
कोलकाता। भारतीय रेलवे दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्कों में से एक है, लेकिन आधुनिक दौर में इसकी पहचान केवल पटरियों और ट्रेनों तक सीमित नहीं रह गई है। पूर्व रेलवे ने पर्यावरण संरक्षण और ऊर्जा दक्षता के मामले में एक मिसाल पेश की है। बुधवार, 22 अप्रैल 2026 को जारी रिपोर्ट के अनुसार, पूर्व रेलवे अपने पूर्ण विद्युतीकृत नेटवर्क के माध्यम से न केवल यात्रियों और माल की आवाजाही सुनिश्चित कर रहा है, बल्कि कार्बन उत्सर्जन को न्यूनतम स्तर पर लाने में भी सफल रहा है। पर्यावरण की स्थिरता और भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए, रेलवे ने सौर ऊर्जा, पावर फैक्टर सुधार और तकनीकी नवाचारों के जरिए वित्तीय बचत के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। यह रिपोर्ट दर्शाती है कि कैसे तकनीकी दक्षता और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता मिलकर सरकारी खजाने पर पड़ने वाले बोझ को कम कर सकती है।
सौर ऊर्जा: बिजली बिल में भारी कटौती और उत्पादन में वृद्धि
पूर्व रेलवे ने अपनी छतों और खाली पड़ी जमीनों का उपयोग सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए बखूबी किया है। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान रेलवे के सौर ऊर्जा संयंत्रों ने 22.15 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन किया। यदि इसकी तुलना पिछले वित्त वर्ष (2024-25) से की जाए, तो उत्पादन में 3.40% की उल्लेखनीय बढ़त दर्ज की गई है, क्योंकि पिछले वर्ष यह आंकड़ा 21.42 मिलियन यूनिट था।
इस उत्पादन का सीधा सकारात्मक प्रभाव रेलवे के वित्तीय स्वास्थ्य पर पड़ा है। सौर ऊर्जा के उपयोग से होने वाली मौद्रिक बचत में 6.50% का इजाफा हुआ है। वित्त वर्ष 2025-26 में रेलवे ने समतुल्य ऊर्जा बिल के रूप में 12.13 करोड़ रुपये की बचत की है, जबकि पिछले वर्ष यह बचत 11.39 करोड़ रुपये थी। यह आंकड़ा साबित करता है कि अक्षय ऊर्जा में किया गया निवेश अब फल दे रहा है।
पावर फैक्टर प्रबंधन: विद्युत इंजीनियरिंग से करोड़ों की बचत
रेलवे जैसे भारी बिजली खपत वाले संस्थान के लिए ‘पावर फैक्टर’ एक अत्यंत महत्वपूर्ण मापदंड है। पावर फैक्टर जितना बेहतर होता है, बिजली का उपयोग उतना ही कुशल माना जाता है और बिजली बिलों में उतनी ही अधिक रियायत मिलती है। पूर्व रेलवे ने इस तकनीकी मोर्चे पर भी बड़ी सफलता हासिल की है।
विभागीय आंकड़ों के अनुसार, बेहतर पावर फैक्टर प्रबंधन के माध्यम से फरवरी 2026 तक संचयी रूप से 4.40 करोड़ रुपये की बचत दर्ज की गई। केवल मार्च 2026 के महीने में, कर्षण ऊर्जा (Traction Energy) बिल में बेहतर पावर फैक्टर उपयोग के कारण 1.36 करोड़ रुपये की अतिरिक्त बचत हुई है। यह तकनीकी सूझबूझ का ही परिणाम है कि रेलवे कम लागत में अधिक परिचालन क्षमता हासिल कर पा रहा है।
3-फेज लोकोमोटिव: ब्रेक लगाने पर बिजली बनाने की तकनीक
पूर्व रेलवे की सबसे बड़ी तकनीकी उपलब्धियों में से एक 3-फेज इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव का बड़े पैमाने पर उपयोग है। यह लोकोमोटिव ‘रीजेनरेटिव ब्रेकिंग’ (Regenerative Braking) तकनीक पर काम करते हैं। सरल शब्दों में कहें तो, जब ये ट्रेनें ढलान पर चलती हैं या ब्रेक लगाती हैं, तो इनका मोटर जनरेटर की तरह काम करने लगता है और बिजली पैदा करता है, जिसे वापस ओवरहेड तारों (OHE) में भेज दिया जाता है।
मार्च 2026 के आंकड़ों पर नजर डालें तो:
- पूर्व रेलवे में वर्तमान में 508 3-फेज लोकोमोटिव परिचालन में हैं।
- केवल मार्च महीने में ही इस तकनीक से ऊर्जा बिलों में 16.86 करोड़ रुपये की वित्तीय बचत हुई है।
- पूर्व रेलवे में इस माध्यम से औसत मासिक बचत लगभग 14.43 करोड़ रुपये बनी हुई है।
विवरण | मार्च 2026 के आंकड़े |
|---|---|
लोकोमोटिव की संख्या | 508 (3-फेज) |
कुल बचत (मार्च 2026) | ₹16.86 करोड़ |
औसत मासिक बचत | ₹14.43 करोड़ |
डीजल इंजनों पर लगाम: जीवाश्म ईंधन की खपत में कमी
रेलवे नेटवर्क के पूर्ण विद्युतीकरण के बाद अब डीजल इंजनों का उपयोग केवल आपातकालीन या विशिष्ट कार्यों के लिए ही रह गया है। पूर्व रेलवे ने ‘डीजल लोकोमोटिव को जबरन बंद करने’ (Forced Shutdown) की नीति अपनाई है ताकि जब इंजन उपयोग में न हो, तो वह तेल की खपत न करे।
इस प्रभावी कदम के कारण वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान हाई स्पीड डीजल (HSD) तेल की खपत में 3277.26 किलो लीटर की विशाल बचत हुई है। आर्थिक दृष्टि से देखें तो इस बचत का मूल्य 30.56 करोड़ रुपये है। यह न केवल वित्तीय बचत है, बल्कि वातावरण में घुलने वाले जहरीले धुएं और कार्बन फुटप्रिंट को कम करने की दिशा में एक बड़ा प्रहार भी है।
पर्यावरण और अर्थव्यवस्था का संतुलन
पूर्व रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी शिबराम माझि ने इन उपलब्धियों पर संतोष व्यक्त करते हुए कहा कि रेलवे ने ऊर्जा के कुशल उपयोग के लिए जो प्रभावी उपाय अपनाए हैं, उनके परिणाम अब सामने आ रहे हैं। इससे न केवल रेलवे के परिचालन खर्च में कमी आई है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति रेलवे की जिम्मेदारी भी पूरी हो रही है।
आज जब पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग की चुनौतियों से जूझ रही है, तब पूर्व रेलवे का यह ‘ग्रीन मॉडल’ अन्य सरकारी और निजी संस्थानों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। सौर ऊर्जा का दोहन, बिजली की बर्बादी को रोकना और पुरानी डीजल तकनीक से दूरी बनाना—ये तीनों ही घटक भविष्य की हरित रेलवे की नींव रख रहे हैं। वॉयस ऑफ बिहार (VOB) रेलवे के इन प्रयासों की सराहना करता है, जो न केवल हमारे सफर को सुगम बना रहे हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वच्छ और नीला आसमान भी सुनिश्चित कर रहे हैं।


