जमीन पर प्रशासनिक धमक: भागलपुर के प्रखंडों में वरीय अधिकारियों ने खंगाली सरकारी योजनाओं की फाइलें; जिलाधिकारी के आदेश पर ‘ग्राउंड जीरो’ पर हुई पड़ताल

भागलपुर। सुशासन की अवधारणा तभी सार्थक होती है जब विकास की योजनाएं फाइलों के बंद कमरों से निकलकर आम आदमी की देहरी तक पहुँचती हैं। इसी संकल्प को धरातल पर उतारने के लिए भागलपुर जिला प्रशासन ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावी कदम उठाया है। जिलाधिकारी डॉ नवल किशोर चौधरी के कड़े निर्देशों के आलोक में मंगलवार, 21 अप्रैल 2026 को जिले का पूरा प्रशासनिक अमला सक्रिय नजर आया। जिले के सभी प्रखंडों के लिए नामित किए गए वरीय अधिकारियों ने जिला मुख्यालय से निकलकर अपने-अपने आवंटित प्रखंडों की ओर कूच किया। यह कोई सामान्य दौरा नहीं था, बल्कि सरकारी तंत्र की कार्यक्षमता और योजनाओं की पारदर्शिता को परखने के लिए की गई एक सघन ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ थी। जिलाधिकारी का स्पष्ट मानना है कि जब तक शीर्ष अधिकारी स्वयं धरातल पर जाकर स्थिति का मुआयना नहीं करेंगे, तब तक व्यवस्था में मौजूद कमियों को जड़ से खत्म करना नामुमकिन है। ‘वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) की टीम ने इस प्रशासनिक हलचल की बारीकी से निगरानी की है, जो भागलपुर में जवाबदेही के एक नए अध्याय की शुरुआत का संकेत दे रही है।

नवल किशोर चौधरी का ‘एक्शन प्लान’: कागजों से बाहर निकली प्रशासनिक टीम

​जिलाधिकारी डॉ नवल किशोर चौधरी ने पदभार संभालने के साथ ही यह स्पष्ट कर दिया था कि वे केवल कागजी आंकड़ों पर भरोसा करने के बजाय धरातल पर हो रहे बदलावों को प्राथमिकता देंगे। उनके इसी ‘एक्शन प्लान’ के तहत आज भागलपुर के सभी प्रखंडों—चाहे वह पीरपैंती हो, सुल्तानगंज हो, या नवगछिया—हर जगह वरीय पदाधिकारियों की मौजूदगी रही। इन अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश थे कि वे किसी भी पूर्व सूचना के बिना (Surprise Inspection) सरकारी संस्थानों और निर्माणाधीन योजनाओं का निरीक्षण करें।

​इस अभियान का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि सरकारी खजाने से निकलने वाला हर रुपया सही जगह और सही तरीके से खर्च हो रहा है या नहीं। अधिकारियों ने न केवल फाइलों का मिलान किया, बल्कि मौके पर मौजूद आम नागरिकों से सीधा संवाद कर योजनाओं का फीडबैक भी लिया। यह प्रशासनिक सक्रियता यह दर्शाती है कि भागलपुर अब उस दौर की ओर बढ़ रहा है जहाँ अधिकारियों को केवल दफ्तर में बैठकर निर्देश जारी करने की छूट नहीं होगी, बल्कि उन्हें अपनी जवाबदेही जनता के बीच जाकर सिद्ध करनी होगी।

शिक्षा व्यवस्था की पड़ताल: मिड-डे मील से लेकर ब्लैकबोर्ड तक की जांच

​प्रखंडों के दौरे पर निकले अधिकारियों की सूची में विद्यालय निरीक्षण एक प्रमुख एजेंडा था। जिले के सुदूर देहाती क्षेत्रों में स्थित प्राथमिक और मध्य विद्यालयों में जब अचानक लाल बत्ती की गाड़ियाँ रुकीं, तो हड़कंप मच गया। अधिकारियों ने सबसे पहले शिक्षकों की उपस्थिति पंजी (Attendance Register) की जांच की। कई स्थानों पर समय से विद्यालय न पहुँचने वाले शिक्षकों को कड़ी चेतावनी दी गई।

​निरीक्षण के दौरान मिड-डे मील (MDM) की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया गया। अधिकारियों ने स्वयं रसोइयों में जाकर भोजन की शुद्धता और स्वच्छता को देखा। बच्चों से सवाल पूछे गए कि उन्हें मेनू के अनुसार खाना मिल रहा है या नहीं। इसके अलावा, विद्यालय की अधिसंरचना—जैसे शौचालयों की सफाई, पीने के पानी की व्यवस्था और खेल के मैदान—की स्थिति को भी परखा गया। जिलाधिकारी के निर्देश थे कि यदि किसी भी विद्यालय में बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ पाया जाता है, तो उस पर जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई जाए। शिक्षा के क्षेत्र में यह मॉनिटरिंग आने वाले समय में सरकारी स्कूलों के प्रति जनता के भरोसे को फिर से बहाल करने में सहायक होगी।

स्वास्थ्य सेवा और जन वितरण: क्या जनता को मिल रहा है उनका हक?

