​भागलपुर में शिक्षा के नाम पर ‘ठगी’ का बड़ा खुलासा: घंटाघर में बिक रही थीं नामी प्रकाशनों की नकली किताबें, गाजियाबाद के वादी ने दर्ज कराया केस

भागलपुर। रेशम नगरी भागलपुर जहाँ अपनी गौरवशाली ऐतिहासिक विरासत और ‘अंग’ प्रदेश की विशिष्ट संस्कृति के लिए जानी जाती है, वहीं पिछले कुछ वर्षों में यह शहर पूर्वी बिहार के एक बड़े एजुकेशन हब (शिक्षा केंद्र) के रूप में भी उभरा है। यहाँ हजारों छात्र अपनी आँखों में सुनहरे भविष्य के सपने सजाकर प्रतियोगी परीक्षाओं और उच्च शिक्षा की तैयारी करने आते हैं। लेकिन इसी शिक्षा की पवित्र नगरी में कुछ सफेदपोश कारोबारी छात्रों के भविष्य और नामी प्रकाशनों की साख के साथ ‘नकली किताबों’ का काला खेल खेल रहे हैं। भागलपुर पुलिस ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए घंटाघर स्थित एक पुरानी किताबों की दुकान की आड़ में चल रहे नकली किताबों के गोरखधंधे का पर्दाफाश किया है। इस मामले में विभिन्न प्रकाशनों की हूबहू नकली प्रतियां बेचने के आरोप में बबरगंज थाना क्षेत्र के मोहद्दीनगर निवासी आकाश कुमार के विरुद्ध संगीन धाराओं में मामला दर्ज किया गया है। यह कार्रवाई उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से आए एक शिकायतकर्ता की सक्रियता और स्थानीय पुलिस के सहयोग से संभव हो पाई है, जिसने न केवल दुकान बल्कि आरोपी के घर तक पहुँचकर इस जालसाजी की परतों को उधेड़ दिया है।

गाजियाबाद से भागलपुर तक पीछा: कैसे खुला जालसाजी का पिटारा?

​इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के मधुबन बापू थाना क्षेत्र के निवासी आयन राघव को यह गुप्त सूचना मिली कि बिहार के भागलपुर जिले में नामी प्रकाशनों की पायरेटेड (नकली) किताबें बड़े पैमाने पर खपाई जा रही हैं। आयन राघव, जो स्वयं प्रकाशन जगत और बौद्धिक संपदा अधिकारों की सुरक्षा से जुड़े हुए बताए जाते हैं, उन्होंने इस सूचना को गंभीरता से लिया और खुद सच्चाई जानने के लिए भागलपुर पहुँच गए। भागलपुर के विभिन्न बाजारों की रेकी करने के दौरान उनकी नजर घंटाघर स्थित ‘ओल्ड बुक स्टोर’ पर पड़ी। यहाँ जब उन्होंने किताबों की बारीकी से जांच की, तो उनके होश उड़ गए। दुकान पर रखी कई किताबें ऐसी थीं जो देखने में तो असली लग रही थीं, लेकिन उनके कागज की गुणवत्ता, छपाई की फिनिशिंग और सुरक्षा मानकों में भारी गड़बड़ी थी।

​आयन राघव ने बिना समय गवाए भागलपुर पुलिस से संपर्क साधा और अपनी आशंकाओं से अवगत कराया। पुलिस ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए तुरंत एक टीम गठित की और वादी के साथ मिलकर छापेमारी की योजना तैयार की। यह कार्रवाई केवल दुकान तक सीमित नहीं रही, बल्कि पुलिस की टीम वादी के साथ ओल्ड बुक स्टोर के मालिक आकाश कुमार के मोहद्दीनगर स्थित आवास पर भी जा पहुँची। वहां जब तलाशी ली गई, तो भारी मात्रा में विभिन्न प्रतिष्ठित प्रकाशनों की नकली किताबें बरामद की गईं। इन किताबों के जखीरे को देखकर पुलिस भी दंग रह गई, क्योंकि यह कोई छोटी-मोटी चोरी नहीं, बल्कि एक संगठित तरीके से चलाया जा रहा ‘पायरेसी नेटवर्क’ नजर आ रहा था।

नकली होलोग्राम और छपाई का खेल: छात्रों के भविष्य से खिलवाड़

​बरामद की गई किताबों की जांच के दौरान यह पाया गया कि आरोपी आकाश कुमार ने जालसाजी को पुख्ता बनाने के लिए कई किताबों पर नकली ‘होलोग्राम’ भी चिपका रखे थे। होलोग्राम किसी भी मूल किताब की प्रामाणिकता की सबसे बड़ी पहचान होती है, लेकिन यहाँ उस सुरक्षा चक्र को भी कॉपी कर लिया गया था ताकि छात्र और आम खरीदार धोखा खा जाएं। चौंकाने वाली बात यह भी रही कि बरामदगी के दौरान कई ऐसी किताबें भी मिलीं जिन पर होलोग्राम तक नहीं था, फिर भी उन्हें नए संस्करण के नाम पर ऊंचे दामों पर बेचा जा रहा था।

​यह केवल एक आर्थिक अपराध नहीं है, बल्कि यह उन हजारों छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ है जो इन किताबों पर भरोसा करते हैं। अक्सर नकली किताबों में छपाई की गलतियां, गायब पन्ने और डायग्राम की अस्पष्टता जैसी समस्याएं होती हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए एक छोटा सा गलत तथ्य या आंकड़ा उनके पूरे करियर को प्रभावित कर सकता है। भागलपुर में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों का एक बड़ा वर्ग पुरानी और सस्ती किताबों की तलाश में घंटाघर जैसे इलाकों का रुख करता है, जिसका फायदा आकाश कुमार जैसे कारोबारी उठा रहे थे।

