​पटना में जदयू का बड़ा मंथन: नीतीश के इस्तीफे के बाद आज चुना जाएगा विधानमंडल दल का नया चेहरा

पटना। बिहार की सत्ता में हुए ऐतिहासिक बदलाव और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भाजपा के काबिज होने के बाद अब सबकी निगाहें जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के आंतरिक सांगठनिक पुनर्गठन पर टिकी हैं। सोमवार, 20 अप्रैल 2026 को राजधानी पटना के 7, सर्कुलर रोड स्थित आवास पर जदयू विधानमंडल दल की एक अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक बुलाई गई है। यह बैठक केवल एक औपचारिक मिलन नहीं है, बल्कि नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देने और राज्यसभा की सदस्यता ग्रहण करने के बाद पैदा हुए राजनैतिक शून्य को भरने की एक गंभीर कोशिश है। सुबह 11 बजे से शुरू होने वाली इस बैठक में पार्टी के तमाम विधायक और विधान पार्षद (MLC) अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगे, जहाँ सामूहिक सहमति से विधानमंडल दल के नए नेता और उपनेता के नाम पर मुहर लगाई जाएगी। बिहार की नई एनडीए सरकार में जदयू की भूमिका और भविष्य की राजनैतिक दशा-दिशा तय करने के लिहाज से इस बैठक को ‘पावर सेंटर’ के नए पते के रूप में देखा जा रहा है।

7, सर्कुलर रोड: जदयू की राजनीति का नया केंद्र

​नीतीश कुमार द्वारा 1, अणे मार्ग (मुख्यमंत्री आवास) खाली कर 7, सर्कुलर रोड शिफ्ट होने के बाद यह पहला मौका है जब पूरी पार्टी के विधायक और पार्षद उनके नए आवास पर जुट रहे हैं। राजनैतिक गलियारों में चर्चा है कि सत्ता भले ही भाजपा के पास चली गई हो, लेकिन जदयू का रिमोट कंट्रोल आज भी नीतीश कुमार के हाथों में ही है। 11 बजे होने वाली इस बैठक की अध्यक्षता स्वयं नीतीश कुमार करेंगे, जो वर्तमान में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी निभा रहे हैं।

​बैठक का मुख्य एजेंडा विधानमंडल दल के नेता का चुनाव करना है। अब तक नीतीश कुमार स्वयं सदन के नेता हुआ करते थे, लेकिन अब जब वे राज्यसभा के सदस्य के रूप में दिल्ली की राजनीति में अपनी सक्रियता बढ़ा रहे हैं, तो बिहार विधानसभा और विधान परिषद के भीतर पार्टी के नेतृत्व को एक नया चेहरा मिलना अनिवार्य है। जदयू प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने पुष्टि की है कि बैठक की सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं और पार्टी के सभी जनप्रतिनिधियों को समय पर पहुँचने का निर्देश दिया गया है।

नेतृत्व की दौड़: विजय चौधरी और बिजेंद्र यादव के नाम सबसे आगे

​जदयू के भीतर नेतृत्व के लिए जिन नामों पर सबसे अधिक कयास लगाए जा रहे हैं, उनमें विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र प्रसाद यादव के नाम सबसे प्रमुख हैं। ये दोनों नेता न केवल नीतीश कुमार के अत्यंत करीबी माने जाते हैं, बल्कि वर्तमान सम्राट् चौधरी सरकार में उपमुख्यमंत्री के रूप में भी शपथ ले चुके हैं।

  • विजय कुमार चौधरी: अपनी सौम्य छवि और संसदीय कार्यों के गहरे अनुभव के लिए जाने जाने वाले विजय कुमार चौधरी को नेतृत्व की दौड़ में सबसे आगे माना जा रहा है। वे पहले भी बिहार विधानसभा के अध्यक्ष रह चुके हैं और सत्ता व संगठन के बीच बेहतर समन्वय बिठाने में माहिर माने जाते हैं।
  • बिजेंद्र प्रसाद यादव: पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेताओं में शुमार और सीमांचल की राजनीति के धुरंधर बिजेंद्र यादव का कद भी बहुत बड़ा है। हालांकि, स्वास्थ्य कारणों से उनकी सक्रियता पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन उनकी अनुभवहीनता को नजरअंदाज करना पार्टी के लिए मुश्किल है।

​बैठक में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या पार्टी किसी एक नाम पर आम सहमति बनाती है या फिर नीतीश कुमार अपनी ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का कोई नया फार्मूला पेश करते हैं। विधानमंडल दल का नेता वही बनेगा जो न केवल पार्टी को एकजुट रख सके, बल्कि भाजपा के साथ चल रही नई सरकार में जदयू के हितों की रक्षा भी कर सके।

