​राजधानी एक्सप्रेस की चपेट में आने से प्वाइंट्समैन की मौत

नवगछिया/भागलपुर। भारतीय रेल की पटरियों पर दौड़ती रफ्तार जब जिंदगी को कुचल देती है, तो पीछे छूट जाते हैं सुलगते सवाल और अपनों का कभी न खत्म होने वाला इंतजार। भागलपुर जिले के नवगछिया और खरीक रेलवे स्टेशनों के बीच सोमवार को एक ऐसी ही हृदयविदारक घटना घटी, जिसने रेल महकमे को शोक में डुबो दिया। कर्तव्य की वेदी पर तैनात एक 50 वर्षीय ‘प्वाइंट्समैन’ सुजीत कुमार की जान नई दिल्ली से डिब्रूगढ़ जा रही गाड़ी संख्या 20506, डाउन राजधानी एक्सप्रेस की चपेट में आने से चली गई। यह हादसा केवल एक कर्मचारी की मृत्यु नहीं है, बल्कि उस जोखिम की ओर भी इशारा करता है जो रेल की पटरियों पर काम करने वाले चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी हर दिन उठाते हैं। पटरियों को सुरक्षित रखने वाला हाथ आज खुद पटरियों पर बेजान पड़ा था। घटना के बाद से ही नवगछिया स्टेशन परिसर का माहौल गमगीन है और परिजनों की चीखों से अनुमंडल अस्पताल की दीवारें भी मानो कांप उठीं। रेल प्रशासन ने मृतक के सम्मान में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन एक परिवार का चिराग हमेशा के लिए बुझ गया।

रफ्तार का कहर: कर्तव्य के बीच थमी सांसें

​सोमवार की दोपहर जब पूरा इलाका चिलचिलाती धूप और सामान्य गतिविधियों में व्यस्त था, तभी नवगछिया और खरीक के बीच डाउन लाइन पर मौत ने दस्तक दी। खरीक स्टेशन पर पिछले कई वर्षों से तैनात सुजीत कुमार अपने नियमित कार्य के सिलसिले में पटरियों के समीप मौजूद थे। इसी दौरान नई दिल्ली से डिब्रूगढ़ की ओर जाने वाली तेज रफ्तार राजधानी एक्सप्रेस वहां से गुजरी। ट्रेन की गति इतनी अधिक थी कि सुजीत कुमार को संभलने का मौका तक नहीं मिला और वे सीधे इंजन की चपेट में आ गए।

​ट्रेन की टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि सुजीत कुमार की मौके पर ही मौत हो गई। घटना की खबर बिजली की तरह पूरे रेलखंड पर फैल गई। लोको पायलट ने तुरंत इसकी सूचना कंट्रोल रूम को दी, जिसके बाद नवगछिया स्टेशन पर हड़कंप मच गया। स्टेशन प्रबंधक अनिल कुमार और जीआरपी थानाध्यक्ष अरुण चौधरी तुरंत अपने दल-बल के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हुए। वहां का दृश्य इतना मार्मिक था कि मौजूद कर्मियों की आंखें नम हो गईं। रेल पटरियों का वह हिस्सा, जहाँ सुजीत कुमार ने अपनी जिंदगी के कई साल गुजारे थे, आज उनके ही खून से लाल हो चुका था।

अंतिम विदाई: तिरंगे में लिपटा रेल का ‘सिपाही’

​प्रशासनिक औपचारिकताएं पूरी करने के बाद शव को कब्जे में लेकर नवगछिया अनुमंडल अस्पताल पहुँचाया गया। वहां डॉक्टरों की टीम ने पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी की। लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं हुई; असली भावुक क्षण तब आया जब सुजीत कुमार के शव को पोस्टमार्टम के बाद अंतिम दर्शन के लिए नवगछिया स्टेशन के समीप लाया गया। आमतौर पर स्टेशन वह जगह होती है जहाँ लोग अपनों के स्वागत के लिए या यात्रा की शुरुआत के लिए जुटते हैं, लेकिन सोमवार को यहाँ एक साथी को विदाई दी जा रही थी।

​रेलवे कर्मियों ने सुजीत कुमार को एक ‘शहीद’ जैसा सम्मान दिया। उनके पार्थिव शरीर को राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे से ढका गया, जो उनके द्वारा रेल सेवा के प्रति दी गई निष्ठा का प्रतीक था। स्टेशन प्रबंधक अनिल कुमार सहित दर्जनों रेल कर्मियों ने कतारबद्ध होकर अपने साथी को पुष्प मालाएं अर्पित कीं। स्टेशन पर मौजूद हर छोटा-बड़ा कर्मचारी उस समय खामोश था। सुजीत कुमार के साथी बताते हैं कि वे एक बेहद मिलनसार और अपने काम के प्रति ईमानदार व्यक्ति थे। तिरंगे में लिपटे सुजीत कुमार को देखकर वहां मौजूद यात्रियों की आंखें भी भर आईं। यह दृश्य उस सम्मान का परिचायक था जो रेल महकमा अपने उन ग्राउंड स्टाफ को देता है जो पर्दे के पीछे रहकर लाखों यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।