बबरगंज थाना में प्राथमिकी और कानूनी कार्रवाई

​इस छापेमारी के बाद पुलिस ने बरामद सभी नकली किताबों को जब्त कर लिया है और उन्हें साक्ष्य के रूप में थाने लाया गया है। गाजियाबाद निवासी आयन राघव के लिखित आवेदन के आधार पर बबरगंज थाना में आरोपी आकाश कुमार के विरुद्ध कॉपीराइट एक्ट और धोखाधड़ी की विभिन्न धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है। पुलिस ने आरोपी की दुकान और घर से बरामद माल की एक विस्तृत जब्ती सूची तैयार की है।

​बबरगंज थाना पुलिस का कहना है कि वे इस मामले में आकाश कुमार से कड़ी पूछताछ कर रहे हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि इन नकली किताबों की छपाई कहाँ हो रही थी। प्राथमिक जांच में यह अंदेशा जताया जा रहा है कि इस रैकेट के तार अन्य राज्यों या बिहार के अन्य बड़े शहरों से भी जुड़े हो सकते हैं। अक्सर ऐसी नकली किताबें दिल्ली या उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में अवैध रूप से छपती हैं और फिर उन्हें स्थानीय वितरकों के माध्यम से छोटे शहरों के बाजारों में फैला दिया जाता है। पुलिस अब उन कड़ियों को जोड़ने की कोशिश कर रही है जिनके जरिए यह ‘कचरा साहित्य’ भागलपुर के प्रतिष्ठित बाजारों तक पहुँचा।

प्रकाशन जगत और अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान

​किताबों की पायरेसी (नकली बिक्री) केवल लेखकों और प्रकाशकों के लिए ही नहीं, बल्कि सरकार के राजस्व के लिए भी एक बड़ा खतरा है। जब कोई प्रकाशक कड़ी मेहनत और भारी निवेश के बाद एक प्रमाणिक पुस्तक बाजार में लाता है, तो वह कई तरह के करों का भुगतान करता है और अपने कर्मचारियों व लेखकों को रॉयल्टी देता है। लेकिन आकाश कुमार जैसे जाली कारोबारी बिना किसी निवेश और बिना किसी टैक्स के सीधे तौर पर उन किताबों की नकल तैयार कर लेते हैं। इससे मूल प्रकाशकों को करोड़ों रुपये का आर्थिक नुकसान होता है और धीरे-धीरे अच्छी किताबों का प्रकाशन बंद होने की कगार पर पहुँच जाता है।

​भागलपुर के स्थानीय प्रकाशकों और पुस्तक विक्रेताओं ने भी इस कार्रवाई का स्वागत किया है। उनका कहना है कि ऐसे जाली दुकानदारों की वजह से ईमानदार व्यवसायियों की साख पर भी बट्टा लगता है। ग्राहकों को लगता है कि हर पुरानी या सेकंड हैंड किताबों की दुकान पर नकली माल ही मिलता है, जो कि सच नहीं है। इस तरह की पुलिसिया कार्रवाई से उन लोगों के मन में खौफ पैदा होगा जो रातों-रात अमीर बनने के लिए छात्रों की मेधा और प्रकाशकों की मेहनत को लूट रहे हैं।

शिक्षा नगरी की साख पर आंच और पुलिस की अगली रणनीति

​भागलपुर को ‘अंग’ प्रदेश की ज्ञान स्थली माना जाता है। यहाँ टीएनबी कॉलेज, मारवाड़ी कॉलेज और कई प्रतिष्ठित कोचिंग संस्थान हैं। ऐसे में शिक्षा से जुड़े सामानों में मिलावट या जालसाजी इस शहर की छवि को धूमिल करती है। वरीय पुलिस अधिकारियों ने निर्देश दिया है कि केवल एक दुकान नहीं, बल्कि शहर की अन्य प्रमुख पुस्तक मंडियों जैसे सराय, उर्दू बाजार और विश्वविद्यालय क्षेत्र के आसपास की दुकानों की भी औचक जांच की जाए।

​पुलिस की योजना है कि वे शिक्षा विभाग और कुछ प्रमुख प्रकाशनों के प्रतिनिधियों के साथ मिलकर एक ‘टास्क फोर्स’ बनाएं जो समय-समय पर बाजार में उपलब्ध किताबों की प्रामाणिकता की जांच करे। छात्रों से भी अपील की गई है कि वे किताबें खरीदते समय पब्लिशर के होलोग्राम, बाइंडिंग और छपाई की गुणवत्ता को ध्यान से देखें। अगर किसी किताब की कीमत बाजार भाव से बहुत कम है, तो उसके नकली होने की संभावना अधिक होती है।

​आरोपी आकाश कुमार के विरुद्ध दर्ज मामले की जांच अब तेज कर दी गई है। पुलिस यह भी देख रही है कि क्या इस तरह की गतिविधियों में शहर के कुछ अन्य बड़े बुक स्टोर के नाम भी शामिल हैं। फिलहाल जब्त की गई किताबों के नमूनों को संबंधित प्रकाशनों के पास सत्यापन के लिए भेजा जा रहा है ताकि कोर्ट में इस केस को मजबूती से पेश किया जा सके। 15 अप्रैल की इस कार्रवाई ने भागलपुर के उन तमाम कारोबारियों के लिए खतरे की घंटी बजा दी है जो शिक्षा की आड़ में अपना ‘जालसाजी का साम्राज्य’ चला रहे हैं।

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