​पप्पू यादव के बिगड़े बोल: “70% महिलाओं को बेड से होकर राजनीति में आना पड़ता है”; महिला आयोग के नोटिस को रद्दी बताने पर मचा सियासी घमासान

पटना/पूर्णिया। बिहार की राजनीति में अपनी बेबाक और अक्सर विवादित बयानबाजी के लिए मशहूर पूर्णिया सांसद पप्पू यादव ने एक बार फिर ऐसा बयान दिया है जिसने सामाजिक और राजनैतिक हलकों में आग लगा दी है। महिलाओं की गरिमा, कार्यस्थलों पर उनकी सुरक्षा और राजनीति में उनकी भागीदारी को लेकर पप्पू यादव ने जो दावे किए हैं, वे न केवल चौंकाने वाले हैं बल्कि महिला अस्मिता पर गंभीर सवाल भी खड़े करते हैं। पटना में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान पप्पू यादव ने आरोप लगाया कि राजनीति के गलियारों में पहुँचने वाली लगभग 70 प्रतिशत महिलाओं को शोषण के काले रास्तों से गुजरना पड़ता है। उनके इस बयान के बाद महिला आयोग ने कड़ा रुख अपनाते हुए उन्हें नोटिस जारी किया है, लेकिन सांसद ने इस नोटिस को स्वीकार करने के बजाय उसे ‘रद्दी की टोकरी’ के हवाले कर अपनी आक्रामकता और बढ़ा दी है। वॉयस ऑफ बिहार (VOB) की इस विशेष रिपोर्ट में हम विश्लेषण करेंगे कि आखिर पप्पू यादव के इन आरोपों के पीछे की हकीकत क्या है और इसके सामाजिक परिणाम क्या हो सकते हैं।

राजनीति और ‘गिद्ध दृष्टि’: पप्पू यादव का संगीन आरोप

​पप्पू यादव ने अपने संबोधन में राजनैतिक दलों के भीतर महिलाओं की स्थिति का एक अत्यंत वीभत्स चित्रण पेश किया। उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के कहा कि “पॉलिटिकल पार्टी के नेता महिलाओं को गिद्ध दृष्टि से देखते हैं।” सांसद के अनुसार, राजनीति में आगे बढ़ने की चाह रखने वाली 70 प्रतिशत महिलाओं को ‘बेड’ (बिस्तर) के रास्ते से होकर गुजरना पड़ता है। यह बयान उन तमाम महिलाओं के संघर्ष और उनकी योग्यता पर सीधा प्रहार माना जा रहा है जो अपनी काबिलियत के दम पर राजनीति में मुकाम हासिल कर रही हैं।

​पप्पू यादव यहीं नहीं रुके, उन्होंने कुछ अश्लील गानों का जिक्र करते हुए समाज और व्यवस्था पर सवाल दागा। उन्होंने पूछा कि “ये कौन लोग हैं जो इस तरह के अश्लील गानों को प्रमोट कर रहे हैं?” उनके अनुसार, संगीत और कला के नाम पर परोसा जा रहा यह ‘कंटेंट’ समाज की मानसिकता को प्रदूषित कर रहा है, जिसके कारण महिलाओं को एक वस्तु के रूप में देखा जाने लगा है।

हर क्षेत्र में ‘शिकारी’ नजरें: कॉर्पोरेट से लेकर पुलिस तक पर हमला

​सांसद ने केवल राजनीति को ही नहीं, बल्कि समाज के लगभग हर उस क्षेत्र को निशाने पर लिया जहाँ महिलाएं कार्यरत हैं। उनके दावों ने एक ऐसे माहौल का चित्रण किया जहाँ महिलाएं हर कदम पर असुरक्षित हैं:

  • शिक्षा क्षेत्र: पप्पू यादव ने आरोप लगाया कि कई शिक्षकों की कुदृष्टि अपनी ही छात्राओं पर रहती है।
  • कॉर्पोरेट और पुलिस: उन्होंने कहा कि कॉर्पोरेट जगत में काम करने वाली लड़कियों और पुलिस बल में शामिल महिला कर्मियों को भी इसी तरह की ‘गिद्ध दृष्टि’ और शोषण का सामना करना पड़ता है।
  • पटना के हॉस्टल: सबसे गंभीर आरोप उन्होंने राजधानी पटना के हॉस्टल में रहने वाली लड़कियों को लेकर लगाया। उन्होंने दावा किया कि पटना के हॉस्टल्स की लड़कियों को नेताओं के पास ‘परोसा’ जाता है।

​पप्पू यादव ने इस दावे के पीछे एक अखबार में हुए पुराने ‘स्ट्रिंग ऑपरेशन’ का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि अगर ऐसे घिनौने कृत्यों में शामिल लोगों को बेनकाब करने और पीड़ितों को बचाने के लिए उन्हें (पप्पू यादव को) बोलना पड़ेगा, तो वे बोलेंगे और कोई उन्हें रोक नहीं पाएगा।

महिला आयोग को चुनौती: “नोटिस रद्दी की टोकरी में है”

​पप्पू यादव के इन बयानों पर स्वतः संज्ञान लेते हुए महिला आयोग ने उन्हें स्पष्टीकरण के लिए नोटिस भेजा था। लेकिन सांसद का तेवर इस संवैधानिक संस्था के प्रति भी बेहद तल्ख रहा। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि वे ऐसे नोटिस की परवाह नहीं करते।

​पप्पू यादव ने तीखे लहजे में कहा— “जिनके खुद के 10-10 फोटो वायरल हुए हों, वह मुझसे नोटिस मांग रहा है? मैंने ऐसे नोटिस को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया है।” यह बयान न केवल नोटिस देने वाली पदाधिकारी के प्रति व्यक्तिगत हमला है, बल्कि यह महिला आयोग जैसी संस्था की गरिमा को भी चुनौती देता है। पप्पू यादव ने स्पष्ट किया कि वे अपनी बातों पर कायम हैं और किसी भी कानूनी या प्रशासनिक दबाव में झुकने वाले नहीं हैं।

राजनैतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया: आक्रोश की लहर

​पप्पू यादव के इस बयान ने बिहार की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। विभिन्न दलों की महिला नेताओं ने इसे “घोर आपत्तिजनक और महिला विरोधी” करार दिया है। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के सामान्यीकरण (Generalization) से उन महिलाओं का मनोबल गिरता है जो सार्वजनिक जीवन में सुचिता के साथ काम कर रही हैं।

​सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न एक कड़वी सच्चाई हो सकती है, लेकिन इसे ’70 प्रतिशत’ जैसा आंकड़ा देना और सभी नेताओं को एक ही चश्मे से देखना गैर-जिम्मेदाराना है। पप्पू यादव जिस ‘स्ट्रिंग ऑपरेशन’ की बात कर रहे हैं, यदि उसमें कोई सच्चाई है तो उन्हें साक्ष्य के साथ कानूनी लड़ाई लड़नी चाहिए, न कि सार्वजनिक मंचों से ऐसे बयान देने चाहिए जो समाज में वैमनस्य फैलाएं।

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