​मायागंज अस्पताल की संवेदनहीनता: तड़पती रही बुजुर्ग महिला, डॉक्टरों ने बिना इलाज ‘कागजों’ के लिए खदेड़ा

भागलपुर। स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनशीलता उस वक्त दम तोड़ देती है जब जीवन बचाने के लिए बने अस्पतालों के दरवाजे केवल एक कागजी पर्ची की खातिर मरीज के लिए बंद कर दिए जाते हैं। बिहार के पूर्वी क्षेत्र के सबसे बड़े चिकित्सा केंद्र, जवाहरलाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय अस्पताल (मायागंज) की इमरजेंसी में एक बार फिर मानवता को शर्मसार करने वाला मामला सामने आया है। यहाँ मौत से जूझ रही एक 65 वर्षीय बुजुर्ग महिला को डॉक्टरों ने केवल इसलिए इलाज देने से मना कर दिया क्योंकि उसके पास नवगछिया अस्पताल की ‘रेफरल पर्ची’ नहीं थी। खून से लथपथ और दर्द से कराहती महिला को बिना किसी प्राथमिक उपचार के सदर अस्पताल भेज दिया गया। यह घटना न केवल मायागंज अस्पताल के डॉक्टरों की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करती है, बल्कि उस सरकारी दावे की भी पोल खोलती है जिसमें ‘इमरजेंसी में तुरंत इलाज’ की बात कही जाती है। जहाँ एक तरफ सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को हाई-टेक बनाने का दम भरती है, वहीं दूसरी तरफ भागलपुर के इस प्रीमियम अस्पताल में कागजी खानापूर्ति इंसान की जान से ऊपर नजर आ रही है।

दुर्घटना और बेटे का संघर्ष: सड़क से अस्पताल तक की जद्दोजहद

​इस दर्दनाक घटना की शुरुआत रविवार को नवगछिया के साहू परबत्ता इलाके में हुई। 65 वर्षीय बुजुर्ग महिला बुधनी देवी अपने गांव में सड़क किनारे खड़ी थीं, तभी एक बेकाबू मोटरसाइकिल सवार ने उन्हें जोरदार टक्कर मार दी। टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि बुजुर्ग महिला सड़क पर गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गईं। बाइक सवार मौके से फरार हो गया, लेकिन महिला का बेटा रंजन निषाद अपनी मां की जान बचाने के लिए बदहवास होकर उन्हें लेकर भागा।

​रंजन अपनी मां को लेकर स्थानीय अस्पताल जाने के बजाय सीधे भागलपुर के मायागंज अस्पताल पहुँचा। उसे उम्मीद थी कि यहाँ बड़े डॉक्टर और बेहतर सुविधाएं उसकी मां की जान बचा लेंगे। रंजन ने बताया कि वह अपनी घायल मां को लेकर ऑटो से जैसे-तैसे मायागंज इमरजेंसी पहुँचा। वहां उसने पर्ची कटवाई और अपनी मां को ट्रॉली पर लादकर डॉक्टरों के पास ले गया। उसे लगा कि उसकी मां को तुरंत स्ट्रेचर मिलेगा और इलाज शुरू होगा, लेकिन उसे नहीं पता था कि अस्पताल के भीतर का तंत्र संवेदनहीनता की पराकाष्ठा पर खड़ा है।

डॉक्टरों की जिद: इलाज से पहले मांगा ‘रेफर’ का कागज

​इमरजेंसी वार्ड में तैनात डॉक्टरों ने घायल बुधनी देवी की हालत देखने के बजाय सबसे पहले उनके साथ आए कागजों की पड़ताल शुरू की। रंजन के अनुसार, जैसे ही वह अपनी मां को लेकर डॉक्टर के पास पहुँचा, डॉक्टरों ने पहला सवाल यह किया कि “नवगछिया अस्पताल का रेफरल कागज कहाँ है?” जब रंजन ने बताया कि वह दुर्घटना के तुरंत बाद सीधे यहाँ आया है और उसकी मां की हालत गंभीर है, तो डॉक्टरों का दिल नहीं पसीजा।

​डॉक्टरों ने दो टूक शब्दों में कह दिया कि “जब तक स्थानीय अस्पताल से रेफर किए जाने का कागजात नहीं होगा, तब तक यहाँ इलाज शुरू नहीं होगा।” रंजन ने काफी मिन्नतें कीं, अपनी मां की चोट दिखाई, लेकिन नियमों की दुहाई देते हुए डॉक्टरों ने उसे वहां से जाने को कह दिया। हैरानी की बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट और स्वास्थ्य विभाग के स्पष्ट निर्देश हैं कि इमरजेंसी में आए किसी भी गंभीर मरीज को कागजी कार्रवाई के नाम पर इलाज से वंचित नहीं किया जा सकता, लेकिन मायागंज के डॉक्टरों ने इन नियमों को ताक पर रख दिया।

