
पटना: बिहार की सत्ता संभालते ही ने प्रशासनिक सिस्टम को साफ संदेश दे दिया है—भ्रष्टाचार पर अब “जीरो टॉलरेंस” की नीति सख्ती से लागू होगी। मुख्यमंत्री के इस ऐलान के बाद राज्य के अफसरशाही में हलचल तेज हो गई है, खासकर उन अधिकारियों के बीच जिन पर पहले से भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं।
‘करप्शन से कोई समझौता नहीं’—सीएम का स्पष्ट निर्देश
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों के साथ बैठक में साफ कहा कि:
- किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा
- जनता के काम में देरी और फाइल लटकाने की प्रवृत्ति खत्म करनी होगी
- ब्लॉक, अंचल और थाना स्तर तक आम लोगों को समय पर सेवा मिले
उन्होंने अधिकारियों को “डबल स्पीड” से काम करने का निर्देश देते हुए कहा कि बिहार को विकसित और समृद्ध राज्य बनाने के लिए अनुशासन और संवेदनशीलता जरूरी है।
विवादों में रही ‘फील्ड पोस्टिंग’ की परंपरा
हाल के वर्षों में बिहार प्रशासन में एक बड़ा सवाल यह उठता रहा है कि जिन अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे, उन्हें दोबारा महत्वपूर्ण पदों पर क्यों तैनात किया गया?
ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां:
- आर्थिक अपराध इकाई (EOU) या निगरानी एजेंसियों ने केस दर्ज किया
- छापेमारी हुई
- फिर भी कुछ समय बाद उन्हीं अधिकारियों को फील्ड पोस्टिंग दे दी गई
इससे सरकार की “जीरो टॉलरेंस” नीति पर सवाल उठते रहे हैं।
जेल अधीक्षक मामला बना बड़ा उदाहरण
इसी कड़ी में बेउर जेल के तत्कालीन अधीक्षक विधु कुमार का मामला काफी चर्चा में रहा।
- जनवरी 2025 में उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का केस दर्ज हुआ
- पटना और मोतिहारी में छापेमारी हुई
- उन्हें सस्पेंड भी किया गया
लेकिन कुछ महीनों बाद:
- निलंबन हटा दिया गया
- और फरवरी 2026 में उन्हें बेगूसराय का जेल अधीक्षक बना दिया गया
इस फैसले ने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
अब बदल सकती है व्यवस्था?
नई सरकार के गठन के बाद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के सख्त रुख से संकेत मिल रहे हैं कि:
- भ्रष्टाचार के आरोपियों की पोस्टिंग पर पुनर्विचार हो सकता है
- जांच एजेंसियों की रिपोर्ट को ज्यादा महत्व दिया जाएगा
- दोषी पाए जाने पर सीधे कार्रवाई की जाएगी
सूत्रों के अनुसार, ऐसे कई मामलों की समीक्षा भी शुरू हो सकती है।
जांच एजेंसियों की भूमिका बढ़ेगी
राज्य में भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए:
- आर्थिक अपराध इकाई (EOU)
- निगरानी ब्यूरो
- विशेष सतर्कता इकाइयों
की भूमिका और मजबूत की जा सकती है।
इन एजेंसियों द्वारा दर्ज मामलों को अब “रूटीन” नहीं बल्कि “प्राथमिकता” के आधार पर देखा जाएगा।
प्रशासनिक सुधार की चुनौती
हालांकि, सिर्फ सख्त बयान देना ही काफी नहीं होगा।
सरकार के सामने बड़ी चुनौतियां हैं:
- पुराने सिस्टम में बदलाव
- राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव से निपटना
- पारदर्शी पोस्टिंग और ट्रांसफर नीति लागू करना
यदि इन क्षेत्रों में सुधार होता है, तभी जीरो टॉलरेंस नीति जमीन पर दिखेगी।
जनता की अपेक्षाएं बढ़ीं
नई सरकार से जनता की उम्मीदें भी काफी बढ़ गई हैं।
लोग चाहते हैं कि:
- भ्रष्टाचार के मामलों में त्वरित कार्रवाई हो
- दोषी अधिकारियों को संरक्षण न मिले
- आम लोगों के काम बिना रिश्वत के हों
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का “जीरो टॉलरेंस” वाला संदेश बिहार प्रशासन के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है।
अब असली परीक्षा यह होगी कि:
- क्या सरकार इस नीति को सख्ती से लागू कर पाती है?
- क्या आरोपी अफसरों पर वास्तव में कार्रवाई होती है?
अगर ऐसा होता है, तो यह बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।


