बिहार में डिजिटल जनगणना की बिछी बिसात: मुख्य सचिव ने जिलों की रैंकिंग से खोला रिपोर्ट कार्ड, पिछड़ने वाले कप्तानों को सुधार के लिए एक हफ्ते की मोहलत

पटना। देश की दिशा और विकास की रूपरेखा तय करने वाली जनगणना की प्रक्रिया अब अपने आधुनिक और डिजिटल अवतार में बिहार के धरातल पर उतर चुकी है। इस राष्ट्रीय महत्व के कार्य की संवेदनशीलता और इसमें हो रही प्रगति को परखने के लिए सोमवार, 20 अप्रैल 2026 को बिहार के मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत ने मोर्चा संभाला। राजधानी पटना के सचिवालय स्थित मुख्य सचिव कोषांग से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से राज्य के सभी 38 जिलाधिकारियों के साथ एक मैराथन बैठक की गई। इस बैठक का मुख्य एजेंडा ‘स्व-गणना’ (Self-Enumeration) और ‘हाउस लिस्टिंग ब्लॉक्स’ (HLBC) के सीमांकन व जियो-टैगिंग की समीक्षा करना था। मुख्य सचिव ने साफ कर दिया कि जनगणना का कार्य केवल सरकारी आंकड़े जुटाना नहीं है, बल्कि यह भविष्य की योजनाओं का आधार है, जिसमें किसी भी प्रकार की शिथिलता अक्षम्य होगी। समीक्षा के दौरान बिहार के प्रशासनिक मानचित्र पर कुछ जिले ‘सिक्सर’ लगाते दिखे तो कुछ अभी भी ‘क्रीज’ पर संघर्ष कर रहे हैं। मुख्य सचिव ने उन जिलों को कड़ी चेतावनी दी है जिनकी प्रगति संतोषजनक नहीं है, और उन्हें अपनी कार्यप्रणाली में सुधार के लिए महज सात दिनों का ‘अल्टीमेटम’ दिया गया है।

आंकड़ों का आईना: इन जिलों ने मारी बाजी, ये बने मिसाल

​समीक्षा बैठक के दौरान जब मुख्य सचिव ने जिलों की प्रगति रिपोर्ट की परतें खोलीं, तो कुछ जिलों के नाम सुनहरे अक्षरों में उभरे। ‘स्व-गणना’ यानी डिजिटल माध्यम से अपनी जानकारी खुद दर्ज करने के मामले में वैशाली, मधुबनी, खगड़िया, भागलपुर और सहरसा ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है। इन जिलों में प्रगणकों (Enumerators) और आम जनता के बीच बेहतर समन्वय देखने को मिला है। विशेष रूप से भागलपुर और वैशाली जैसे जिलों में तकनीक के प्रति जागरूकता का स्तर काफी ऊंचा पाया गया, जिससे स्व-गणना के आंकड़ों में तेजी से इजाफा हुआ।

​वहीं, दूसरी ओर जनगणना के तकनीकी आधार यानी ‘हाउस लिस्टिंग ब्लॉक्स’ के डिमारकेशन (सीमांकन) और जियो-टैगिंग के मोर्चे पर सहरसा, सीवान, रोहतास, पूर्णिया और खगड़िया अग्रणी रहे हैं। गौर करने वाली बात यह है कि सहरसा और खगड़िया ने दोनों ही श्रेणियों में अपना दबदबा कायम रखा है, जो यह दर्शाता है कि वहां के जिला प्रशासन ने डिजिटल जनगणना को एक मिशन मोड में लिया है। जियो-टैगिंग के कार्य में रोहतास और सीवान जैसे जिलों की सक्रियता ने यह साबित किया है कि तकनीकी बाधाओं के बावजूद यदि इच्छाशक्ति हो, तो नक्शों पर डिजिटल पदचाप दर्ज करना आसान है।

पिछड़ने वाले जिलों को 7 दिन का अल्टीमेटम: अब ‘स्ट्रेटेजी’ ही सहारा

​मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत का मिजाज बैठक के दौरान उन जिलों के प्रति काफी कड़ा दिखा, जो निर्धारित लक्ष्यों से काफी पीछे चल रहे हैं। उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के उन जिलाधिकारियों को निर्देशित किया कि वे अपनी सुस्ती त्यागें। उन्होंने निर्देश दिया कि जिन जिलों की प्रगति अपेक्षित नहीं पाई गई है, वे अगले एक हफ्ते के भीतर एक ठोस ‘एक्शन प्लान’ और ‘स्ट्रेटेजी’ तैयार करें।

​मुख्य सचिव ने स्पष्ट किया कि “अगली समीक्षा बैठक में मुझे कागजी बहाने नहीं, बल्कि धरातल पर बढ़े हुए आंकड़े चाहिए।” उन्होंने जिलाधिकारियों को आदेश दिया कि वे इस कार्य की प्रतिदिन समीक्षा करें। प्रशासनिक गलियारों में इस ‘एक हफ्ते की डेडलाइन’ को एक बड़े बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। इसका सीधा अर्थ है कि अब पिछड़ने वाले जिलों के अधिकारियों को अपनी गश्ती और निगरानी की गति दोगुनी करनी होगी। मुख्य सचिव ने उन जिलों के नाम सार्वजनिक तो नहीं किए जो पीछे हैं, लेकिन बैठक के तल्ख तेवरों ने उन अधिकारियों तक संदेश स्पष्ट पहुँचा दिया है।