छपरा से नवगछिया तक का सफर: अधूरा रह गया घर लौटने का वादा

​मृतक सुजीत कुमार मूल रूप से बिहार के छपरा (सारण) जिले के रहने वाले थे। रोजी-रोटी की तलाश और सरकारी सेवा के दायित्व ने उन्हें छपरा से दूर भागलपुर के खरीक स्टेशन तक पहुँचाया था। वे पिछले कई वर्षों से यहाँ अपनी सेवा दे रहे थे और रेल प्रशासन की नजरों में एक विश्वसनीय कर्मचारी थे। उनके परिवार में पत्नी और बच्चे हैं, जिनका भरण-पोषण सुजीत की तनख्वाह से ही होता था।

​जैसे ही सुजीत की मौत की खबर उनके पैतृक निवास छपरा पहुँची, वहां मातम पसर गया। परिजन बदहवास हालत में नवगछिया पहुँचे। स्टेशन परिसर में अपनी पत्नी और बच्चों को बिलखते देख वहां मौजूद हर व्यक्ति का कलेजा फट पड़ा। पत्नी का रो-रोकर बुरा हाल था; वह बार-बार एक ही बात कह रही थी कि अब उनका सहारा कौन बनेगा। बच्चे अपने पिता के बेजान शरीर को फटी आंखों से देख रहे थे। रेल कर्मियों ने दुख की इस घड़ी में संवेदनशीलता दिखाते हुए मौके पर ही चंदा इकट्ठा किया और एक सम्मानजनक सहयोग राशि परिजनों को सौंपी। हालांकि, पैसा उस शून्य को नहीं भर सकता जो सुजीत के जाने से पैदा हुआ है, लेकिन यह साथ निभाने का एक छोटा सा प्रयास था।

कानूनी प्रक्रिया और रेल सुरक्षा पर सवाल

​जीआरपी थानाध्यक्ष अरुण कुमार चौधरी ने बताया कि इस दुखद घटना को लेकर कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। मृतक की पत्नी के बयान के आधार पर नवगछिया रेल थाने में यूडी (अनैच्छिक मृत्यु) केस दर्ज किया जा रहा है। पुलिस ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान को भी जांच का हिस्सा बनाया है। हालांकि, प्राथमिक तौर पर यह एक दुर्घटना का मामला लग रहा है, लेकिन रेल सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि हाई-स्पीड ट्रेनों के गुजरने के दौरान पटरियों पर काम करने वाले कर्मियों के लिए सुरक्षा प्रोटोकॉल को और कड़ा करने की जरूरत है।

​राजधानी एक्सप्रेस जैसी ट्रेनों की रफ्तार इतनी शांत और तेज होती है कि कई बार पटरियों पर काम कर रहे कर्मियों को उनके आने का समय पर अहसास नहीं हो पाता। सुजीत कुमार की मौत ने एक बार फिर रेल लाइनों पर ‘ट्रैकमैन’ और ‘प्वाइंट्समैन’ की सुरक्षा के लिए आधुनिक उपकरणों (जैसे रक्षा कवच या अर्ली वार्निंग सिस्टम) की आवश्यकता को रेखांकित किया है। नवगछिया स्टेशन प्रबंधक अनिल कुमार ने कहा कि सुजीत जैसे अनुभवी कर्मी का जाना रेलवे के लिए एक बड़ी क्षति है।

एक खामोश स्टेशन और यादों का सिलसिला

​देर शाम जब सुजीत कुमार का पार्थिव शरीर उनके पैतृक गांव छपरा के लिए रवाना किया गया, तो नवगछिया स्टेशन की पटरियों पर फिर से ट्रेनों की आवाजाही सामान्य हो गई। सिग्नल फिर से लाल-हरे होने लगे, और मुसाफिर अपनी अपनी मंजिलों की ओर बढ़ने लगे। लेकिन खरीक और नवगछिया के बीच का वह ट्रैक अब कभी सुजीत कुमार के कदमों की आहट नहीं सुनेगा।

​रेलवे के छोटे कर्मचारी अक्सर गुमनाम रहकर काम करते हैं, लेकिन उनकी एक छोटी सी चूक या एक छोटा सा हादसा पूरे तंत्र को हिला देता है। सुजीत कुमार ने अपनी जान देकर यह याद दिला दिया कि हर रेल यात्रा के पीछे न जाने कितने सुजीत कुमारों का पसीना और कभी-कभी खून भी शामिल होता है। रेल प्रशासन ने उन्हें तिरंगा देकर उनके सम्मान को अमर कर दिया, लेकिन छपरा की उन गलियों में अब कभी वह लौटकर नहीं जाएंगे जहाँ से वे एक बेहतर भविष्य का सपना लेकर निकले थे। भागलपुर और नवगछिया की रेल डायरी में 20 अप्रैल 2026 का दिन एक समर्पित प्वाइंट्समैन की शहादत के रूप में दर्ज हो गया है।

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