​भागलपुर में सुशासन की नई दस्तक: ‘सबका सम्मान- जीवन आसान’ के तहत समस्याओं का समाधान; अपर समाहर्ता ने सुनीं 35 फरियादें

भागलपुर। बिहार की विकास यात्रा में ‘7 निश्चय’ की भूमिका हमेशा से आधार स्तंभ रही है। अब इसी कड़ी को और विस्तार देते हुए 7 निश्चय 3: बढ़ेगा अपना बिहार के संकल्प को धरातल पर उतारने की प्रक्रिया तेज हो गई है। शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026 को भागलपुर जिले में प्रशासनिक जवाबदेही और जन-सरोकार का एक नया अध्याय देखने को मिला। मुख्यमंत्री के विजन ‘सबका सम्मान- जीवन आसान’ (Ease of Living) के अंतर्गत भागलपुर के समीक्षा भवन में एक विशेष जन-सुनवाई का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य सरकारी तंत्र और आम जनता के बीच की दूरी को कम करना और उन जटिल समस्याओं का त्वरित समाधान निकालना था जो अक्सर फाइलों के बोझ तले दबी रह जाती हैं। अपर समाहर्ता दिनेश राम ने स्वयं कमान संभालते हुए लगभग 35 आम जनों के आवेदनों पर गहन सुनवाई की। यह सुनवाई केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि प्रशासनिक संवेदनशीलता का वह प्रमाण थी जहाँ जनता को न केवल अपनी बात कहने का मौका मिला, बल्कि उन्हें सम्मानजनक वातावरण और समाधान का भरोसा भी दिया गया।

समीक्षा भवन में न्याय की चौखट: पेंशन और जमीन विवाद पर जोर

​भागलपुर का समीक्षा भवन आज सुबह से ही उन फरियादियों की उम्मीदों का केंद्र बना रहा जो लंबे समय से सरकारी कार्यालयों के चक्कर काट रहे थे। अपर समाहर्ता दिनेश राम ने बारी-बारी से सभी आवेदकों की समस्याओं को सुना। प्राप्त जानकारी के अनुसार, सुनवाई के दौरान सबसे अधिक मामले लंबित पेंशन और जमीन विवाद से संबंधित थे।

​पेंशन का मुद्दा सीधे तौर पर बुजुर्गों की गरिमा और उनके जीवन यापन से जुड़ा है। कई ऐसे मामले सामने आए जहाँ तकनीकी खामियों या कागजी अड़चनों के कारण वृद्धों की पेंशन रुकी हुई थी। दिनेश राम ने इन फाइलों पर तत्काल संज्ञान लेते हुए संबंधित विभाग के अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि ‘इज ऑफ लिविंग’ का अर्थ तभी सार्थक होगा जब एक बुजुर्ग को अपने हक के लिए भटकना न पड़े। वहीं, जमीन विवाद के मामलों में अक्सर पुलिस और राजस्व विभाग के बीच समन्वय की कमी देखी जाती है। अपर समाहर्ता ने इन विवादों के समाधान के लिए पारदर्शी पैमाइश और दोनों पक्षों की उपस्थिति में त्वरित निष्पादन पर जोर दिया।

विकेंद्रीकृत व्यवस्था: थाने से लेकर अंचल तक सुनवाई का शोर

​’सबका सम्मान- जीवन आसान’ की सबसे बड़ी विशेषता इसकी व्यापकता है। यह कार्यक्रम केवल जिला मुख्यालय तक सीमित नहीं रहा। जिला प्रशासन के निर्देश पर सभी जिला स्तरीय अधिकारियों, प्रखंड विकास पदाधिकारियों (BDO), अंचल अधिकारियों (CO) और थानाध्यक्षों ने अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में जन-सुनवाई की।

​इसका अर्थ यह है कि जो व्यक्ति जिला मुख्यालय तक पहुँचने में असमर्थ था, उसने अपने स्थानीय प्रखंड या थाने में जाकर अपनी शिकायत दर्ज कराई। प्रत्येक विभाग के अधिकारियों ने अपने विभाग से संबंधित विषयों पर जनता की शिकायतों को सुना और उनका पंजीकरण किया। यह विकेंद्रीकृत दृष्टिकोण सुशासन की उस अवधारणा को पुष्ट करता है जहाँ सरकार खुद चलकर जनता के पास जाती है। थानों में भूमि विवाद के बढ़ते मामलों को देखते हुए थानाध्यक्षों को विशेष रूप से निर्देशित किया गया कि वे मामलों को केवल उलझाएं नहीं, बल्कि कानून सम्मत तरीके से उनका अंत करें।