सदर अस्पताल बना सहारा: मायागंज की विफलता पर बड़ा तमाचा

​मायागंज अस्पताल से दुत्कारे जाने के बाद लाचार बेटा अपनी घायल मां को लेकर सदर अस्पताल पहुँचा। भागलपुर सदर अस्पताल के डॉक्टरों ने बिना किसी नखरे के और बिना किसी रेफरल पर्ची की मांग किए तुरंत बुजुर्ग महिला को अटेंड किया। वहां बुधनी देवी का इलाज शुरू हुआ और उनकी ड्रेसिंग व अन्य जरूरी जांचें की गईं। यह स्थिति मायागंज अस्पताल के प्रशासन पर एक बड़ा तमाचा है। एक तरफ जहाँ मेडिकल कॉलेज अस्पताल (मायागंज) में संसाधनों और विशेषज्ञ डॉक्टरों की भरमार है, वहां मरीज को खदेड़ा जा रहा है, और दूसरी तरफ सीमित संसाधनों वाला सदर अस्पताल मानवता की मिसाल पेश कर रहा है।

​रंजन निषाद ने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा कि अगर रास्ते में उसकी मां को कुछ हो जाता, तो इसका जिम्मेदार कौन होता? मायागंज जैसे अस्पताल में अगर दुर्घटना के शिकार मरीज को भी रेफरल पर्ची के लिए तड़पाया जाएगा, तो गरीब जनता कहाँ जाएगी? सदर अस्पताल में इलाज शुरू होने के बाद महिला की स्थिति अब स्थिर बताई जा रही है, लेकिन मायागंज में मिले उस जख्म ने परिवार को अंदर तक हिला दिया है।

अस्पताल प्रशासन का पक्ष: ‘पूछताछ होगी’ वाला पुराना राग

​इस पूरे मामले के सामने आने के बाद मायागंज अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ. सुरेश प्रसाद सिंह ने इस घटना पर अफसोस जताया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इमरजेंसी में किसी भी मरीज को रेफरल पर्ची के लिए मना करना या उसे वापस भेजना कतई स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने कहा, “ऐसा नहीं होना चाहिए था। इमरजेंसी में आए मरीज का प्राथमिक उपचार पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।”

​डॉ. सिंह ने आश्वासन दिया है कि इस मामले में संबंधित डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों से पूछताछ की जाएगी। हालांकि, मायागंज अस्पताल में इस तरह की यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी कई बार रेफरल और क्षेत्राधिकार के नाम पर मरीजों को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल दौड़ाने की खबरें आती रही हैं। प्रशासनिक अधिकारी जांच और कार्रवाई की बात तो करते हैं, लेकिन धरातल पर इमरजेंसी की व्यवस्था में कोई स्थायी बदलाव नजर नहीं आता।

नियमों की अनदेखी: क्या कागजों की कीमत जान से ज्यादा है?

​मायागंज अस्पताल की इस घटना ने स्वास्थ्य विभाग के उन दावों पर सवालिया निशान लगा दिया है, जिसमें कहा जाता है कि ‘रेफरल सिस्टम’ को सुव्यवस्थित किया गया है। नियम यह कहता है कि यदि कोई मरीज प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) या अनुमंडल अस्पताल से आता है, तो रेफरल पर्ची की आवश्यकता होती है, लेकिन दुर्घटना (Accident Case) या इमरजेंसी की स्थिति में मरीज को कहीं से भी सीधे मेडिकल कॉलेज लाया जा सकता है।

​बुधनी देवी के मामले में डॉक्टरों ने जिस ‘रेफरल पर्ची’ की मांग की, वह पूरी तरह से तर्कहीन थी। एक एक्सीडेंट विक्टिम को ऑन-द-स्पॉट इलाज की जरूरत होती है, न कि किसी कागजी औपचारिकताओं की। यह डॉक्टरों की संवेदनहीनता और काम से बचने की प्रवृत्ति को दर्शाता है। अगर मेडिकल कॉलेज जैसे संस्थानों में भी डॉक्टरों का रवैया ऐसा ही रहा, तो आम जनता का सरकारी स्वास्थ्य तंत्र से भरोसा उठना लाजमी है।

निष्कर्ष: सुधरने का नाम नहीं ले रहा मायागंज का इमरजेंसी वार्ड

​भागलपुर का मायागंज अस्पताल पूरे अंग जनपद और सीमांचल के लिए उम्मीद की किरण है, लेकिन बार-बार होने वाली ऐसी घटनाएं इस संस्थान की साख को बट्टा लगा रही हैं। एक 65 वर्षीय महिला को ट्रॉली पर लादकर एक कमरे से दूसरे कमरे तक दौड़ाना और फिर उसे दूसरे अस्पताल के लिए ‘रेफर’ कर देना, मेडिकल एथिक्स (Medical Ethics) का खुला उल्लंघन है।

​अब देखना यह होगा कि अस्पताल प्रशासन इस मामले में दोषियों पर क्या कार्रवाई करता है या फिर अन्य मामलों की तरह इसे भी फाइलों में दबा दिया जाएगा। भागलपुर के लोगों की मांग है कि इमरजेंसी वार्ड में ऐसे डॉक्टरों की तैनाती की जाए जो मरीज की जान की कीमत समझते हों, न कि केवल कागजों की गिनती करना जानते हों। बुधनी देवी तो अब सदर अस्पताल में सुरक्षित हैं, लेकिन मायागंज की इस संवेदनहीनता ने स्वास्थ्य व्यवस्था के चेहरे पर एक गहरा दाग लगा दिया है।

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