APK फाइल और फर्जी ट्रस्ट का जाल: बरेली में करोड़ों के डिजिटल स्कैम का भंडाफोड़, डॉक्टर समेत 5 अरेस्ट, चीन कनेक्शन उजागर

बरेली, 19 अप्रैल 2026। उत्तर प्रदेश के बरेली में साइबर अपराध की दुनिया से जुड़ा एक बड़ा खुलासा सामने आया है, जहां पुलिस ने करोड़ों रुपये की ठगी करने वाले अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़े गिरोह का भंडाफोड़ किया है। इस गिरोह की खास बात यह है कि इसमें एक होम्योपैथिक डॉक्टर भी शामिल था, जो ठगी की रकम को सिस्टम के जरिए घुमाने में अहम भूमिका निभाता था। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जबकि गिरोह का सरगना अभी फरार है और उसकी तलाश जारी है।

कैंट थाना पुलिस को इस गिरोह की सूचना मुखबिर के जरिए मिली थी। इसके बाद थाना प्रभारी संजय धीर के नेतृत्व में पुलिस टीम ने कृष्णा कॉलोनी रोड पर घेराबंदी की। यहां एक संदिग्ध काली कार में बैठे पांच लोगों को हिरासत में लिया गया। पूछताछ के दौरान आरोपियों की पहचान शाकिब अली, राजकुमार, आशीष सिंह, डॉक्टर सचेंद्र कुमार और बब्लू उर्फ माधोराम के रूप में हुई। पुलिस के अनुसार, इनमें से तीन आरोपी बरेली के, एक अंबेडकर नगर का डॉक्टर और एक बाराबंकी का निवासी है।

जांच में सामने आया कि यह गिरोह केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका सीधा संपर्क चीन के साइबर अपराधियों से था। आरोपी WhatsApp ग्रुप के जरिए विदेशी साइबर ठगों से जुड़े हुए थे और उनके निर्देश पर देशभर में ठगी की घटनाओं को अंजाम देते थे। इस नेटवर्क के जरिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर लोगों को निशाना बनाया जाता था।

गिरोह का काम करने का तरीका बेहद सुनियोजित और तकनीकी रूप से उन्नत था। ये लोग APK फाइल और फर्जी मोबाइल एप्लिकेशन के जरिए लोगों के स्मार्टफोन में सेंध लगाते थे। जैसे ही कोई व्यक्ति इन फाइलों को डाउनलोड करता, उसका फोन हैक हो जाता और आरोपी उसके बैंक खातों तक पहुंच बना लेते। इसके बाद चंद मिनटों में खाते से रकम निकाल ली जाती थी।

इसके अलावा गिरोह “डिजिटल अरेस्ट” और “ऑनलाइन ट्रेडिंग” जैसे नए तरीकों का इस्तेमाल करता था। लोगों को फोन कर या मैसेज के जरिए डराया जाता कि उनके खिलाफ कोई केस दर्ज है या वे किसी बड़ी जांच एजेंसी की निगरानी में हैं। इस डर का फायदा उठाकर उनसे पैसे ट्रांसफर कराए जाते थे। वहीं, कई लोगों को ट्रेडिंग में निवेश का लालच देकर भी ठगी की जाती थी।

पुलिस जांच में यह भी खुलासा हुआ कि इस गिरोह ने “एसआर संस एंड ग्रुप्स ट्रस्ट” नाम से एक फर्जी ट्रस्ट बनाया हुआ था। इसी ट्रस्ट के नाम पर कई बैंक खाते खोले गए थे, जिनका इस्तेमाल ठगी की रकम को इधर-उधर घुमाने के लिए किया जाता था। ट्रस्ट के नाम पर खाता होने के कारण बैंकिंग सिस्टम में बड़े लेनदेन पर तुरंत संदेह नहीं होता था, जिससे गिरोह को फायदा मिलता था।

इस पूरे नेटवर्क में डॉक्टर सचेंद्र कुमार की भूमिका बेहद अहम थी। ठगी से जो भी पैसा आता था, वह सबसे पहले उनके बैंक खाते में जमा किया जाता था। इसके बाद इस रकम को अलग-अलग खातों में ट्रांसफर किया जाता था ताकि ट्रैकिंग मुश्किल हो सके। पुलिस के अनुसार, डॉक्टर इस रकम में से करीब 15 प्रतिशत हिस्सा खुद रखता था, जबकि बाकी रकम गिरोह के अन्य सदस्यों और सरगना सुमित तक पहुंचाई जाती थी।

पूछताछ में आरोपी शाकिब ने एक और चौंकाने वाला खुलासा किया। उसने बताया कि उसने साइबर ठगी के गुर तिहाड़ जेल में सीखे थे, जहां कुछ अन्य अपराधियों से उसका संपर्क हुआ था। जेल से बाहर आने के बाद उसने अपने साथियों के साथ मिलकर इस गिरोह का गठन किया और धीरे-धीरे इसे एक बड़े नेटवर्क में बदल दिया।

पुलिस को जांच के दौरान आरोपियों के पास से कई अहम सबूत भी मिले हैं। इनमें लैपटॉप, मोबाइल फोन, फर्जी दस्तावेज, चेकबुक, एटीएम कार्ड, आधार और पैन कार्ड की कॉपियां शामिल हैं। इसके अलावा एक तमंचा और कारतूस भी बरामद किए गए हैं, जो इस गिरोह के आपराधिक नेटवर्क की गंभीरता को दर्शाते हैं।

जांच में यह भी सामने आया है कि इस गिरोह से जुड़े करीब 22 बैंक खातों के जरिए देशभर में ठगी की गई। इन खातों के माध्यम से करोड़ों रुपये का लेनदेन हुआ है। नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) पर इन खातों के खिलाफ सैकड़ों शिकायतें दर्ज हैं। एक मामले में ही करीब 1.55 करोड़ रुपये की ट्रेडिंग ठगी का मामला सामने आया है, जिससे इस गिरोह की व्यापक पहुंच का अंदाजा लगाया जा सकता है।

पुलिस अधिकारियों के अनुसार, इस गिरोह का सरगना सुमित है, जो लखनऊ में रहकर पूरे नेटवर्क को ऑपरेट करता था। वह WhatsApp के जरिए सभी सदस्यों को निर्देश देता था और ठगी के नए-नए तरीके सिखाता था। फिलहाल वह फरार है और उसकी गिरफ्तारी के लिए पुलिस लगातार छापेमारी कर रही है।

इस मामले ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि साइबर अपराधी अब पहले से कहीं ज्यादा संगठित और तकनीकी रूप से सक्षम हो चुके हैं। वे न केवल देश के भीतर, बल्कि अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, जिससे उन्हें पकड़ना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

बरेली पुलिस की इस कार्रवाई को बड़ी सफलता माना जा रहा है, क्योंकि इससे एक बड़े साइबर गिरोह का पर्दाफाश हुआ है। हालांकि जांच अभी जारी है और पुलिस को उम्मीद है कि आगे और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं।

इस घटना ने आम लोगों के लिए भी एक बड़ा सबक छोड़ा है। किसी भी अनजान लिंक, APK फाइल या संदिग्ध ऐप को डाउनलोड करने से बचना चाहिए और किसी भी तरह के लालच या डर के झांसे में आकर अपनी बैंकिंग जानकारी साझा नहीं करनी चाहिए।

कुल मिलाकर, बरेली में सामने आया यह साइबर ठगी का मामला न केवल अपराध की बदलती प्रकृति को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि डिजिटल युग में सतर्कता और जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव है।

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