बिहार विधानसभा में बदलेगा सत्ता का दृश्य: 20 साल बाद विश्वास मत के दिन नजर नहीं आएंगे नीतीश कुमार

पटना, 19 अप्रैल 2026। बिहार की राजनीति एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है और इसका असर अब विधानसभा के भीतर भी साफ तौर पर देखने को मिलेगा। 24 अप्रैल को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी सरकार के विश्वास मत के लिए बुलाई गई विशेष बैठक में एक ऐतिहासिक दृश्य देखने को मिलेगा—पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस दिन सदन में मौजूद नहीं रहेंगे। लगभग दो दशकों तक बिहार की राजनीति और विधानसभा की कार्यवाही के केंद्र में रहे नीतीश कुमार की गैरमौजूदगी इस बैठक को खास बना रही है।

यह पहली बार होगा जब इतने लंबे समय के बाद सदन का दृश्य पूरी तरह बदला हुआ नजर आएगा। 2005 से लेकर अब तक नीतीश कुमार ने बिहार की राजनीति में एक स्थायी उपस्थिति बनाए रखी थी। 20 नवंबर 2005 को मुख्यमंत्री बनने के बाद से उन्होंने विधानसभा की कार्यवाही में लगातार सक्रिय भूमिका निभाई। 14वीं विधानसभा की पहली बैठक 28 नवंबर 2005 को हुई थी और तब से लेकर अब तक, लगभग हर महत्वपूर्ण सत्र में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री के आसन पर दिखाई देते रहे।

हालांकि इस लंबे कार्यकाल में एक छोटा सा अपवाद जरूर रहा, जब मई 2014 से फरवरी 2015 तक जीतन राम मांझी मुख्यमंत्री थे। उस दौरान विधानसभा की तीन बैठकों में नीतीश कुमार शामिल नहीं हुए थे। लेकिन इसके बाद 11 मार्च 2015 को 15वीं विधानसभा की बैठक में उन्होंने फिर से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और मुख्यमंत्री के रूप में सक्रिय भूमिका निभाते रहे। अब 2026 में, करीब 20 साल बाद एक बार फिर ऐसा अवसर आया है जब वे सदन की कार्यवाही से दूर रहेंगे।

इस बार की बैठक केवल उनकी अनुपस्थिति के कारण ही नहीं, बल्कि सदन के भीतर बैठने की व्यवस्था में होने वाले बड़े बदलाव के कारण भी चर्चा में है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी अब सदन नेता की उस पारंपरिक सीट पर बैठेंगे, जहां वर्षों तक नीतीश कुमार बैठते रहे। यह बदलाव केवल सीट का नहीं, बल्कि सत्ता के केंद्र में आए परिवर्तन का प्रतीक माना जा रहा है।

ट्रेजरी बेंच की पहली पंक्ति में बैठने की व्यवस्था में भी बदलाव होगा। पहले जहां सम्राट चौधरी, नीतीश कुमार के बगल में बैठते थे, अब वे खुद मुख्यमंत्री के रूप में मुख्य स्थान पर होंगे। उनके बगल में उप मुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी बैठेंगे, जो लंबे समय से विधानसभा की राजनीति में सक्रिय रहे हैं और 2015 से 2020 के बीच विधानसभा अध्यक्ष भी रह चुके हैं। उनकी वरिष्ठता और अनुभव को देखते हुए उन्हें प्रमुख स्थान दिया जाना स्वाभाविक माना जा रहा है।

दूसरे उप मुख्यमंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव की सीट भी पहली पंक्ति में ही आरक्षित रहेगी। वे 2005 से लगातार नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल का हिस्सा रहे हैं और बिहार की राजनीति में एक अनुभवी चेहरे के रूप में जाने जाते हैं। इस नई व्यवस्था में उनकी भूमिका भी महत्वपूर्ण बनी रहेगी।

नीतीश कुमार के लंबे राजनीतिक सफर को देखें तो उनके कार्यकाल में कुल छह उप मुख्यमंत्री रहे हैं। इनमें सुशील कुमार मोदी, सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा ऐसे नेता रहे हैं, जिन्हें दो-दो बार उप मुख्यमंत्री के रूप में काम करने का अवसर मिला। इनमें से सम्राट चौधरी अब मुख्यमंत्री बन चुके हैं, जो अपने आप में एक बड़ा राजनीतिक बदलाव है।

इस विश्वास मत के दौरान पूर्व उप मुख्यमंत्री विजय सिन्हा की सीट को लेकर भी काफी चर्चा है। वे दो बार उप मुख्यमंत्री रह चुके हैं और इस विधानसभा के अध्यक्ष भी रहे हैं। उनकी बैठने की जगह को लेकर राजनीतिक हलकों में खास दिलचस्पी देखी जा रही है। हालांकि सामान्य परिस्थितियों में ट्रेजरी बेंच की पहली कतार मंत्रियों के लिए आरक्षित होती है, लेकिन विशेष सत्रों में बैठने की व्यवस्था में बदलाव भी संभव होता है।

इसके अलावा, पूर्व उप मुख्यमंत्री तारकिशोर प्रसाद और रेणु देवी, जो अब विधायक हैं, वे सामान्य विधायकों की सीट पर बैठेंगे। यह भी एक बड़ा बदलाव है, क्योंकि पहले ये नेता सत्ता के केंद्र में प्रमुख भूमिकाओं में नजर आते थे।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 24 अप्रैल का यह विश्वास मत केवल एक संवैधानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में शक्ति संतुलन के बदलाव का प्रतीक होगा। नीतीश कुमार की अनुपस्थिति और सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री के रूप में सदन का नेतृत्व करना, दोनों ही घटनाएं राज्य की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत का संकेत देती हैं।

यह बदलाव केवल व्यक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस राजनीतिक संक्रमण को भी दर्शाता है, जिसमें बिहार की राजनीति अब नए नेतृत्व और नई दिशा की ओर बढ़ रही है। जहां एक ओर नीतीश कुमार का लंबा अनुभव और उनकी राजनीतिक शैली राज्य की राजनीति को प्रभावित करती रही है, वहीं अब सम्राट चौधरी के नेतृत्व में एक नई राजनीतिक संरचना उभरती हुई दिखाई दे रही है।

24 अप्रैल को होने वाला विश्वास मत इस बात का भी संकेत देगा कि नई सरकार को विधानसभा में कितना समर्थन प्राप्त है और वह कितनी मजबूती से आगे बढ़ सकती है। लेकिन इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह होगा कि इस दिन सदन का जो दृश्य सामने आएगा, वह बिहार की राजनीति में हुए बड़े बदलाव का प्रतीक बनेगा।

कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि बिहार विधानसभा में 20 साल बाद जो बदलाव देखने को मिलने जा रहा है, वह केवल सीटों की अदला-बदली नहीं, बल्कि सत्ता के केंद्र में आए परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह नया नेतृत्व राज्य की राजनीति को किस दिशा में ले जाता है और क्या यह बदलाव स्थायी रूप ले पाता है या नहीं।

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