
पटना। बिहार की सियासत में इन दिनों चेहरों का बदलाव और सत्ता के शीर्ष पर नई नियुक्तियां सबसे बड़ा विमर्श बनी हुई हैं। नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से हटकर राज्यसभा जाने और सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही सियासी गलियारों में यह सवाल गूँज रहा है कि क्या बिहार में ‘नीतीश युग’ का अंत हो गया है? इस यक्ष प्रश्न का उत्तर मोकामा के बाहुबली विधायक अनंत सिंह ने अपने चिर-परिचित बेबाक और ठेठ अंदाज में दिया है। अनंत सिंह ने साफ कर दिया है कि भले ही नीतीश कुमार की कर्मभूमि अब पटना से बदलकर दिल्ली की राज्यसभा हो गई हो, लेकिन बिहार की सत्ता का ‘रिमोट कंट्रोल’ और ‘मालकियत’ आज भी उन्हीं के हाथों में है। 18 अप्रैल 2026 की दोपहर को मीडिया से मुखातिब होते हुए अनंत सिंह ने सत्ता के नए समीकरणों, नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार के राजनैतिक फैसलों और बिहार में लागू शराबबंदी पर ऐसी बातें कहीं, जिसने राजधानी के राजनैतिक तापमान को बढ़ा दिया है।
“मालिक वही हैं, दिल्ली कोई विदेश नहीं है”
बिहार की नई सरकार और सम्राट चौधरी के नेतृत्व को लेकर जब अनंत सिंह से सवाल पूछा गया, तो उन्होंने सत्ता के केंद्र को लेकर मची दुविधा को एक झटके में साफ कर दिया। अनंत सिंह ने कहा कि बिहार की जनता या राजनेताओं को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि नीतीश कुमार के दिल्ली जाने से उनका प्रभाव कम हो गया है। उनके शब्दों में, “नीतीश कुमार कहीं नहीं गए हैं। दिल्ली कोई विदेश में नहीं है कि वे बिहार की पहुंच से दूर हो गए। वे भले ही राज्यसभा चले गए हैं, लेकिन बिहार के असली मालिक वही रहेंगे।”
अनंत सिंह का यह तर्क सत्ता के उस स्वरूप की ओर इशारा करता है जहाँ नेतृत्व भले ही बदल गया हो, लेकिन मार्गदर्शन और विजन वही पुराना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सम्राट चौधरी की सरकार दरअसल नीतीश कुमार के ही दिशा-निर्देशों और उनके द्वारा तैयार किए गए विकास के रोडमैप पर आगे बढ़ेगी। अनंत सिंह के अनुसार, नीतीश कुमार ने उन लोगों को काम सौंपा है जिन्हें वे बेहतर काम करने वाला समझते हैं। यह बयान उन अटकलों पर एक बड़ा प्रहार है जिनमें यह कहा जा रहा था कि भाजपा के मुख्यमंत्री बनने के बाद जदयू या नीतीश कुमार की भूमिका गौण हो जाएगी। अनंत सिंह ने दोटूक लहजे में कह दिया कि सत्ता का केंद्र आज भी वही है, बस स्थान बदल गया है।
निशांत कुमार की ‘ना’ और अनंत सिंह का ‘पागलपन’ वाला बयान
बिहार की राजनीति में पिछले कुछ दिनों से नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार सबसे चर्चित नाम रहे हैं। चर्चा थी कि उन्हें बड़ी राजनैतिक जिम्मेदारी, जैसे उपमुख्यमंत्री का पद या कम से कम एमएलसी बनाकर कैबिनेट में शामिल किया जा सकता है। लेकिन निशांत कुमार ने इन तमाम प्रस्तावों को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि वे पहले जमीन पर मेहनत करेंगे और अपने दम पर कुछ मुकाम हासिल करेंगे। निशांत की इस ‘जिद’ या ‘सिद्धांत’ पर अनंत सिंह ने काफी कड़वी लेकिन राजनैतिक वास्तविकता से जुड़ी टिप्पणी की है।
