जमुई में सिस्टम की संवेदनहीनता: एम्बुलेंस का तेल खत्म होने से बुजुर्ग ने तड़पकर तोड़ा दम; स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल

जमुई। बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार के बड़े-बड़े दावों के बीच जमुई जिले से एक ऐसी हृदयविदारक घटना सामने आई है, जिसने पूरे राज्य के प्रशासनिक और स्वास्थ्य महकमे को कटघरे में खड़ा कर दिया है। जब एक एम्बुलेंस, जिसे ‘जीवनदायिनी’ माना जाता है, केवल चंद लीटर ईंधन की कमी के कारण ‘यमराज की सवारी’ बन जाए, तो समझा जा सकता है कि आम आदमी के जीवन की कीमत सिस्टम की नजर में क्या है। जमुई जिले के झाझा प्रखंड के बाबुबांक निवासी 70 वर्षीय बुजुर्ग धीरज रविदास की मौत केवल बीमारी से नहीं, बल्कि उस अपराधिक लापरवाही से हुई है जिसने उन्हें सही समय पर अस्पताल पहुँचने से रोक दिया। गुरुवार, 23 अप्रैल 2026 की रात जब बुजुर्ग को बेहतर इलाज के लिए पटना ले जाया जा रहा था, तभी सिकन्दरा के पास एम्बुलेंस का ईंधन खत्म हो गया। चालक ने बीच सड़क पर वाहन खड़ा कर दिया और करीब ढाई घंटे तक तड़पते मरीज को बचाने के बजाय ईंधन का इंतजार किया गया। अंततः, समय पर इलाज न मिलने के कारण बुजुर्ग ने एम्बुलेंस पर ही दम तोड़ दिया। शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026 की सुबह यह मामला तब और गरमा गया जब आक्रोशित परिजनों ने शव के साथ झाझा अस्पताल में जमकर हंगामा किया और स्वास्थ्य विभाग के खिलाफ नारेबाजी की।

मौत का ढाई घंटा: जब सांसें अटकी थीं और एम्बुलेंस खड़ी थी

​जमुई के बाबुबांक गांव के रहने वाले धीरज रविदास की तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें झाझा के स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र लाया गया था। वहां प्राथमिक उपचार के बाद डॉक्टरों ने उनकी गंभीर स्थिति को देखते हुए बेहतर इलाज के लिए राजधानी पटना रेफर कर दिया। परिजनों ने बड़ी उम्मीद के साथ सरकारी एम्बुलेंस का सहारा लिया ताकि बिना किसी देरी के मरीज को बड़े अस्पताल पहुँचाया जा सके। लेकिन नियति और विभाग की लापरवाही को कुछ और ही मंजूर था।

​मृतक के पुत्र ने जो आपबीती सुनाई है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाली है। उनके अनुसार, एम्बुलेंस झाझा से निकली ही थी कि सिकन्दरा के समीप पहुँचते ही वाहन ने हिचकोले खाने शुरू कर दिए। चालक ने अचानक ब्रेक लगाया और यह कहकर हाथ खड़े कर दिए कि “एम्बुलेंस में तेल खत्म हो गया है।” यह सुनकर परिजनों के पैरों तले जमीन खिसक गई। एक तरफ बुजुर्ग धीरज रविदास की सांसें उखड़ रही थीं और दूसरी तरफ एम्बुलेंस बीच सड़क पर बेजान खड़ी थी। परिजनों ने चालक से मिन्नतें कीं, गुहार लगाई कि किसी तरह व्यवस्था की जाए, लेकिन चालक ने कथित तौर पर वाहन को करीब दो से ढाई घंटे तक वहीं खड़ा रखा। एक-एक पल कीमती था, लेकिन सिस्टम की अकर्मण्यता ने उन कीमती घंटों को बर्बाद कर दिया। जब तक ईंधन की व्यवस्था होती और एम्बुलेंस आगे बढ़ती, तब तक धीरज रविदास का शरीर ठंडा पड़ चुका था। उन्होंने एम्बुलेंस के भीतर ही अंतिम सांस ली।

झाझा अस्पताल में हंगामा: “लापरवाही नहीं, यह हत्या है”

​बुजुर्ग की मौत के बाद परिजनों का सब्र टूट गया। शुक्रवार सुबह वे शव को लेकर वापस झाझा अस्पताल पहुँचे। अस्पताल परिसर देखते ही देखते रणक्षेत्र में तब्दील हो गया। परिजनों और स्थानीय ग्रामीणों ने अस्पताल प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। आक्रोशित लोगों ने अस्पताल के मुख्य द्वार को घेर लिया और स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली के खिलाफ जोरदार नारेबाजी की।

