बिहार की ‘मछली क्रांति’: 39 हजार टन का रिकॉर्ड निर्यात; आत्मनिर्भरता से अंतरराष्ट्रीय बाजार तक का सफर, राष्ट्रीय रैंकिंग में चौथे स्थान पर पहुँचा प्रदेश

पटना। बिहार की आर्थिक और कृषि विकास गाथा में एक नया सुनहरा अध्याय जुड़ गया है। कभी अपनी मछली की जरूरतों के लिए दूसरे राज्यों (विशेषकर आंध्र प्रदेश) पर निर्भर रहने वाला बिहार अब न केवल आत्मनिर्भर हो गया है, बल्कि निर्यात के वैश्विक मानचित्र पर भी तेजी से अपनी पहचान बना रहा है। बुधवार, 22 अप्रैल 2026 को जारी विभागीय आंकड़ों के अनुसार, बिहार ने पिछले वित्तीय वर्ष में 39.07 हजार टन मछलियों का सफल निर्यात किया है। यह उपलब्धि बिहार के ‘नीली क्रांति’ (Blue Revolution) की दिशा में बढ़ते कदमों का ठोस प्रमाण है। राज्य के विभिन्न जलाशयों, चौर क्षेत्रों और तालाबों में पैदा होने वाली मछलियाँ अब केवल बिहार की थालियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनकी मांग अमृतसर से लेकर नेपाल के बाजारों तक पहुँच गई है। डेयरी, मत्स्य एवं पशु संसाधन विभाग की सक्रियता और ‘कृषि रोडमैप’ के प्रभावी क्रियान्वयन ने मछली उत्पादन को एक संगठित उद्योग का रूप दे दिया है, जिससे लाखों मत्स्य पालकों के जीवन स्तर में क्रांतिकारी बदलाव आ रहे हैं।

उत्पादन की छलांग: 10 वर्षों में 100% की वृद्धि

​बिहार ने पिछले एक दशक में मछली उत्पादन के क्षेत्र में जो गति पकड़ी है, वह पूरे देश के लिए एक उदाहरण है। जहाँ वर्ष 2013-14 में बिहार मछली उत्पादन के मामले में राष्ट्रीय स्तर पर 9वें स्थान पर था, वहीं निरंतर तकनीकी सुधार और सरकारी प्रोत्साहन के कारण वर्ष 2023-24 में ही बिहार चौथे स्थान पर काबिज हो गया है।

​उत्पादन के तुलनात्मक आंकड़े निम्नलिखित हैं:

विवरण

वित्तीय वर्ष 2023-24

वित्तीय वर्ष 2024-25

वृद्धि का प्रतिशत (दशक में)

मछली उत्पादन (मीट्रिक टन)

8.73 लाख

9.59 लाख

लगभग 100%

निर्यात मात्रा (टन)

39.07 हजार

राष्ट्रीय रैंकिंग

4th

4th (मजबूत स्थिति)

9वें से 4वें पर

नेपाल से पंजाब तक: बिहार की मछलियों का बढ़ता दबदबा

​बिहार से होने वाला निर्यात अब केवल पड़ोसी राज्यों तक सीमित नहीं है। राज्य के मत्स्य विभाग ने अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करते हुए नेपाल के बाजारों में भी अपनी धाक जमा ली है। इसके अलावा, उत्तर और पूर्वी भारत के कई प्रमुख शहरों में बिहार की ताजी मछलियों की मांग में भारी इजाफा हुआ है।

प्रमुख निर्यात गंतव्य:

  • अंतरराष्ट्रीय: नेपाल।
  • राष्ट्रीय: अमृतसर, लुधियाना, बनारस (वाराणसी), गोरखपुर, देवरिया, सिलीगुड़ी, रांची, गोड्डा और कप्तानगंज।

​विशेषज्ञों का कहना है कि बिहार की मछलियों के ‘फ्रेशनेस’ (ताजगी) और स्वाद के कारण पंजाब और उत्तर प्रदेश के बाजारों में इनकी मांग बढ़ी है। कम दूरी होने के कारण परिवहन लागत भी कम रहती है, जिससे बिहार के किसानों को अन्य राज्यों के मुकाबले बेहतर प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिल रहा है।

कृषि रोडमैप और तकनीकी नवाचार की भूमिका

​इस सफलता के पीछे बिहार सरकार का दूरगामी विजन ‘कृषि रोडमैप’ है। विभाग ने मछली पालन को केवल एक पारंपरिक व्यवसाय न मानकर उसे ‘कम भूमि में अधिक लाभ’ वाले मॉडल के रूप में विकसित किया है।

  • पशु संसाधन विभाग की पहल: विभाग न केवल उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान दे रहा है, बल्कि ‘मार्केट लिंकेज’ (बाजार जुड़ाव) को भी मजबूत कर रहा है।
  • मत्स्यिकी विकास: राज्य में जलकृषि (Aquaculture) के विकास के लिए मत्स्य पालकों को उन्नत बीज, तकनीकी प्रशिक्षण और वित्तीय अनुदान उपलब्ध कराया जा रहा है।
  • चौर विकास योजना: बिहार के उत्तरी क्षेत्रों में स्थित हजारों एकड़ चौर (जलमग्न भूमि) को मछली पालन के लिए विकसित किया गया है, जो इस उत्पादन वृद्धि का मुख्य आधार बना है।

उपभोक्ताओं के लिए सौगात: ‘फ्रेश कैच फिश आउटलेट’

​मछली पालकों की आय बढ़ाने के साथ-साथ सरकार अब शहरी उपभोक्ताओं के लिए भी विशेष योजना लेकर आई है। विभाग जल्द ही पटना सहित बिहार के सभी प्रमुख नगर निगमों में ‘फ्रेश कैच फिश आउटलेट’ (Fresh Catch Fish Outlet) खोलने जा रहा है।

इन आउटलेट्स की विशेषताएं:

  • जिंदा मछली: उपभोक्ताओं को इन आउटलेट्स पर सीधे तालाब से आई जिंदा और ताजी मछलियाँ मिलेंगी।
  • गुणवत्ता और सफाई: यहाँ आधुनिक स्वच्छता मानकों के साथ मछली की कटिंग और पैकिंग की व्यवस्था होगी।
  • सीधी आय: इससे बिचौलियों की भूमिका खत्म होगी और मछली पालकों को उनकी उपज का बेहतर दाम मिलेगा।

नीली क्रांति से आर्थिक समृद्धि का मार्ग

​22 अप्रैल 2026 की यह रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है कि बिहार अब ‘बैकवर्ड’ स्टेट की छवि को तोड़कर एक ‘प्रोडक्शन हब’ के रूप में उभर रहा है। 9.59 लाख मीट्रिक टन का उत्पादन और 39 हजार टन का निर्यात यह दर्शाता है कि बिहार में ग्रामीण अर्थव्यवस्था अब खेती के साथ-साथ पशुपालन और मत्स्य पालन पर मजबूती से टिक गई है।

​यदि यही रफ़्तार बरकरार रही, तो आने वाले दो वर्षों में बिहार मछली उत्पादन में शीर्ष तीन राज्यों में शामिल हो सकता है। सरकार के इन प्रयासों से न केवल कुपोषण के खिलाफ लड़ाई मजबूत हो रही है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार के ऐसे अवसर पैदा हुए हैं जिन्होंने पलायन को रोकने में भी बड़ी भूमिका निभाई है।

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