगाही की मांग करने के मामले में गिरफ्तार किए गए पाँचों आरोपितों को न्यायालय से जमानत (Bail) मिल गई है। न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद इन आरोपितों की रिहाई का रास्ता साफ हो गया। मानिक सरकार चौक स्थित रेस्टोरेंट के मालिक अभिषेक कुमार की लिखित शिकायत पर पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए इन कथित मीडियाकर्मियों को रंगे हाथ दबोचने का दावा किया था। हालांकि, अब आरोपितों ने बाहर आते ही पुलिसिया कार्रवाई पर सवाल खड़े कर दिए हैं और इसे एक सोची-समझी साजिश करार दिया है। इस घटना ने एक तरफ जहाँ व्यापारियों की सुरक्षा पर सवाल खड़े किए हैं, वहीं दूसरी तरफ लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की आड़ में चल रहे ‘सिंडिकेट’ की ओर भी इशारा किया है।
रंगदारी का हाई-वोल्टेज ड्रामा: आरोपितों की गिरफ्तारी की पृष्ठभूमि
इस मामले की जड़ें गुरुवार की उस घटना में छिपी हैं, जिसने पूरे भागलपुर शहर को हैरत में डाल दिया था। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, मानिक सरकार चौक स्थित रेस्टोरेंट ‘रॉयल 2.0’ के संचालक अभिषेक कुमार ने आरोप लगाया था कि आरोपितों का एक समूह, जिसमें पुरुष और महिलाएं शामिल थीं, अचानक उनके प्रतिष्ठान में दाखिल हुआ। इन लोगों के हाथों में अलग-अलग मीडिया संस्थानों के माइक और आईडी कार्ड थे।
प्राथमिकी के अनुसार, इन आरोपितों ने खुद को प्रभावशाली पत्रकार बताते हुए रेस्टोरेंट में छापेमारी जैसा माहौल बना दिया। उन्होंने संचालक पर अवैध तरीके से व्यवसाय चलाने का आरोप लगाया और रेस्टोरेंट की वीडियो रिकॉर्डिंग शुरू कर दी। डराने-धमकाने के बाद, आरोपितों ने कथित तौर पर रेस्टोरेंट को बिना किसी प्रशासनिक अड़चन के चलाने के बदले प्रति माह 1 लाख रुपये की रंगदारी (Monthly Extortion) मांगी थी। इसी शिकायत के आधार पर जोगसर थाना पुलिस ने मौके पर पहुँचकर घेराबंदी की और पाँच आरोपितों को गिरफ्तार किया था।
न्यायालय से मिली राहत: जमानत और आरोपितों का तर्क
जेल भेजे जाने के महज 48 घंटों के भीतर इन आरोपितों को कोर्ट से जमानत मिलना चर्चा का विषय बना हुआ है। आरोपितों के वकीलों ने न्यायालय में दलील दी कि उनके मुवक्किल केवल अपना पत्रकारिता का दायित्व निभा रहे थे और किसी भी प्रकार की अवैध राशि की मांग नहीं की गई थी। बचाव पक्ष का तर्क था कि पुलिस ने बिना पर्याप्त तकनीकी साक्ष्य (जैसे जबरन वसूली की कोई ऑडियो या वीडियो रिकॉर्डिंग) के ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
जमानत मिलने के बाद बाहर आए आरोपितों— जिनमें गौतम सुमन गर्जना, अरविन्द कुमार, अजय कुमार, संजीव मिश्रा और मो. शमीदुल्लाह शामिल हैं— सबने कहा कि वे रेस्टोरेंट में हो रही कुछ अनियमितताओं की खबर कवर करने गए थे, जिससे संचालक घबरा गया और उसने पुलिस के साथ मिलकर उन्हें फंसाने के लिए रंगदारी का झूठा मामला दर्ज करा दिया। उन्होंने इसे प्रेस की आजादी पर हमला बताते हुए कहा कि वे इस साजिश के खिलाफ उच्च अधिकारियों से न्याय की गुहार लगाएंगे।
भीखनपुर कांड और आरोपितों का ‘पुराना रिकॉर्ड’