​प्रखंड मुख्यालयों और पंचायतों में स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) और स्वास्थ्य उप-केंद्रों की स्थिति की भी गहनता से जांच की गई। वरीय अधिकारियों ने देखा कि क्या डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी अपनी ड्यूटी पर तैनात हैं या नहीं। दवाइयों के स्टॉक, प्रसव केंद्रों की स्थिति और इमरजेंसी सेवाओं की उपलब्धता की जांच की गई। स्वास्थ्य विभाग की योजनाओं, जैसे जननी सुरक्षा योजना और टीकाकरण अभियान, के लाभार्थियों से भी अधिकारियों ने बातचीत की।

​दूसरी ओर, जन वितरण प्रणाली (PDS) की दुकानों पर भी अधिकारियों का पहरा रहा। राशन वितरण में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए ‘पॉश’ (PoS) मशीनों के डेटा और वास्तविक वितरण का मिलान किया गया। उपभोक्ताओं से पूछा गया कि क्या डीलर उन्हें निर्धारित मात्रा में अनाज दे रहे हैं या वजन में कटौती की जा रही है। जिलाधिकारी नवल किशोर चौधरी का सख्त निर्देश है कि गरीबों के अनाज पर डाका डालने वाले किसी भी विक्रेता को बख्शा नहीं जाएगा। पीरपैंती और सबौर जैसे क्षेत्रों में PDS दुकानों की जांच से यह साफ संदेश गया है कि अनियमितता करने वालों के लाइसेंस रद्द करने की प्रक्रिया अब तेज होगी।

आंगनबाड़ी और पोषण: नन्हे नौनिहालों के भविष्य पर पैनी नजर

​समाज के सबसे संवेदनशील वर्ग, यानी बच्चों और गर्भवती महिलाओं के पोषण की जिम्मेदारी संभालने वाले आंगनबाड़ी केंद्रों की भी आज कड़ाई से जांच हुई। अधिकारियों ने केंद्रों पर बच्चों की उपस्थिति, उनके वजन की ट्रैकिंग और पोषाहार के वितरण की स्थिति को देखा। ‘पोषण अभियान’ के तहत दी जाने वाली सुविधाओं का लाभ वास्तव में लक्षित लाभार्थियों तक पहुँच रहा है या नहीं, इसे सुनिश्चित करने के लिए अधिकारियों ने पंजी (Register) और धरातल की स्थिति का मिलान किया।

​निरीक्षण के दौरान यह देखा गया कि कई आंगनबाड़ी केंद्रों में भवनों की स्थिति जर्जर है, जिसे लेकर अधिकारियों ने तुरंत मरम्मत के प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश दिए। आंगनबाड़ी सेविकाओं और सहायिकाओं को निर्देशित किया गया कि वे न केवल भोजन वितरण तक सीमित रहें, बल्कि बच्चों के शुरुआती मानसिक विकास (Early Childhood Education) पर भी ध्यान दें। जिलाधिकारी की इस पहल से कुपोषण के खिलाफ लड़ाई को एक नई मजबूती मिली है।

जवाबदेही तय: लापरवाहों पर गिरेगी गाज, सुधरेगा सरकारी तंत्र

​मंगलवार का यह व्यापक निरीक्षण केवल एक औपचारिक दौरा नहीं था, बल्कि इसके दूरगामी परिणाम होंगे। सभी वरीय पदाधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे अपने निरीक्षण की एक विस्तृत रिपोर्ट जिलाधिकारी को सौंपें। इस रिपोर्ट के आधार पर उन अधिकारियों और कर्मचारियों को चिह्नित किया जाएगा जो अपनी ड्यूटी में कोताही बरत रहे हैं। जिलाधिकारी नवल किशोर चौधरी ने स्पष्ट कर दिया है कि बेहतर काम करने वालों को पुरस्कृत किया जाएगा, लेकिन लापरवाहों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।

​’वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) का विश्लेषण कहता है कि भागलपुर में प्रशासनिक सक्रियता का यह मॉडल अन्य जिलों के लिए भी एक उदाहरण बन सकता है। जब सत्ता के शीर्ष पर बैठे अधिकारी पसीना बहाकर प्रखंडों की खाक छानते हैं, तो निचले स्तर के कर्मचारियों में भी काम के प्रति गंभीरता आती है। यह जनता के टैक्स के पैसे का सही उपयोग सुनिश्चित करने की एक ईमानदार कोशिश है।

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