​शराबबंदी की समीक्षा की सुगबुगाहट: जीतन राम मांझी ने सम्राट चौधरी के पाले में डाली गेंद, कहा- लाभ-हानि देखकर होगा फैसला

पटना। बिहार में सत्ता परिवर्तन के साथ ही सूबे की सबसे चर्चित और विवादित नीतियों में शुमार ‘पूर्ण शराबबंदी’ को लेकर एक बार फिर राजनैतिक सरगर्मी तेज हो गई है। मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी के पदभार संभालने के बाद अब एनडीए के भीतर से ही इस नीति की समीक्षा की मांग उठने लगी है। केंद्रीय मंत्री और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) के संरक्षक जीतन राम मांझी ने इस संवेदनशील मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए एक बड़ा बयान दिया है। मांझी ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि शराबबंदी की नीति अपनी जगह सही हो सकती है, लेकिन इसके क्रियान्वयन (Implementation) में जो खामियां हैं, उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने उम्मीद जताई है कि नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी इस दिशा में एक ‘सोच-समझकर’ फैसला लेंगे। 18 अप्रैल 2026 को मीडिया से बातचीत के दौरान मांझी के इस बयान ने यह संकेत दे दिया है कि आने वाले दिनों में बिहार सरकार शराब नीति में कुछ बड़े बदलाव या रियायतों पर विचार कर सकती है।

सम्राट चौधरी का नेतृत्व और मांझी की उम्मीदें

​बिहार में सरकार बदले अभी महज एक हफ्ता भी नहीं बीता है कि नीतियों की समीक्षा का दौर शुरू हो गया है। जीतन राम मांझी ने सम्राट चौधरी के कामकाज की शैली पर भरोसा जताते हुए कहा कि उन्हें मुख्यमंत्री बने अभी केवल 4-5 दिन ही हुए हैं। इतने कम समय में किसी बड़ी नीति को बदल देना संभव नहीं है, लेकिन सरकार के भीतर इस पर विचार-मंथन शुरू हो चुका है। मांझी के अनुसार, सम्राट चौधरी एक व्यावहारिक राजनेता हैं और वे शराबबंदी से होने वाले ‘लाभ’ और इसके कारण हो रही ‘हानि’ का विस्तृत आकलन करेंगे।

​मांझी ने कहा कि किसी भी सरकारी फैसले का असर राज्य के राजस्व और सामाजिक ताने-बाने पर पड़ता है। शराबबंदी के कारण जहाँ एक ओर घरेलू हिंसा में कमी आने के दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर हजारों करोड़ के राजस्व का नुकसान और पर्यटन पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव को भी झुठलाया नहीं जा सकता। जीतन राम मांझी का इशारा साफ था कि सम्राट चौधरी इन तमाम पहलुओं को ध्यान में रखकर ही कोई निर्णय लेंगे। उन्होंने यह भी जोड़ा कि सरकार को यह देखना होगा कि जिस मकसद से यह कानून लाया गया था, क्या वह वास्तव में धरातल पर सफल हो पा रहा है या केवल भ्रष्टाचार का एक नया जरिया बन गया है।

“नीति अच्छी, नियत पर सवाल”: क्रियान्वयन में सुधार की जरूरत

​जीतन राम मांझी शुरू से ही शराबबंदी के कट्टर विरोधी नहीं रहे हैं, लेकिन वे इसके कड़े प्रावधानों और पुलिसिया कार्रवाई के तौर-तरीकों पर सवाल उठाते रहे हैं। शनिवार को उन्होंने फिर दोहराया कि शराबबंदी की मूल भावना यानी समाज को नशे से मुक्त करना एक अच्छी सोच है। लेकिन उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अच्छी सोच के साथ-साथ उसे लागू करने वाली मशीनरी का पारदर्शी होना भी जरूरी है। मांझी के मुताबिक, बिहार में शराबबंदी के क्रियान्वयन में बड़ी कमियां हैं, जिसकी वजह से यह कानून केवल ‘कागजी’ बनकर रह गया है।