भले ही इन पाँचों आरोपितों को वर्तमान मामले में जमानत मिल गई हो, लेकिन पुलिस का दावा है कि यह एक पेशेवर गिरोह है जो लंबे समय से शहर के व्यापारियों को सॉफ्ट टारगेट बना रहा था। दर्ज प्राथमिकी में पुलिस ने एक अन्य महत्वपूर्ण घटना का जिक्र किया है। आरोप है कि इसी गिरोह ने 31 मार्च को तिलकामांझी थाना क्षेत्र के भीखनपुर स्थित एक अन्य रेस्टोरेंट संचालक को डरा-धमकाकर 70 हजार रुपये की वसूली की थी।
पुलिस का अनुसंधान यह भी बताता है कि इन आरोपितों के निशाने पर मुख्य रूप से नए खुलने वाले रेस्टोरेंट, होटल और क्लीनिक होते थे। आरोपितों का तरीका यह था कि वे पहले खामियां निकालते थे और फिर खबर प्रकाशित करने या प्रशासन को शिकायत करने की धमकी देकर ‘मंथली’ सेट करने का दबाव बनाते थे। पुलिस अब भी उन दो लड़कियों (आरोपितों) की तलाश कर रही है जो घटना के समय गिरोह के साथ थीं और फिलहाल फरार चल रही हैं।
पुलिस की चुनौती: साक्ष्यों का मिलान और क्रेडेंशियल की जांच
एसएसपी भागलपुर के निर्देश पर अब पुलिस इस मामले में ‘वाटरटाइट’ चार्जशीट तैयार करने की कोशिश में है। आरोपितों को जमानत मिलने के बाद पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या साक्ष्य संकलन में कोई कमी रह गई?
- संस्थानों की वास्तविकता: पुलिस अब उन मीडिया संस्थानों के दस्तावेजों की जांच कर रही है जिनके नाम पर ये आरोपित कार्ड लहरा रहे थे। क्या वे संस्थान पंजीकृत हैं? क्या आरोपितों के पास उनके संपादक द्वारा जारी वैध नियुक्ति पत्र थे?
- डिजिटल फुटप्रिंट: आरोपितों के मोबाइल फोन जब्त किए गए हैं, जिनकी फॉरेंसिक जांच से यह पता चलेगा कि क्या वे वास्तव में पत्रकारिता कर रहे थे या व्हाट्सएप समूहों के जरिए व्यापारियों की सूची बनाकर वसूली की योजना बना रहे थे।
- गवाहों के बयान: रेस्टोरेंट में उस वक्त मौजूद ग्राहकों और कर्मचारियों के बयान इस केस में निर्णायक साबित होंगे। आरोपितों के खिलाफ गवाहों का मुकर जाना पुलिस के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी।
पत्रकारिता की साख और व्यापारियों का खौफ
भागलपुर की यह घटना समाज के लिए एक चेतावनी है। एक तरफ असली पत्रकार हैं जो अपनी जान जोखिम में डालकर सच सामने लाते हैं, और दूसरी तरफ ऐसे आरोपित हैं जो ‘फोर्थ एस्टेट’ के नाम का दुरुपयोग कर धन उगाही कर रहे हैं। इस घटना के बाद भागलपुर के रेस्टोरेंट और होटल एसोसिएशन ने चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि अगर इस तरह के आरोपितों को सजा नहीं मिली, तो भविष्य में कोई भी एरा-गैरा व्यक्ति माइक उठाकर रंगदारी मांगने पहुँच जाएगा।
व्यापारियों का कहना है कि वे नियम-कानून का पालन करते हैं, लेकिन ‘ब्लैकमेलिंग’ की इस संस्कृति से वे भयभीत हैं। आरोपितों को जमानत मिलने से व्यापारी वर्ग में यह संदेश गया है कि शायद कानून के हाथ इन रसूखदार ‘फर्जी पत्रकारों’ तक पहुँचने में ढीले पड़ रहे हैं। वहीं, आरोपितों का दावा है कि यह व्यापारियों और पुलिस का एक ‘नेक्सस’ है जो उन लोगों को दबाना चाहता है जो उनकी अनियमितताओं को उजागर करते हैं।