तकनीकी बाधाओं का ‘डिजिटल’ समाधान: क्विक रिस्पॉन्स टीम तैनात

​जनगणना कार्य निदेशालय की निदेशक रंजीता ने बैठक में मुख्य सचिव को उन जमीनी हकीकतों से रूबरू कराया, जो इस डिजिटल प्रक्रिया में बाधक बन रही थीं। उन्होंने बताया कि प्रगणकों को अक्सर ऐप के संचालन, सर्वर की धीमी गति और जियो-टैगिंग के दौरान सटीक लोकेशन न मिलने जैसी तकनीकी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इन समस्याओं के त्वरित समाधान के लिए निदेशालय ने एक नई ‘घेराबंदी’ तैयार की है।

​प्रत्येक जिले में एक नोडल अधिकारी को नामित किया गया है। यह अधिकारी केवल नाम का पद नहीं होगा, बल्कि उसे प्रगणकों को तकनीकी प्रशिक्षण देने और जियो-टैगिंग के दौरान आने वाली व्यावहारिक दिक्कतों को मौके पर हल करने की जिम्मेदारी दी गई है। इसके अतिरिक्त, निदेशालय स्तर पर तीन क्विक रिस्पॉन्स टीमें (QRT) बनाई गई हैं। ये टीमें ‘फायरफाइटर’ की तरह काम करेंगी, जो किसी भी जिले में तकनीकी ग्रिड फेल होने या बड़े स्तर पर डेटा सिंकिंग की समस्या आने पर तत्काल समन्वय और समाधान सुनिश्चित करेंगी। यह व्यवस्था इसलिए की गई है ताकि किसी भी प्रगणक का काम तकनीकी कारणों से मिनटों के लिए भी न रुके।

3.28 लाख से अधिक स्व-गणना: बिहार की बढ़ती डिजिटल साक्षरता

​बैठक में यह एक महत्वपूर्ण आंकड़ा सामने आया कि अब तक बिहार राज्य में 3 लाख 28 हजार से ज्यादा लोगों ने स्व-गणना का कार्य पूर्ण कर लिया है। यह संख्या इस लिहाज से बड़ी है क्योंकि बिहार जैसे विशाल और विविध भौगोलिक परिस्थितियों वाले राज्य में डिजिटल जनगणना के प्रति लोगों का यह रुझान एक सकारात्मक बदलाव का संकेत है। स्व-गणना न केवल सरकार का समय बचाती है, बल्कि इससे त्रुटियों की संभावना भी न्यूनतम हो जाती है।

​मुख्य सचिव ने इस आंकड़े को संतोषजनक तो माना, लेकिन इसे अभी शुरुआती मील का पत्थर बताया। उन्होंने जिलाधिकारियों से कहा कि वे ग्रामीण क्षेत्रों में इस बात का व्यापक प्रचार-प्रसार करें कि लोग स्वयं आगे आकर अपनी जानकारी पोर्टल पर दर्ज करें। जियो-टैगिंग और डिमारकेशन के माध्यम से हर घर का एक डिजिटल पता सुनिश्चित किया जा रहा है, जो भविष्य में आपदा प्रबंधन, स्वास्थ्य सेवाओं और राशन वितरण जैसी सरकारी योजनाओं के ‘टारगेटेड’ क्रियान्वयन में मील का पत्थर साबित होगा।

प्रशासनिक जवाबदेही: डीएम को हर सुबह करना होगा ‘कैलकुलेशन’

​प्रत्यय अमृत ने जिलाधिकारियों को सचेत करते हुए कहा कि जनगणना कोई ‘साइड प्रोजेक्ट’ नहीं है, बल्कि यह एक राष्ट्रीय दायित्व है। उन्होंने निर्देश दिया कि सभी जिलाधिकारी अपने-अपने जिलों में तैनात अनुमंडल पदाधिकारियों (SDO) और अंचल अधिकारियों (CO) के साथ प्रतिदिन संवाद करें। प्रगणक सुबह कितने बजे क्षेत्र में निकले और शाम तक उन्होंने कितने ब्लॉक्स की जियो-टैगिंग पूरी की, इसका पूरा हिसाब-किताब हर दिन के अंत में तैयार होना चाहिए।

​मुख्य सचिव ने यह भी निर्देश दिया कि जिन प्रखंडों में भौगोलिक बाधाएं (जैसे पहाड़ी क्षेत्र या दियारा इलाका) ज्यादा हैं, वहां अतिरिक्त मानव संसाधन की तैनाती की जाए। अंत में, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जनगणना की शुद्धता और समयबद्धता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। धन्यवाद ज्ञापन के साथ बैठक का समापन तो हो गया, लेकिन जिलाधिकारियों के लिए एक बड़ी चुनौती की शुरुआत हो चुकी है। अब देखना होगा कि मुख्य सचिव के इस कड़े रुख के बाद अगले सात दिनों में बिहार की डिजिटल जनगणना की गाड़ी कितनी रफ्तार पकड़ती है, क्योंकि अब सुशासन की कसौटी ‘जियो-टैगिंग’ और ‘डिजिटल डेटा’ पर टिकी है।

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