​उन्होंने सरकार को सुझाव दिया कि शराब नीति की गहराई से समीक्षा की जानी चाहिए। समीक्षा का आधार यह होना चाहिए कि कैसे उन लोगों को रोका जाए जो इस कानून की आड़ में अवैध कमाई कर रहे हैं। मांझी ने मांग की है कि समीक्षा के बाद इसके क्रियान्वयन की प्रक्रिया को पूरी तरह दुरुस्त किया जाए। उन्होंने प्रशासन और पुलिस के निचले स्तर पर होने वाली मिलीभगत को इस कानून की विफलता का सबसे बड़ा कारण बताया। उनके इस बयान से यह साफ है कि वे पूरी तरह शराबबंदी हटाने के पक्ष में नहीं हैं, बल्कि वे इसमें लचीलापन और सुधार चाहते हैं ताकि निर्दोष लोगों को प्रताड़ित न होना पड़े।

‘2 घंटे में मिलावटी शराब’ और मौत का तांडव

​जीतन राम मांझी ने बिहार में जहरीली शराब से होने वाली मौतों के पीछे के एक डरावने सच का खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि राज्य में शराब की मांग अभी भी बनी हुई है, लेकिन आपूर्ति पर पाबंदी होने के कारण अवैध धंधेबाज ‘शॉर्टकट’ रास्ता अपना रहे हैं। मांझी के अनुसार, जल्दी मुनाफा कमाने के चक्कर में ये माफिया महज 2 घंटे के भीतर मिलावटी और खतरनाक रसायनों से युक्त शराब तैयार कर देते हैं। यही ‘जल्दबाजी वाली शराब’ दरअसल मौत का प्याला साबित होती है।

​उन्होंने दुख जताते हुए कहा कि जहरीली शराब से होने वाली मौतों की खबरें लगातार हमारे बीच आती रहती हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि शराबबंदी के बावजूद लोग शराब पी रहे हैं, बस फर्क इतना है कि अब वे ज्यादा खतरनाक और जानलेवा पेय पी रहे हैं। मांझी ने इस बात पर चिंता जताई कि जहरीली शराब का शिकार होने वालों में 90 प्रतिशत लोग गरीब और समाज के पिछड़े तबके से आते हैं। अवैध शराब के कारोबार ने एक ऐसा ‘समानांतर अर्थतंत्र’ (Parallel Economy) खड़ा कर दिया है जहाँ माफिया फल-फूल रहे हैं और गरीब अपनी जान गंवा रहे हैं।

गरीबों पर दोहरी मार: जेल और मौत का डर

​मांझी का सबसे कड़ा प्रहार इस बात पर था कि शराबबंदी कानून की सबसे ज्यादा मार बिहार के दलितों, पिछड़ों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों पर पड़ रही है। उन्होंने कहा कि जेलों में बंद अधिकांश लोग वही हैं जो एक या दो क्वार्टर शराब के साथ पकड़े गए, जबकि बड़े तस्कर और माफिया अभी भी पुलिस की पहुँच से बाहर हैं। मांझी के अनुसार, यह कानून गरीबों के लिए ‘जी का जंजाल’ बन गया है।

​उन्होंने कहा कि एक तरफ तो गरीब जहरीली शराब पीकर मर रहे हैं, और दूसरी तरफ अगर वे पकड़े जाते हैं तो उनके पास बेल कराने तक के पैसे नहीं होते। इससे उनके परिवार बर्बाद हो रहे हैं। मांझी ने सम्राट चौधरी से अपील की है कि वे इस मानवीय पक्ष को भी अपनी समीक्षा में शामिल करें। उन्होंने जोर देकर कहा कि कोई भी कानून जब गरीबों के दमन का हथियार बन जाए, तो उस पर विचार करना सरकार की नैतिक जिम्मेदारी बन जाती है। शराब नीति को बेहतर बनाकर ही इस ‘दोहरी मार’ से गरीबों को बचाया जा सकता है।

राजनैतिक मायने: क्या बदलेंगे बिहार के ‘ड्राई स्टेट’ वाले तेवर?

