
पीरपैंती/भागलपुर। डिजिटल इंडिया और ई-गवर्नेंस के तमाम दावों के बीच भागलपुर जिले का पीरपैंती प्रखंड इन दिनों एक गंभीर प्रशासनिक विफलता का गवाह बना हुआ है। प्रखंड मुख्यालय स्थित एकमात्र आधार केंद्र पर पिछले कई दिनों से लटके ‘ताले’ ने हजारों ग्रामीणों के सामने संकट खड़ा कर दिया है। यहाँ समस्या कोई तालाबंदी नहीं, बल्कि वह ‘तकनीकी खामी’ है जिसने सरकारी मशीनरी को पंगु बना दिया है। केंद्र के बाहर चिपकाए गए ‘लिंक फेल’ के एक छोटे से नोटिस ने उन सपनों और जरूरतों पर पानी फेर दिया है, जिन्हें लेकर ग्रामीण मीलों का सफर तय कर यहाँ पहुँच रहे हैं। मंगलवार, 21 अप्रैल 2026 को भी स्थिति जस की तस बनी रही, जहाँ सुबह से ही उमड़ी भीड़ दोपहर होते-होते आक्रोश और निराशा के साथ वापस लौट गई। यह समस्या केवल एक तकनीकी ग्लिच नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था की पोल खोलती है जो कागजों पर तो डिजिटल है, लेकिन धरातल पर एक मामूली नेटवर्क समस्या के सामने घुटने टेक देती है।
‘लिंक फेल’ का नोटिस और ग्रामीणों का आक्रोश
पीरपैंती प्रखंड मुख्यालय का आधार केंद्र पिछले तीन-चार दिनों से एक वीरान इमारत में तब्दील हो गया है। केंद्र के मुख्य द्वार पर एक हस्तलिखित सूचना चस्पा कर दी गई है— “सर्वर डाउन और लिंक फेल होने के कारण आधार संबंधित सभी कार्य अगले आदेश तक स्थगित हैं।” यह एक छोटा सा वाक्य उन लोगों के लिए किसी बड़ी आपदा से कम नहीं है, जो सुबह चार बजे उठकर, बसों की छतों पर लदकर या मीलों पैदल चलकर यहाँ पहुँचते हैं।
ग्रामीणों ने बताया कि केंद्र के कर्मचारी केवल यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि ऊपर से ही लिंक नहीं आ रहा है। सवाल यह उठता है कि क्या डिजिटल युग में एक प्रखंड स्तर के केंद्र पर इंटरनेट की ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था नहीं हो सकती जो घंटों या दिनों तक काम न रुके? ग्रामीणों का आरोप है कि तकनीकी खराबी का बहाना बनाकर अक्सर कार्य से जी चुराया जाता है, जिसका खामियाजा सीधे तौर पर आम जनता को भुगतना पड़ता है। चिलचिलाती धूप में घंटों लाइन में खड़े रहने के बाद जब कोई कर्मचारी आकर कहता है कि आज काम नहीं होगा, तो लोगों का धैर्य जवाब दे जाता है।
15-20 किलोमीटर का सफर और आर्थिक चोट
पीरपैंती प्रखंड भौगोलिक रूप से काफी विस्तृत है। प्रखंड के सुदूर सीमावर्ती गांवों जैसे ममलखा, रिफ्यूजी कॉलोनी या दियारा क्षेत्रों से लोग आधार कार्ड बनवाने या उसमें सुधार कराने यहाँ आते हैं। कई ऐसे परिवार हैं जो 15 से 20 किलोमीटर की दूरी तय कर यहाँ पहुँचते हैं। एक दिन आधार केंद्र आने का मतलब है—एक दिन की मजदूरी का नुकसान, आने-जाने का किराया और भोजन का खर्च।
प्रेस वार्ता के दौरान एक स्थानीय ग्रामीण ने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा, “हम पिछले तीन दिनों से लगातार आ रहे हैं। घर से सुबह ही निकलना पड़ता है ताकि लाइन में आगे रह सकें। यहाँ आने पर पता चलता है कि सिस्टम बंद है। न तो कोई यह बताने वाला है कि कल खुलेगा या नहीं, और न ही कोई अधिकारी सुध लेने वाला है।” यह स्थिति उन गरीब दिहाड़ी मजदूरों के लिए सबसे ज्यादा भयावह है, जिन्हें एक आधार कार्ड के लिए अपनी कई दिनों की रोटी दांव पर लगानी पड़ रही है।
