​बिहार की मिट्टी में दबे ‘श्रीमद् धर्म विहार’ का उदय: विश्व धरोहर दिवस पर पुरातात्विक रहस्यों से उठा पर्दा

पटना। बिहार की धरती को अगर ‘इतिहास की जननी’ कहा जाए, तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। सदियों से इस मिट्टी ने अपने भीतर न जाने कितने साम्राज्य, सभ्यताएं और ज्ञान के केंद्र समेटे हुए हैं। शनिवार, 18 अप्रैल 2026 को ‘विश्व धरोहर दिवस’ के पावन अवसर पर पटना स्थित बिहार संग्रहालय के ओरिएंटेशन सभागार में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी ने इसी गौरवशाली अतीत को आधुनिक विज्ञान की रोशनी में प्रस्तुत किया। कला एवं संस्कृति विभाग, बिहार और बिहार विरासत विकास समिति के साझा प्रयासों से आयोजित इस संगोष्ठी का मुख्य विषय “समकालीन पुरातात्विक उत्खनन” रहा। इस बौद्धिक विमर्श का सबसे बड़ा आकर्षण लखीसराय के ‘लाल पहाड़ी’ उत्खनन पर आधारित एक महत्वपूर्ण शोध पुस्तक का विमोचन और देश के दिग्गज पुरातत्वविदों द्वारा पेश किए गए नए साक्ष्य रहे, जो बिहार को विश्व मानचित्र पर एक बार फिर ‘साधना और शिक्षा’ के केंद्र के रूप में स्थापित करते हैं।

ज्ञान की मशाल: संगोष्ठी का भव्य उद्घाटन

​संगोष्ठी की शुरुआत बिहार विरासत विकास समिति के कार्यपालक निदेशक कृष्ण कुमार, सांस्कृतिक कार्य की निदेशक रूबी, और भारतीय विरासत संस्थान, नई दिल्ली के पूर्व कुलपति पद्मश्री प्रो. बुद्ध रश्मि मणि के हाथों हुई। इस अवसर पर नव नालंदा महाविहार के कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह, विश्व भारती विश्वविद्यालय के प्रो. अनिल कुमार और कोलकाता विश्वविद्यालय के डॉ. रजत सन्याल जैसे दिग्गजों ने दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का आगाज किया।

​उद्घाटन सत्र में विशेषज्ञों ने एक स्वर में कहा कि विरासत केवल अतीत का अवशेष नहीं है, बल्कि यह हमारी पहचान का आधार है। बिहार की मिट्टी की परतों में दबे इतिहास की धड़कनें अब वैज्ञानिक शोध की कसौटी पर अपनी पहचान साबित कर रही हैं। वक्ताओं ने रेखांकित किया कि पुरातत्व विज्ञान के बिना हम अपने उन पूर्वजों के बारे में कभी नहीं जान पाते, जिनके बारे में कोई लिखित प्रमाण मौजूद नहीं है।

‘लाल पहाड़ी’ का रहस्य: श्रीमद् धर्म विहार की पुनर्स्थापना

​संगोष्ठी के दौरान एक ऐतिहासिक क्षण तब आया जब “रीससिटेशन ऑफ श्रीमद् धर्म विहार: द फॉरगॉटन हिलटॉप मोनास्ट्री ऑफ गंगा वैली” (श्रीमद् धर्म विहार का पुनरुद्धार: गंगा घाटी का विस्मृत पहाड़ी मठ) नामक पुस्तक का विमोचन किया गया। यह पुस्तक लखीसराय के लाल पहाड़ी पर 2017 से 2021 के बीच हुए उत्खनन की विस्तृत रिपोर्ट है। प्रो. अनिल कुमार द्वारा लिखित और डॉ. अमित रंजन द्वारा संपादित यह कृति पुरातत्व प्रेमियों के लिए किसी अमूल्य धरोहर से कम नहीं है।

​विमोचन के बाद प्रो. अनिल कुमार ने अपने संबोधन में बताया कि लाल पहाड़ी पर खुदाई के दौरान जो साक्ष्य मिले हैं, वे इस बात की पुष्टि करते हैं कि गंगा घाटी में ‘श्रीमद् धर्म विहार’ नामक एक अत्यंत महत्वपूर्ण बौद्ध मठ मौजूद था। यह मठ न केवल धार्मिक गतिविधियों का केंद्र था, बल्कि रणनीतिक रूप से पहाड़ी की चोटी पर स्थित होने के कारण इसका विशेष महत्व था। उन्होंने कहा कि यह खोज गंगा घाटी के बौद्ध मठीय इतिहास को एक नया दृष्टिकोण देती है और साबित करती है कि प्राचीन बिहार में साधना के केंद्र केवल मैदानी इलाकों तक सीमित नहीं थे, बल्कि दुर्गम पहाड़ियों पर भी ज्ञान की लौ जल रही थी।

सारनाथ के नए साक्ष्य और विश्व धरोहर की संभावना

​पद्मश्री प्रो. बी.आर. मणि ने अपने विशेष व्याख्यान में सारनाथ में 2013-14 के दौरान हुए उत्खनन के नवीन निष्कर्षों को साझा किया। उन्होंने बताया कि सारनाथ में मिले ताजा साक्ष्यों ने इसके ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व को और अधिक पुख्ता कर दिया है। प्रो. मणि ने इस बात पर जोर दिया कि वैज्ञानिक उत्खनन के माध्यम से इतिहास के उन ‘अंधेरे कोनों’ को प्रकाशित किया जा सकता है जो पांडुलिपियों में दर्ज नहीं हो सके।