​परिजनों का सीधा आरोप है कि यह मौत प्राकृतिक नहीं, बल्कि स्वास्थ्य विभाग द्वारा की गई हत्या है। उनका सवाल था कि जब किसी मरीज को इतने लंबे सफर (पटना) के लिए रेफर किया जाता है, तो क्या एम्बुलेंस की तकनीकी जांच और ईंधन की उपलब्धता सुनिश्चित करना विभाग की जिम्मेदारी नहीं है? प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि लापरवाह एम्बुलेंस चालक और संबंधित अधिकारियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज किया जाए। हंगामे की सूचना मिलने पर स्थानीय पुलिस मौके पर पहुँची और लोगों को शांत कराने की कोशिश की, लेकिन लोगों का गुस्सा शांत होने का नाम नहीं ले रहा था।

एम्बुलेंस सेवा और तेल का खेल: एक पुराना सिंडिकेट?

​जमुई की यह घटना कोई इकलौती मिसाल नहीं है। बिहार के कई जिलों से अक्सर ऐसी खबरें आती हैं जहाँ एम्बुलेंस सेवा देने वाली एजेंसियां और चालक तेल के पैसे बचाने या फर्जी बिलिंग के चक्कर में मरीजों की जान जोखिम में डालते हैं। एम्बुलेंस में ईंधन का न होना यह दर्शाता है कि:

  • लॉग बुक की हेराफेरी: क्या एम्बुलेंस की लॉग बुक में तेल भरवाने की फर्जी एंट्री की जाती है?
  • रखरखाव का अभाव: रेफरल के समय एम्बुलेंस की ‘चेकलिस्ट’ का पालन क्यों नहीं किया गया?
  • एजेंसी की मनमानी: एम्बुलेंस का संचालन करने वाली आउटसोर्सिंग एजेंसी पर जिला स्वास्थ्य समिति का नियंत्रण कितना है?

​धीरज रविदास के मामले में ढाई घंटे की देरी ‘गोल्डन आवर’ की बर्बादी थी। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, रेफरल के दौरान शुरुआती घंटे सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। अगर ईंधन की कमी के कारण एम्बुलेंस रुकती है, तो यह स्पष्ट रूप से प्रबंधन की विफलता है।

स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोलती ‘रेफरल’ संस्कृति

​बिहार के ग्रामीण इलाकों में ‘रेफरल’ एक ऐसा शब्द बन गया है जो अक्सर मौत का पैगाम लेकर आता है। झाझा जैसे प्रखंडों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है, जिसके कारण हर गंभीर मरीज को पटना या भागलपुर रेफर कर दिया जाता है। लेकिन रेफर करने के बाद की जिम्मेदारी से स्वास्थ्य विभाग पल्ला झाड़ लेता है। जमुई से पटना की दूरी लगभग 160-170 किलोमीटर है। इतने लंबे सफर के लिए भेजी जाने वाली एम्बुलेंस का ईंधन खत्म होना न केवल चालक की लापरवाही है, बल्कि उस पूरे सिस्टम का फेलियर है जो एम्बुलेंस के संचालन की निगरानी करता है।

​धीरज रविदास एक गरीब परिवार से आते थे। उनके बेटे ने रोते हुए कहा कि अगर उनके पास निजी गाड़ी करने के पैसे होते, तो शायद आज उनके पिता जीवित होते। यह विडंबना है कि सरकार मुफ्त एम्बुलेंस सेवा का विज्ञापन तो करती है, लेकिन हकीकत में यह सेवा ‘तेल’ और ‘रखरखाव’ की कमी के कारण दम तोड़ रही है।

जवाबदेही तय करने की मांग: क्या दोषियों पर गिरेगी गाज?

​इस घटना के बाद जमुई के सिविल सर्जन और झाझा अस्पताल के प्रभारी की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। लोगों की मांग है कि:

  1. उच्च स्तरीय जांच: इस मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए कि एम्बुलेंस में तेल क्यों नहीं था।
  2. चालक और एजेंसी पर कार्रवाई: जिस एजेंसी के पास एम्बुलेंस संचालन का ठेका है, उसका लाइसेंस रद्द किया जाए और चालक पर सख्त कानूनी कार्रवाई हो।
  3. मुआवजा: गरीब पीड़ित परिवार को उचित आर्थिक सहायता दी जाए।

​प्रशासन की ओर से फिलहाल औपचारिक जांच का आश्वासन दिया गया है, लेकिन लोगों को डर है कि हर बार की तरह इस बार भी छोटी मछलियों (चालक) पर गाज गिराकर बड़े अधिकारियों को बचा लिया जाएगा।

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