
पटना। बिहार की राजनीति में जब भी शक्ति परीक्षण का समय आता है, तो सदन के भीतर की कार्यवाही जितनी महत्वपूर्ण होती है, सदन के बाहर के गलियारों में चलने वाली जुबानी जंग भी उतनी ही सुर्खियां बटोरती है। शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026 की सुबह बिहार विधानसभा के बाहर का नजारा कुछ ऐसा ही था, जहाँ एनडीए सरकार के विश्वास प्रस्ताव (Floor Test) से पहले राजनैतिक तापमान अपने चरम पर था। इस गहमागहमी के बीच जब मोकामा के पूर्व विधायक और ‘छोटे सरकार’ के नाम से चर्चित अनंत सिंह का काफिला विधानसभा परिसर पहुँचा, तो मीडिया कर्मियों का जमावड़ा उनकी ओर दौड़ पड़ा। मौका था राजनैतिक शक्ति प्रदर्शन का, और सवाल था विपक्ष की उस रणनीति का जिसका दावा तेजस्वी यादव पिछले कई दिनों से कर रहे थे। अपनी चिर-परिचित बेबाकी और ठेठ अंदाज के लिए मशहूर अनंत सिंह ने एक बार फिर ऐसा बयान दिया जिसने राजनैतिक हलकों में हलचल मचा दी। उन्होंने सीधे तौर पर नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव को चुनौती देते हुए कहा, “तेजस्वी क्या उखाड़ेंगे, हम भी देखते हैं।” उनके इस एक वाक्य ने न केवल सत्ता पक्ष के आत्मविश्वास को दर्शाया, बल्कि विपक्ष के “खेला होने” वाले दावों की हवा निकालने की भी कोशिश की।
विधानसभा गेट पर ‘छोटे सरकार’ का अंदाज: जब कैमरे और सवालों ने घेरा
विधानसभा की कार्यवाही शुरू होने से ठीक पहले जब मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी बहुमत साबित करने की तैयारी कर रहे थे, तभी अनंत सिंह की गाड़ी विधानसभा के मुख्य द्वार पर रुकी। सुरक्षा घेरे और समर्थकों की भीड़ के बीच जैसे ही वे अपनी गाड़ी से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे, मीडिया के कैमरों ने उन्हें घेर लिया। पत्रकारों का सबसे बड़ा सवाल यही था कि क्या तेजस्वी यादव के पास कोई ऐसा ‘ब्रह्मास्त्र’ है जिससे फ्लोर टेस्ट का नतीजा बदल सकता है?
अनंत सिंह ने बड़ी ही सहजता और चेहरे पर एक फीकी मुस्कान के साथ गाड़ी के भीतर से ही जवाब दिया। उनके शब्दों में आत्मविश्वास कूट-कूट कर भरा था। उन्होंने कहा कि “बिहार में सब ठीक है और एनडीए की सरकार पूरी मजबूती के साथ खड़ी है।” जब उनसे विशेष रूप से तेजस्वी यादव के उस बयान के बारे में पूछा गया जिसमें वे ‘बड़ा खेल’ होने की बात कह रहे थे, तो अनंत सिंह ने तपाक से कहा— “तेजस्वी क्या उखाड़ेंगे, हम भी देखते हैं। उनके पास कुछ नहीं है, सब हवा-हवाई बात है।” यह बयान कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया और एनडीए समर्थकों के लिए एक ‘पंचलाइन’ बन गया।
शक्ति परीक्षण का गणित और अनंत सिंह की भूमिका
अनंत सिंह का यह बयान केवल एक जुबानी हमला नहीं है, बल्कि यह उस जमीनी हकीकत की ओर इशारा करता है जो फ्लोर टेस्ट के समय विधानसभा के भीतर चल रही थी। बिहार में सत्ता परिवर्तन के बाद सम्राट चौधरी की सरकार को अपनी वैधता साबित करने के लिए जादुई आंकड़े की जरूरत थी। अनंत सिंह भले ही कानूनी अड़चनों के कारण सीधे तौर पर सदन के सदस्य न हों, लेकिन उनकी राजनैतिक पकड़ और उनके प्रभाव वाले विधायकों की संख्या आज भी बिहार की राजनीति में एक बड़ा कारक मानी जाती है।