​सबसे महत्वपूर्ण बात जो उन्होंने कही, वह बिहार के पुरातात्विक स्थलों की उपेक्षा और संभावनाओं से जुड़ी थी। उन्होंने कहा कि सारनाथ की तरह बिहार के कई अन्य स्थलों में भी ‘विश्व धरोहर’ बनने की पूरी क्षमता है। उन्होंने सरकार और समाज से अपील की कि इन स्थलों का न केवल संरक्षण किया जाए, बल्कि इन्हें पर्यटन के बड़े केंद्रों के रूप में विकसित किया जाए। प्रो. मणि के अनुसार, बिहार की विरासत केवल बिहार की नहीं, बल्कि पूरी मानवता की साझी पूंजी है।

बौद्ध मठीय परंपरा: पूर्वी भारत का विस्तार

​संगोष्ठी में पूर्वी भारत की मठीय परंपरा पर भी विस्तृत चर्चा हुई। नव नालंदा महाविहार के कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने भारतीय बौद्ध परंपरा के संरक्षण पर बल देते हुए कहा कि बिहार प्राचीन काल से ही वैश्विक शिक्षा का केंद्र रहा है। उन्होंने कहा कि नालंदा, विक्रमशिला और अब श्रीमद् धर्म विहार जैसे स्थल इस बात के गवाह हैं कि ज्ञान का असली स्रोत इसी मिट्टी से फूटा है।

​वहीं, कोलकाता विश्वविद्यालय के डॉ. रजत सन्याल ने पश्चिम बंगाल और बिहार के बीच के बौद्ध मठीय संबंधों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि पूर्वी भारत में बौद्ध मठों का एक बड़ा जाल फैला हुआ था, जिसमें बिहार का नेतृत्व सर्वोपरि था। उनके अनुसार, मठीय परंपरा के अध्ययन से हमें उस काल के सामाजिक-आर्थिक ढांचे को समझने में भी मदद मिलती है। संगोष्ठी में मौजूद अन्य विद्वानों ने भी प्राचीन संस्कृति, इतिहास और पुरातत्व के आपसी संबंधों पर अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।

वैज्ञानिक उत्खनन: इतिहास लेखन की आधुनिक कसौटी

​संगोष्ठी का एक मुख्य संदेश यह था कि आज का पुरातत्व विज्ञान केवल फावड़ा और टोकरी का खेल नहीं है, बल्कि यह रडार, सैटेलाइट इमेजरी और कार्बन डेटिंग जैसी अत्याधुनिक तकनीकों का संगम है। विशेषज्ञों ने बताया कि समकालीन पुरातत्व में हम ‘नॉन-डिस्ट्रक्टिव’ तरीकों का उपयोग कर रहे हैं, जिससे जमीन के नीचे दबी संरचनाओं को बिना नुकसान पहुँचाए पहचाना जा सकता है।

​बिहार विरासत विकास समिति के कार्यपालक निदेशक कृष्ण कुमार ने कहा कि विरासत का संरक्षण केवल उसे बचाना नहीं है, बल्कि उसे अगली पीढ़ी को गर्व के साथ सौंपना है। उन्होंने बताया कि विभाग लगातार राज्य के विभिन्न हिस्सों में उत्खनन और सर्वेक्षण कार्य कर रहा है ताकि गुमनाम पड़े स्थलों को पहचान मिल सके। सांस्कृतिक कार्य की निदेशक रूबी ने कला और संस्कृति के माध्यम से इन स्थलों को जन-जन तक पहुँचाने की आवश्यकता जताई।

विरासत का भविष्य: चुनौतियों और अवसरों के बीच बिहार

​विश्व धरोहर दिवस पर पटना में आयोजित यह संगोष्ठी इस निष्कर्ष के साथ समाप्त हुई कि बिहार का पुरातत्व अभी भी ‘अनछुई संभावनाओं’ का भंडार है। लाल पहाड़ी जैसी खोजें तो अभी केवल शुरुआत हैं; अभी न जाने कितने ‘श्रीमद् धर्म विहार’ गंगा की गोद में अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।

​चुनौती यह है कि बढ़ते शहरीकरण और अतिक्रमण के बीच इन ऐतिहासिक स्थलों को कैसे सुरक्षित रखा जाए। विद्वानों ने एक स्वर में कहा कि जब तक स्थानीय लोग अपनी विरासत के साथ नहीं जुड़ेंगे, तब तक सरकारी प्रयास अधूरे रहेंगे। बिहार संग्रहालय का यह मंच आज उस संकल्प का गवाह बना, जहाँ विशेषज्ञों ने प्रतिज्ञा की कि वे बिहार के इतिहास की इस स्वर्णिम गाथा को दुनिया के हर कोने तक पहुँचाएंगे।

​18 अप्रैल 2026 की यह दोपहर पटना के लिए केवल एक चर्चा का विषय नहीं रही, बल्कि यह बिहार की सोई हुई विरासत को जगाने की एक नई पुकार थी। जैसे-जैसे सूरज ढला और संगोष्ठी का समापन हुआ, शोधकर्ताओं के चेहरों पर एक नई चमक थी—एक ऐसी चमक जो यह विश्वास दिलाती है कि बिहार का अतीत जितना उज्ज्वल था, उसका भविष्य भी उसकी स्मृतियों के संरक्षण से उतना ही सुनहरा होगा।

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