अनंत सिंह ने कहा कि निशांत कुमार को मिल रही जिम्मेदारी को ठुकराना उनकी समझ से बाहर है। उन्होंने इसे एक तरह का ‘पागलपन’ करार देते हुए कहा, “अपने दम पर क्या करेंगे? यह तो पागलपन ही होगा। उन्हें तो पार्टी में रहकर सबके साथ मिलकर चलना चाहिए था। अगर वे सबकी बात मानते और नीतीश कुमार की विरासत और उनकी सीट संभालते, तो वह ज्यादा बढ़िया होता।” अनंत सिंह का मानना है कि राजनीति में जब विरासत और अवसर एक साथ दरवाजे पर दस्तक देते हैं, तो उन्हें ठुकराना राजनैतिक बुद्धिमानी नहीं है। उन्होंने यह भी साफ किया कि उनकी व्यक्तिगत रूप से निशांत से कोई बात नहीं हुई है और वे उन्हें निजी तौर पर जानते भी नहीं हैं, लेकिन एक राजनैतिक विश्लेषक के तौर पर वे इसे एक बड़ी चूक मानते हैं। अनंत सिंह के इस बयान ने बिहार में ‘वंशवाद’ बनाम ‘योग्यता’ की बहस को एक नया मोड़ दे दिया है।
शराबबंदी पर प्रहार: “सूखे नशे की गिरफ्त में है बचपन”
अनंत सिंह अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते हैं और उन्होंने एक बार फिर मुख्यमंत्री (चाहे वे कोई भी हों) की सबसे महत्वाकांक्षी योजना ‘शराबबंदी’ पर तीखा हमला बोला है। बिहार में शराबबंदी को विफल बताते हुए अनंत सिंह ने इसे तुरंत खत्म करने की अपनी पुरानी मांग को फिर से दोहराया। उनके पास इसके पीछे एक सामाजिक तर्क है। अनंत सिंह ने कहा कि शराब बंद होने का सबसे बुरा असर बिहार की युवा पीढ़ी पर पड़ा है, जो अब ‘सूखे नशे’ की ओर मुड़ गई है।
उन्होंने चिंता जताते हुए कहा, “शराब बंद होनी चाहिए थी, लेकिन अगर अब यह खुल जाए तो समाज के लिए ज्यादा ठीक होगा। छोटे-छोटा बच्चा अब सूखे नशे (स्मैक और अन्य ड्रग्स) की गिरफ्त में आ रहा है। गांव-गांव में बच्चे स्मैकियर बन रहे हैं।” अनंत सिंह का मानना है कि शराब की तुलना में स्मैक और ड्रग्स कहीं अधिक घातक हैं और ये युवाओं को अपराध की दुनिया में धकेल रहे हैं। उनका तर्क है कि अगर शराब उपलब्ध होती, तो शायद युवा इस जानलेवा सूखे नशे की ओर नहीं भागते। यह मांग ऐसे समय में आई है जब नई सरकार शराबबंदी कानून की समीक्षा की बात कर रही है। अनंत सिंह ने सीधे तौर पर कहा कि इस पर गंभीरता से विचार करने का समय आ गया है, क्योंकि नीति का उद्देश्य समाज को बचाना था, लेकिन परिणाम स्वरूप युवा पीढ़ी बर्बाद हो रही है।
सम्राट चौधरी और भाजपा के लिए संदेश
अनंत सिंह के बयानों में सम्राट चौधरी के प्रति एक प्रकार का समर्थन तो दिखा, लेकिन उन्होंने यह भी जता दिया कि भाजपा को यह नहीं भूलना चाहिए कि बिहार में नीतीश कुमार का कद क्या है। उन्होंने कहा कि सम्राट चौधरी बेहतर काम करने वाले व्यक्ति हैं और उन्हें मौका मिला है, लेकिन उन्हें ‘पुराने चावल’ (अनुभवी नेतृत्व) के सुझावों पर ही चलना होगा। अनंत सिंह का यह रुख दर्शाता है कि वे भविष्य में भी नीतीश कुमार की राजनैतिक प्रासंगिकता को कम होते नहीं देखना चाहते।