उनके इस बयान का मतलब साफ था कि विपक्ष की ओर से पाला बदलने की जो भी कोशिशें की जा रही थीं, वे कम से कम अनंत सिंह के प्रभाव वाले खेमे में सफल नहीं हो सकीं। “छोटे सरकार” का यह अंदाज बताता है कि एनडीए ने फ्लोर टेस्ट से पहले ही अपनी किलेबंदी इतनी मजबूत कर ली थी कि विपक्ष की हर चाल उन्हें बौनी नजर आ रही थी। उनके बयान ने यह संदेश दिया कि बिहार की राजनीति में अब नंबरों का खेल भाजपा-जदयू गठबंधन के पक्ष में पूरी तरह सेट हो चुका है।
तेजस्वी के ‘खेला’ पर पानी फेरने की कोशिश
पिछले कुछ दिनों से तेजस्वी यादव और राजद के अन्य नेता लगातार यह दावा कर रहे थे कि फ्लोर टेस्ट के दिन कुछ बड़ा होगा और कई विधायक अंतरात्मा की आवाज पर पाला बदल सकते हैं। तेजस्वी ने अपनी सभाओं और प्रेस वार्ताओं में “इलेक्टेड बनाम सिलेक्टेड” का नैरेटिव सेट किया था। लेकिन अनंत सिंह ने इन तमाम दावों को एक ही झटके में खारिज कर दिया।
उनका यह कहना कि “हम भी देखते हैं”, एक तरह से विपक्ष को खुली चुनौती थी कि अगर उनमें दम है तो वे फ्लोर टेस्ट के दौरान अपनी ताकत दिखाकर दिखाएं। अनंत सिंह ने इशारों-इशारों में यह भी कह दिया कि राजनीति केवल बयानों से नहीं चलती, बल्कि उसके लिए विधायकों का साथ होना जरूरी है। उन्होंने तेजस्वी की रणनीति को कमजोर बताते हुए यह संकेत दिया कि राजद के भीतर ही असंतोष की चिंगारी है जिसे तेजस्वी देख नहीं पा रहे हैं।
अनंत सिंह का राजनैतिक रसूख: क्यों अहम है उनका बयान?
बिहार की राजनीति में अनंत सिंह का नाम केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक खास तरह की ‘पावर पॉलिटिक्स’ का प्रतीक है। मोकामा और आसपास के इलाकों में उनकी पकड़ और बाहुबल की चर्चा हमेशा होती रही है। भले ही वे वर्तमान में कई कानूनी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, लेकिन विधानसभा परिसर में उनकी मौजूदगी ही सत्ता पक्ष के लिए मनोबल बढ़ाने वाली होती है।
जब वे “तेजस्वी क्या उखाड़ेंगे” जैसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं, तो वह सीधे तौर पर उस युवा नेतृत्व को चुनौती होती है जो लालू प्रसाद यादव की विरासत को आगे बढ़ा रहा है। यह लालू परिवार और अनंत सिंह के बीच के उस पुराने राजनैतिक समीकरण की भी याद दिलाता है जो कभी करीबी था और अब कट्टर प्रतिद्वंद्विता में तब्दील हो चुका है। अनंत सिंह ने खुद को सम्राट चौधरी की सरकार का मजबूत स्तंभ साबित करने की कोशिश की है और यह दिखाया है कि वे कठिन समय में एनडीए के साथ चट्टान की तरह खड़े हैं।
विधानसभा के भीतर का माहौल और बाहर की गूँज
एक तरफ जहाँ सदन के भीतर तेजस्वी यादव अपनी ओजस्वी वाणी से सरकार को घेर रहे थे और उसे “सिलेक्टेड सीएम” की सरकार बता रहे थे, वहीं सदन के बाहर अनंत सिंह के बयान ने राजनैतिक हवा का रुख सत्ता पक्ष की ओर मोड़ने का काम किया। विधानसभा की कार्यवाही के दौरान भी कई विधायक इस बयान की चर्चा करते दिखे।
भाजपा और जदयू के नेताओं के लिए अनंत सिंह का यह बयान एक सुरक्षा कवच की तरह काम कर रहा था। उन्हें लग रहा था कि जब “छोटे सरकार” जैसे जमीनी नेता इतने आश्वस्त हैं, तो फिर घबराने की कोई बात नहीं है। यह बिहार की राजनीति की एक अनोखी विशेषता है जहाँ बड़े-बड़े राजनैतिक सिद्धांतों पर अक्सर ऐसे ‘बेबाक और देसी’ बयान भारी पड़ जाते हैं। अनंत सिंह ने स्पष्ट कर दिया कि बिहार की सत्ता का रास्ता अब बयानों से नहीं बल्कि ठोस संख्या बल से तय होगा, और वह संख्या बल फिलहाल मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के पास है।