शिक्षा से लेकर बैंकिंग तक: आधार के बिना सब ‘जाम’
वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था में आधार कार्ड केवल एक पहचान पत्र नहीं, बल्कि जीवन की अनिवार्य चाबी बन चुका है। पीरपैंती के लोगों की सबसे बड़ी चिंता उनके बच्चों की शिक्षा को लेकर है। वर्तमान में स्कूलों और कॉलेजों में नामांकन (Admission) की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, जहाँ आधार कार्ड अनिवार्य दस्तावेज है। यदि समय पर आधार अपडेट नहीं हुआ या नया कार्ड नहीं बना, तो कई बच्चों का भविष्य अधर में लटक सकता है।
इसके अलावा, सरकारी योजनाओं जैसे—वृद्धा पेंशन, प्रधानमंत्री आवास योजना, राशन कार्ड और बैंकिंग कार्यों के लिए आधार की अनिवार्यता ने स्थिति को और भी गंभीर बना दिया है। कई ऐसे बुजुर्ग हैं जिनकी पेंशन केवल इसलिए रुकी हुई है क्योंकि उनका बायोमेट्रिक अपडेट होना है। बैंकों में केवाईसी (KYC) अपडेट कराने के लिए भी लोग इसी केंद्र के भरोसे हैं। जब मुख्य केंद्र ही ‘लिंक फेल’ के नाम पर बंद पड़ा हो, तो जनता कहाँ जाए? यह केवल एक तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि सीधे तौर पर नागरिकों के अधिकारों का हनन है।
विकल्पों का अभाव: एक केंद्र और लाखों की आबादी
पीरपैंती की एक बड़ी आबादी के लिए मात्र एक ही आधार केंद्र का होना सबसे बड़ी विडंबना है। हज़ारों की आबादी वाले इस बड़े प्रखंड में जब केवल एक ही जगह काम होता है, तो वहां हमेशा भारी भीड़ बनी रहती है। दबाव अधिक होने के कारण मशीनें और सर्वर अक्सर जवाब दे देते हैं। स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों ने मांग की है कि पीरपैंती की विशालता को देखते हुए कम से कम दो से तीन अतिरिक्त केंद्र खोले जाने चाहिए।
प्रशासन को चाहिए कि वह पंचायतों के स्तर पर ‘आधार कैंप’ का आयोजन करे, ताकि लोगों को प्रखंड मुख्यालय की दौड़ न लगानी पड़े। यदि पंचायतों में कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) को अधिक सशक्त बनाया जाए और उन्हें आधार सुधार के पूर्ण अधिकार दिए जाएं, तो प्रखंड मुख्यालय पर दबाव कम होगा और ‘लिंक फेल’ जैसी समस्याओं का प्रभाव भी विकेंद्रीकृत हो जाएगा। लेकिन फिलहाल, पूरी व्यवस्था एक ही केंद्र के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है, जो खुद अपनी विफलता के बोझ तले दबा हुआ है।
प्रशासनिक जवाबदेही और भविष्य की अनिश्चितता
आधार केंद्र के बंद रहने को लेकर अब तक जिला प्रशासन या प्रखंड प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण या वैकल्पिक व्यवस्था का ऐलान नहीं किया गया है। लोगों में इस बात को लेकर भी चिंता है कि यदि यह समस्या लंबी खिंची, तो बैकलॉग इतना बढ़ जाएगा कि केंद्र खुलने के बाद भी स्थिति को संभालना मुश्किल होगा।
स्थानीय युवाओं ने चेतावनी दी है कि यदि अगले 24 घंटों के भीतर सेवाएं बहाल नहीं की गईं, तो वे प्रखंड कार्यालय के समक्ष विरोध प्रदर्शन करने को विवश होंगे। उनकी मांग है कि न केवल वर्तमान केंद्र को तुरंत चालू किया जाए, बल्कि एक स्थायी तकनीकी टीम नियुक्त की जाए जो ऐसी स्थितियों में तत्काल समाधान निकाल सके। पीरपैंती की जनता अब केवल ‘आश्वासन’ नहीं, बल्कि ‘एक्शन’ चाहती है।


