पटना में नीट परीक्षार्थी की हृदयविदारक खुदकुशी: टेस्ट में कम नंबर आने से टूटा 16 वर्षीय छात्र का हौसला; सुसाइड नोट में लिखा- ‘पापा मुझे माफ कर दीजिएगा’

पटना। बिहार की राजधानी पटना एक बार फिर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के मानसिक दबाव और उनके द्वारा उठाए जा रहे आत्मघाती कदमों की मूक गवाह बनी है। शहर के गांधी मैदान थाना क्षेत्र अंतर्गत सालिमपुर इलाके में एक किराये के फ्लैट में रहकर नीट (NEET) की तैयारी कर रहे 16 वर्षीय मेधावी छात्र ने मौत को गले लगा लिया। इस घटना ने न केवल पटना के कोचिंग हब में खलबली मचा दी है, बल्कि उन हजारों परिवारों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है जो अपने बच्चों को बेहतर भविष्य की उम्मीद में घरों से दूर भेजते हैं। मृतक की पहचान गया जिले के आमत थाना क्षेत्र स्थित करनाल टोला निवासी महेश यादव के इकलौते बेटे सौरव कुमार के रूप में हुई है। जानकारी के अनुसार, सौरव प्रसिद्ध कोचिंग संस्थान पीडब्लू (Physics Wallah) से चिकित्सा प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहा था। मंगलवार की दोपहर उसने अपने ही कमरे में गमछे का फंदा बनाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली।

अकादमिक दबाव और सुसाइड नोट की दर्दनाक दास्तां

​पुलिस को शव के पास से एक सुसाइड नोट बरामद हुआ है, जो प्रतिस्पर्धा के इस दौर में छात्रों के भीतर चल रहे द्वंद और हताशा को चीख-चीख कर बयां कर रहा है। सौरव ने अपने पत्र की शुरुआत पिता से क्षमा मांगते हुए की है। उसने लिखा है कि वह रात-रात भर जागकर पढ़ाई करता था, लेकिन इसके बावजूद परीक्षाओं में परिणाम उसकी मेहनत के अनुरूप नहीं आ रहे थे। पत्र की भाषा यह स्पष्ट करती है कि सौरव के मन में अपनी असफलताओं को लेकर कितनी गहरी हीनभावना घर कर गई थी। उसने लिखा, “रात-रात भर पढ़ने के बाद भी कोई रिजल्ट नहीं आ रहा था। मैं परेशान हो गया था। इसलिए मैंने यह सब किया है”।

​सौरव का पत्र केवल उसकी निजी पीड़ा तक सीमित नहीं था, बल्कि उसमें अपनी बहन के भविष्य और अपने पिता के अकेलेपन की चिंता भी साफ झलक रही थी। उसने अपने पिता से अंतिम प्रार्थना करते हुए लिखा कि उसकी बहन की शादी जमीन-जायदाद बेचकर किसी अच्छे घर में कर दी जाए। सौरव ने यह भी स्वीकार किया कि उसे पता है कि उसके जाने के बाद बुढ़ापे में उसके पिता का कोई सहारा नहीं रहेगा, लेकिन वह अपनी “मजबूरी” और मानसिक तनाव के आगे हार गया था। यह पत्र उन तमाम छात्रों की मनोस्थिति का दर्पण है जो अपनी छोटी-छोटी विफलताओं को अपने अस्तित्व की हार मान लेते हैं।

घटना का घटनाक्रम: बीमार होने की बात कह कमरे में ही रुक गया था सौरव

​सौरव पटना के सालिमपुर स्थित एक फ्लैट में अपने दो चचेरे भाइयों के साथ रहकर पढ़ाई करता था। तीनों भाई एक ही कोचिंग संस्थान (पीडब्लू) में पढ़ते थे। मंगलवार की दोपहर जब उसके चचेरे भाई कोचिंग जाने के लिए तैयार हुए और उन्होंने सौरव को साथ चलने के लिए कहा, तो सौरव ने अपनी तबीयत ठीक नहीं होने का हवाला देते हुए जाने से इनकार कर दिया। भाइयों ने उसकी बात पर विश्वास किया और उसे कमरे में छोड़कर चले गए।