पंजीकरण और पारदर्शिता: अधिकार के साथ मिली रसीद

​अक्सर सरकारी दफ्तरों में आम आदमी की सबसे बड़ी शिकायत यह होती है कि उनकी अर्जी कहाँ गई और उस पर क्या कार्रवाई हुई, इसका कोई पता नहीं चलता। इस समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए ‘सबका सम्मान- जीवन आसान’ कार्यक्रम में एक व्यवस्थित प्रोटोकॉल का पालन किया गया।

​सुनवाई के दौरान पहुँचने वाले हर आवेदक की शिकायत का डिजिटल और भौतिक रूप से पंजीकरण किया गया। आवेदन जमा करने के तुरंत बाद प्रत्येक नागरिक को एक प्राप्ति रसीद थमाई गई। यह रसीद केवल कागज का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि प्रशासन की ओर से वह जिम्मेदारी है जो आवेदक को यह विश्वास दिलाती है कि उसकी समस्या अब रिकॉर्ड में है और उसका समाधान समयबद्ध तरीके से किया जाएगा। पारदर्शिता की यह पहल जनता के मन में व्यवस्था के प्रति खोया हुआ विश्वास वापस लौटाने की एक कोशिश है।

सुविधाओं का नया मानक: प्यास, विश्राम और गरिमा

​अमूमन सरकारी कार्यालयों में सुनवाई के दौरान लोगों को घंटों कड़ी धूप में या धूल फांकते हुए खड़ा रहना पड़ता था। लेकिन 24 अप्रैल 2026 की इस सुनवाई में भागलपुर प्रशासन ने ‘इज ऑफ लिविंग’ के मानवीय पहलू को भी प्राथमिकता दी। समीक्षा भवन और अन्य सभी अधीनस्थ कार्यालयों में आने वाले फरियादियों के लिए बैठने की समुचित व्यवस्था की गई थी।

​प्रशासन ने यह सुनिश्चित किया कि शिकायतों की भीड़ में कोई नागरिक प्यासा न रहे, इसके लिए शुद्ध पेयजल की व्यवस्था की गई थी। साथ ही, कार्यालयों के समीप शौचालय की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई। बुनियादी सुविधाओं का यह स्तर यह संदेश देता है कि शिकायतकर्ता कोई ‘याचक’ नहीं, बल्कि राज्य का सम्मानित नागरिक है। जब प्रशासन जनता को बैठने की जगह और पानी देता है, तो वह उनके ‘सम्मान’ की रक्षा करता है, जो इस अभियान का मूल नारा है।

7 निश्चय 3: बढ़ेगा अपना बिहार और भविष्य की राह

​मुख्यमंत्री के 7 निश्चय 3 के तहत ‘सबका सम्मान- जीवन आसान’ अभियान को बिहार के भविष्य के लिए एक ‘ब्लूप्रिंट’ माना जा रहा है। इसका उद्देश्य केवल समस्याओं का निपटारा करना नहीं है, बल्कि एक ऐसी कार्यसंस्कृति विकसित करना है जहाँ बाबूगिरी और लालफीताशाही के लिए कोई जगह न हो। भागलपुर में अपर समाहर्ता दिनेश राम की सक्रियता ने अन्य अधिकारियों के लिए एक मानक स्थापित किया है।

​विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसी तरह हर सप्ताह या पाक्षिक रूप से ब्लॉक और पंचायत स्तर पर सुनवाई हो, तो अदालतों पर बोझ कम होगा और ग्रामीण समाज में व्याप्त छोटे-छोटे विवाद हिंसक रूप नहीं लेंगे। भागलपुर प्रशासन की यह मुस्तैदी दर्शाती है कि ‘इज ऑफ लिविंग’ केवल कागजों पर लिखी जाने वाली शब्दावली नहीं है, बल्कि यह प्याऊ, रसीद, कुर्सी और त्वरित न्याय का एक सामूहिक पैकेज है।

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