​बिहार में सम्राट चौधरी की सरकार में भाजपा और हम (HAM) की जोड़ी अब इस मुद्दे पर एक नई लकीर खींचने की कोशिश कर रही है। राजनैतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि भाजपा के भीतर भी एक बड़ा धड़ा शराबबंदी की समीक्षा के पक्ष में है। सम्राट चौधरी ने पदभार संभालते ही जिस तरह से फाइलों को खंगालना शुरू किया है, उससे मांझी के दावों को बल मिलता है। मांझी का यह बयान दरअसल एक ‘ट्रायल बैलून’ (Trial Balloon) की तरह देखा जा रहा है, जिससे जनता और गठबंधन सहयोगियों की प्रतिक्रिया जांची जा सके।

​यदि सम्राट चौधरी शराबबंदी में कुछ ढील देते हैं, जैसे कि ताड़ी को पूरी तरह मुक्त करना या कुछ विशेष क्षेत्रों में सीमित बिक्री की अनुमति देना, तो इससे राज्य के खजाने को भी राहत मिलेगी। बिहार फिलहाल वित्तीय संकट से गुजर रहा है और शराब से मिलने वाला राजस्व विकास कार्यों में बड़ी भूमिका निभा सकता है। मांझी ने स्पष्ट कर दिया है कि वे केवल सम्राट चौधरी के विवेक पर भरोसा कर रहे हैं और चाहते हैं कि फैसला ‘जनहित’ में हो, न कि केवल ‘राजनैतिक जिद’ के आधार पर।

प्रशासनिक चुनौती और भविष्य की राह

​जीतन राम मांझी के इस बयान के बाद अब सबकी नजरें मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के अगले कदम पर टिकी हैं। क्या वे नीतीश कुमार के इस ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ में कोई बड़ा फेरबदल करने का साहस जुटा पाएंगे? बिहार में शराबबंदी लागू हुए लगभग एक दशक होने को है, लेकिन इसके परिणाम अभी भी विवादित हैं। पुलिस विभाग के लिए शराबबंदी एक बड़ी चुनौती रही है, क्योंकि उनका अधिकांश समय और संसाधन इसी की धरपकड़ में लग जाता है, जिससे बुनियादी अपराध नियंत्रण प्रभावित होता है।

​मांझी का कहना है कि विचार और समीक्षा ही एकमात्र रास्ता है। उन्होंने आगाह किया कि अगर क्रियान्वयन को ठीक नहीं किया गया, तो मौत और भ्रष्टाचार का यह सिलसिला थमेगा नहीं। 18 अप्रैल 2026 की यह रिपोर्ट बिहार की राजनीति में एक बड़े बदलाव की आहट दे रही है। सम्राट चौधरी अब ‘लाभ-हानि’ के जिस तराजू पर इस नीति को तौलेंगे, उसका परिणाम न केवल बिहार की सामाजिक स्थिति तय करेगा, बल्कि आगामी विधानसभा चुनाव के नैरेटिव (विमर्श) को भी प्रभावित करेगा। फिलहाल, जीतन राम मांझी के इस रिएक्शन ने बिहार के उन लाखों लोगों में उम्मीद जगा दी है जो इस कानून की पेचीदगियों से परेशान रहे हैं।

  • ये भी पढ़े..

    भरत तिवारी प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच एवं दोषियों पर कार्रवाई हो : अश्विनी चौबे

    Share Add as a preferred…

    भागलपुर में धूमधाम से मनाया गया राहुल गांधी का 57वां जन्मदिन, कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने काटा केक

    Share Add as a preferred…