​दोपहर करीब 3 बजे सौरव ने कमरे के भीतर इस खौफनाक कदम को अंजाम दिया। घटना का खुलासा रात करीब 8 बजे हुआ जब उसके चचेरे भाई कोचिंग से लौटे। जब उन्होंने दरवाजा खटखटाया और अंदर से कोई जवाब नहीं मिला, तो उनकी चिंता बढ़ गई। किसी अनहोनी की आशंका में जब उन्होंने वेंटिलेटर से झांक कर देखा, तो उनके होश उड़ गए। सौरव कोचिंग के ही कपड़ों में पंखे से लटका हुआ था। भाइयों के शोर मचाने पर आसपास के लोग जुटे और तुरंत पुलिस को सूचना दी गई।

इकलौते बेटे की मौत से गया में पसरा मातम

​गांधी मैदान के थानाध्यक्ष अखिलेश कुमार मिश्र ने बताया कि प्रारंभिक जांच में मामला पूरी तरह से परीक्षाओं के तनाव और कम नंबर आने से उपजी हताशा का लग रहा है। सौरव महेश यादव का इकलौता बेटा था, जिससे पूरे परिवार की उम्मीदें जुड़ी हुई थीं। गया के करनाल टोला में जैसे ही यह खबर पहुँची, पूरे गांव में सन्नाटा पसर गया। परिवार के सदस्यों का रो-रोकर बुरा हाल है।

​नीट और जेईई जैसी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों के बीच बढ़ता अवसाद आज के समय की एक गंभीर समस्या बन चुका है। पटना जैसे शिक्षा के बड़े केंद्रों में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य की निगरानी के लिए कोई पुख्ता तंत्र नहीं होना एक बड़ी चिंता का विषय है। कोचिंग संस्थानों में नियमित रूप से होने वाले टेस्ट और उनके परिणामों का दबाव छात्रों को इस हद तक विचलित कर देता है कि वे जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर भूल जाते हैं।

प्रतियोगी परीक्षाओं का बढ़ता बोझ और बच्चों की मासूमियत

​आजकल के दौर में माता-पिता और समाज की अपेक्षाएं बच्चों के कोमल कंधों पर किसी वजनी बोझ की तरह लद गई हैं। सौरव के सुसाइड नोट में “जमीन-जायदाद बेचकर बहन की शादी” की बात करना यह दर्शाता है कि 16 साल की उम्र में भी वह परिवार की आर्थिक तंगी और सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति कितना संवेदनशील था। जब एक छात्र को लगता है कि उसकी पढ़ाई पर खर्च हो रहा पैसा और मेहनत व्यर्थ जा रही है, तो वह स्वयं को दोषी मानने लगता है।

​शिक्षाविदों का मानना है कि केवल कोचिंग ड्रेस पहना देना या रात-रात भर जागकर किताबें पलटना सफलता की गारंटी नहीं है। बच्चों को यह सिखाना भी जरूरी है कि असफलता जीवन का अंत नहीं, बल्कि सीखने की एक प्रक्रिया है। सौरव का मामला एक चेतावनी है उन सभी संस्थानों और अभिभावकों के लिए जो केवल ‘रिजल्ट’ और ‘रैंक’ की दौड़ में बच्चों की मुस्कान और उनकी मानसिक शांति को पीछे छोड़ देते हैं।

  • ये भी पढ़े..

    पाटलिपुत्र कांड के बाद रेलवे अलर्ट! मुजफ्फरपुर जंक्शन पर हाई सिक्योरिटी, परीक्षार्थियों के लिए चलीं 2 स्पेशल ट्रेनें

    Share Add as a preferred…

    खान ग्लोबल स्टडीज पर पुलिस का नोटिस, जांच में सहयोग नहीं करने पर कार्रवाई की चेतावनी

    Share Add as a preferred…