नीतीश कुमार की नई भूमिका: राष्ट्रीय अध्यक्ष और मार्गदर्शक

​नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद छोड़ना और राज्यसभा जाना, बिहार की राजनीति के एक युग का अंत माना जा रहा है। लेकिन, 20 अप्रैल की यह बैठक संकेत दे रही है कि नीतीश कुमार अभी ‘रिटायरमेंट’ के मूड में बिल्कुल नहीं हैं। वे राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में पार्टी के हर छोटे-बड़े फैसले को सीधे तौर पर प्रभावित कर रहे हैं। आज की बैठक में भी उनके संबोधन पर सबकी नजर रहेगी, जहाँ वे कार्यकर्ताओं और विधायकों को एनडीए गठबंधन के भीतर जदयू की स्थिति और 2027 की संभावित जनगणना व परिसीमन जैसी चुनौतियों पर अपनी बात रख सकते हैं।

​जानकारों का मानना है कि नीतीश कुमार अब खुद को ‘किंग’ के बजाय ‘किंगमेकर’ की भूमिका में ढाल चुके हैं। 7, सर्कुलर रोड से वे न केवल बिहार की पल-पल की राजनैतिक गतिविधियों पर नजर रख रहे हैं, बल्कि दिल्ली में राज्यसभा सदस्य के रूप में भी उनकी सक्रियता बढ़ने वाली है। आज की बैठक में वे अपने उत्तराधिकारी (विधायक दल के नेता) को चुनकर शासन की जिम्मेदारियों से खुद को पूरी तरह मुक्त कर सांगठनिक विस्तार पर ध्यान केंद्रित करेंगे।

निशांत कुमार की अनुपस्थिति और सांगठनिक रणनीति

​इस पूरी राजनैतिक हलचल के बीच नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार की भूमिका को लेकर भी काफी चर्चाएं रही हैं। हाल ही में यह खबरें आई थीं कि उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाया जा सकता है, लेकिन उन्होंने स्वयं पद स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। निशांत कुमार ने स्पष्ट किया है कि वे फिलहाल किसी सरकारी पद के बजाय संगठन को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं से मिलने के लिए पूरे बिहार का दौरा करेंगे।

​20 अप्रैल की इस बैठक में भी निशांत कुमार की सक्रियता पर सबकी निगाहें रहेंगी। हालांकि वे विधायक या पार्षद नहीं हैं, लेकिन पार्टी के भीतर उनकी बढ़ती स्वीकार्यता को देखते हुए यह माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में संगठन के भीतर उन्हें कोई बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है। आज की बैठक में विधायकों के साथ संवाद के दौरान नीतीश कुमार पार्टी के ‘नेक्स्ट जेनरेशन’ प्लान पर भी कोई बड़ा इशारा कर सकते हैं।

नई सरकार में जदयू का वजूद और संतुलन

​सम्राट् चौधरी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार में जदयू एक सहयोगी की भूमिका में है, जहाँ उसके दो वरिष्ठ नेता उपमुख्यमंत्री हैं। ऐसे में विधानमंडल दल के नेता का चयन काफी संतुलित होना चाहिए। नेता ऐसा होना चाहिए जो मुख्यमंत्री सम्राट् चौधरी के साथ तालमेल बिठा सके और साथ ही जदयू के स्वतंत्र वजूद को भी बरकरार रख सके।

​विपक्ष अक्सर आरोप लगाता रहा है कि भाजपा धीरे-धीरे जदयू को निगलने की कोशिश कर रही है। आज की बैठक में विधायकों का फीडबैक यह तय करेगा कि जदयू इस गठबंधन में कितनी मजबूती से अपनी बात रख पा रही है। पदों के बंटवारे और विभागों के काम-काज को लेकर अगर विधायकों के मन में कोई असंतोष है, तो आज 7, सर्कुलर रोड की चारदीवारी के भीतर वह खुलकर सामने आ सकता है।

निष्कर्ष: जदयू के नए सफर की शुरुआत

​20 अप्रैल 2026 की यह तिथि बिहार की राजनीति में जदयू के लिए एक ‘ट्रांजिशन पीरियड’ (संक्रमण काल) का अंत है। नीतीश कुमार के बिना जदयू विधानमंडल दल का चलना एक नई और चुनौतीपूर्ण शुरुआत है। आज जब 11 बजे बैठक की कार्यवाही शुरू होगी, तो वह केवल एक नेता का चुनाव नहीं होगा, बल्कि यह इस बात का लिटमस टेस्ट भी होगा कि नीतीश कुमार की अनुपस्थिति में पार्टी के भीतर कितनी एकजुटता बची है।

​विजय कुमार चौधरी या बिजेंद्र यादव, जो भी आज चुना जाएगा, उसके कंधों पर बिहार की जनता की उम्मीदों और नीतीश कुमार की विरासत को सँभालने का दोहरा भार होगा। दोपहर तक जब बैठक के नतीजे सामने आएंगे, तो बिहार की राजनीति में एक नया शक्ति केंद्र (Power Center) स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगेगा। फिलहाल, 7, सर्कुलर रोड के बाहर समर्थकों का जमावड़ा यह बताने के लिए काफी है कि जदयू अभी भी बिहार की सियासत की धुरी बनी हुई है।

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