
पटना, 19 अप्रैल 2026। बिहार में शराबबंदी को लेकर एक बार फिर सियासी बहस तेज हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री और हम (हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा) के संरक्षक जीतन राम मांझी ने इस कानून पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इसकी मंशा भले ही सही हो, लेकिन इसे लागू करने के तरीके में गंभीर खामियां हैं। उनका कहना है कि इस कानून का सबसे ज्यादा असर गरीब और कमजोर तबके पर पड़ रहा है, जबकि बड़े स्तर पर अवैध कारोबार करने वाले माफिया बेखौफ हैं।
पटना एयरपोर्ट पर मीडिया से बातचीत के दौरान मांझी ने कहा कि कागज पर शराबबंदी एक आदर्श नीति नजर आती है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। उन्होंने कहा कि यह कानून गरीबों के लिए मुश्किलें बढ़ाने वाला और माफियाओं के लिए फायदेमंद बनता जा रहा है। उनके अनुसार, नीति का उद्देश्य समाज को नशामुक्त बनाना था, लेकिन क्रियान्वयन में खामियों के कारण इसका असर उल्टा पड़ रहा है।
मांझी ने आरोप लगाया कि पुलिस की कार्रवाई अक्सर गरीब मजदूरों और कमजोर वर्ग तक सीमित रह जाती है। उन्होंने कहा कि जो लोग दिनभर मेहनत-मजदूरी करते हैं, वे छोटे-मोटे मामलों में गिरफ्तार कर लिए जाते हैं और लंबे समय तक जेल में रहते हैं। इससे उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति पर गंभीर असर पड़ता है। इसके विपरीत, बड़े शराब माफिया और संगठित गिरोह इस कानून के बावजूद सक्रिय हैं और उन पर अपेक्षित सख्ती नहीं दिखाई देती।
उन्होंने यह भी कहा कि शराबबंदी के कारण अवैध शराब का कारोबार तेजी से फैल रहा है। माफिया ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए जहरीले रसायनों और यूरिया का इस्तेमाल कर शराब बना रहे हैं, जो लोगों की जान के लिए खतरा बन गया है। मांझी के अनुसार, बिहार के कई ग्रामीण इलाकों में जहरीली शराब पीने से युवाओं की मौतें हो रही हैं, जो बेहद चिंताजनक स्थिति है।
मांझी ने कहा कि जिस कानून को लोगों की जान बचाने और समाज को स्वस्थ बनाने के लिए लागू किया गया था, वही अब अप्रत्यक्ष रूप से जानलेवा साबित हो रहा है। उन्होंने सरकार से अपील की कि इस नीति की व्यावहारिक समीक्षा की जाए और इसमें मौजूद खामियों को दूर किया जाए।
राज्य में हाल ही में हुए राजनीतिक बदलाव का जिक्र करते हुए मांझी ने नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से उम्मीद जताई। उन्होंने कहा कि नई सरकार को काम करने के लिए समय देना चाहिए, लेकिन यह भी जरूरी है कि वह शराबबंदी कानून को लेकर जमीनी स्थिति का आकलन करे और जरूरी सुधार करे।
मांझी ने सुझाव दिया कि कानून के क्रियान्वयन में संतुलन और पारदर्शिता लाने की जरूरत है। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि कार्रवाई केवल गरीबों तक सीमित न रहे, बल्कि बड़े नेटवर्क और माफिया गिरोहों पर भी सख्ती हो। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य को राजस्व के नुकसान और सामाजिक प्रभावों को ध्यान में रखते हुए एक संतुलित नीति पर विचार करना चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि वे शराबबंदी के विरोध में नहीं हैं, बल्कि इसके लागू करने के तरीके में सुधार चाहते हैं। उनका मानना है कि किसी भी नीति की सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। यदि जमीनी स्तर पर खामियां हों, तो अच्छी से अच्छी नीति भी अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर पाती।
बिहार में शराबबंदी लंबे समय से एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा रहा है। सरकार जहां इसे सामाजिक सुधार की दिशा में बड़ा कदम मानती है, वहीं विपक्ष और कई सामाजिक संगठनों ने इसके क्रियान्वयन पर सवाल उठाए हैं। मांझी का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब राज्य में नई सरकार अपनी नीतियों और प्राथमिकताओं को तय कर रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि शराबबंदी जैसे संवेदनशील मुद्दे पर संतुलित दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है। इसमें कानून का सख्ती से पालन तो हो, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि कमजोर और निर्दोष लोग अनावश्यक रूप से प्रभावित न हों। साथ ही अवैध शराब के नेटवर्क को खत्म करने के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाए जाएं।
कुल मिलाकर, मांझी का यह बयान बिहार में शराबबंदी को लेकर जारी बहस को एक बार फिर तेज कर रहा है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नई सरकार इस मुद्दे पर क्या कदम उठाती है और क्या इस नीति में कोई बदलाव देखने को मिलता है।