मोकामा के विधायक ने यह भी संकेत दिया कि बिहार में प्रशासनिक मशीनरी आज भी उसी कार्यसंस्कृति से बंधी हुई है जिसे नीतीश कुमार ने पिछले दो दशकों में विकसित किया है। ऐसे में किसी भी नए मुख्यमंत्री के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र होकर काम करना एक बड़ी चुनौती होगी। अनंत सिंह ने कहा कि बिहार की जनता आज भी नीतीश कुमार की ओर ही देखती है, चाहे वे दिल्ली में रहें या पटना में। यह बयान भाजपा के भीतर उन खेमों के लिए एक चेतावनी की तरह है जो राज्य में पूर्ण ‘भगवाकरण’ और नीतीश मुक्त राजनीति का सपना देख रहे हैं।
रिश्तों की कड़वाहट और राजनैतिक मजबूरी
अनंत सिंह और नीतीश कुमार के रिश्तों में कई उतार-चढ़ाव आए हैं। एक समय था जब दोनों एक-दूसरे के बेहद करीब थे, फिर वक्त बदला और दोनों कट्टर विरोधी हो गए। लेकिन 18 अप्रैल की इस बातचीत में अनंत सिंह का झुकाव फिर से नीतीश कुमार की विरासत की ओर दिखा। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि अनंत सिंह भली-भांति जानते हैं कि बिहार की जमीनी राजनीति में नीतीश कुमार का ‘वोट बैंक’ और ‘प्रभाव’ आज भी निर्णायक है।
निशांत कुमार को लेकर दी गई उनकी सलाह भी इसी कड़ी का हिस्सा है। वे चाहते हैं कि नीतीश कुमार की विरासत सुरक्षित रहे ताकि राज्य में राजनैतिक संतुलन बना रहे। निशांत कुमार के ‘सेल्फ-मेड’ बनने के विचार को उन्होंने व्यावहारिक राजनीति से दूर बताया। अनंत सिंह का यह ठेठ अंदाज कि “मालिक वही रहेगा”, दरअसल बिहार की ब्यूरोक्रेसी और राजनैतिक कार्यकर्ताओं को एक सीधा संदेश है कि सत्ता का असली केंद्र अभी भी हिला नहीं है।
बिहार की नई राजनैतिक दिशा
अनंत सिंह की यह प्रेस वार्ता 18 अप्रैल की सबसे बड़ी सुर्खी बन गई है। शराबबंदी पर उनका कड़ा स्टैंड और निशांत कुमार को ‘पागलपन’ वाली सलाह यह बताती है कि बिहार की राजनीति में अभी कई मोड़ आने बाकी हैं। सम्राट चौधरी के सामने अब न केवल शासन को बेहतर बनाने की चुनौती है, बल्कि अनंत सिंह जैसे नेताओं द्वारा खड़े किए गए इन “असली मालिक” वाले सवालों का जवाब अपने काम से देने की भी जिम्मेदारी है।
शराबबंदी को लेकर अनंत सिंह की मांग पर क्या सरकार कोई बड़ा फैसला लेगी? क्या निशांत कुमार अपने फैसले पर अडिग रहेंगे या आने वाले समय में वे पिता की विरासत संभालते नजर आएंगे? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब आने वाला समय ही देगा। फिलहाल, अनंत सिंह ने यह साफ कर दिया है कि बिहार की राजनीति की धुरी आज भी एक ही नाम के इर्द-गिर्द घूम रही है, और वह नाम है—नीतीश कुमार। उनके दिल्ली जाने को अनंत सिंह ने केवल ‘स्थान परिवर्तन’ माना है, ‘शक्ति का हस्तांतरण’ नहीं।


