​बिहार में ‘कमल’ के राजतिलक की तैयारी: सम्राट चौधरी और नित्यानंद राय के बीच छिड़ी कांटे की टक्कर, क्या निशांत कुमार बनेंगे नए डिप्टी सीएम?

पटना। बिहार की सियासत में पिछले दो दशकों से चला आ रहा एक बड़ा अध्याय अब अपने आखिरी पड़ाव पर है। सोमवार, 13 अप्रैल 2026 की शाम होते-होते पटना की हवाओं में सत्ता परिवर्तन की सुगबुगाहट और तेज हो गई है। बिहार में भारतीय जनता पार्टी के पहले मुख्यमंत्री के नाम को लेकर चल रहा सस्पेंस अब महज कुछ घंटों का मेहमान रह गया है। भाजपा के रणनीतिकारों ने यह साफ कर दिया है कि मंगलवार का सूरज बिहार के लिए एक नया नेतृत्व और नई राजनीतिक दिशा लेकर आएगा। इस ऐतिहासिक सत्ता परिवर्तन को सुचारू बनाने के लिए केंद्र ने अपने सबसे भरोसेमंद सिपहसालार और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान को ‘पर्यवेक्षक’ बनाकर पटना भेजने का निर्णय लिया है। दिल्ली से लेकर पटना तक बिछी इस सियासी बिसात पर हर किसी की नजर इस बात पर टिकी है कि आखिर नीतीश कुमार के बाद बिहार की कमान किसके हाथों में होगी और क्या नीतीश कुमार के इकलौते बेटे निशांत कुमार को इस नई सरकार में कोई बड़ी जिम्मेदारी मिलेगी? 243 सदस्यों वाली विधानसभा में 202 सीटों के भारी बहुमत के साथ एनडीए अब एक नए युग की शुरुआत करने के लिए पूरी तरह तैयार खड़ा है।

मंगलवार का ‘फाइनल काउंटडाउन’: इस्तीफा और आखिरी कैबिनेट

​सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया का आगाज मंगलवार, 14 अप्रैल की सुबह 11 बजे होगा। मुख्यमंत्री आवास पर नीतीश कुमार अपनी कैबिनेट की अंतिम बैठक करेंगे। यह बैठक केवल एक प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक विदाई समारोह की तरह होगी जहाँ नीतीश कुमार अपने लंबे कार्यकाल की उपलब्धियों और सहयोगियों के साथ साझा किए गए पलों को याद करेंगे। बैठक के तुरंत बाद नीतीश कुमार का काफिला राजभवन की ओर रुख करेगा, जहाँ वे राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंपेंगे।

​कैबिनेट मंत्री दिलीप जायसवाल ने इस बदलाव को ‘भावुक क्षण’ करार देते हुए कहा कि नीतीश कुमार का मार्गदर्शन भविष्य की सरकार को मिलता रहेगा। हालांकि, पर्दे के पीछे की कहानी यह है कि भाजपा अब पूरी तरह से ड्राइविंग सीट पर आने के लिए तैयार है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने पुष्टि की है कि शिवराज सिंह चौहान की मौजूदगी में भाजपा विधायक दल की बैठक होगी, जिसमें नए नेता का चुनाव किया जाएगा। यह चुनाव केवल एक पद के लिए नहीं है, बल्कि यह बिहार में भाजपा की भविष्य की राजनीति की नींव रखने जैसा है।

मुख्यमंत्री की रेस: ‘पुराना गार्ड’ बनाम ‘नया चेहरा’

​बिहार के नए मुख्यमंत्री के लिए इस समय दो नामों के बीच जबरदस्त रस्साकशी चल रही है। पहला नाम सम्राट चौधरी का है, जो वर्तमान में उपमुख्यमंत्री और गृह मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। सम्राट चौधरी को भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व, विशेषकर अमित शाह का करीबी माना जाता है। शाह ने पूर्व में उन्हें ‘बड़ा आदमी’ बनाने का वादा सार्वजनिक मंचों से किया था। सम्राट चौधरी के पक्ष में सबसे बड़ी बात उनकी आक्रामकता और पिछड़ा वर्ग (OBC) पर उनकी पकड़ है। हालांकि, पार्टी के भीतर एक धड़ा यह तर्क दे रहा है कि वे मूल रूप से संघ परिवार के कैडर से नहीं आए हैं, जो उनकी राह में एक छोटा रोड़ा बन सकता है।

​दूसरी ओर, नित्यानंद राय का नाम भी रेस में काफी मजबूती से उभरा है। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय राम जन्मभूमि आंदोलन के समय से ही पार्टी और संगठन के प्रति समर्पित रहे हैं। वे ‘संघ’ और ‘संगठन’ दोनों की पसंद माने जाते हैं। भाजपा सूत्रों का मानना है कि मंडल राजनीति के गढ़ बिहार में अपना जनाधार और अधिक मजबूत करने के लिए पार्टी किसी ओबीसी या दलित चेहरे पर दांव खेल सकती है। नित्यानंद राय का लंबा संगठनात्मक अनुभव और यादव समुदाय के बीच उनकी पैठ भाजपा के लिए एक बड़ा प्लस पॉइंट साबित हो सकती है।

निशांत कुमार: क्या विरासत को मिलेगी नई पहचान?

​इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा ‘सरप्राइज एलिमेंट’ नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार माने जा रहे हैं। 44 वर्षीय निशांत, जो अब तक सक्रिय राजनीति से दूर रहते थे, पिछले महीने ही विधिवत रूप से जदयू में शामिल हुए हैं। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि उन्हें नई कैबिनेट में ‘उपमुख्यमंत्री’ का पद दिया जा सकता है। इसे नीतीश कुमार की अपनी विरासत को सुरक्षित करने की एक चाल के रूप में देखा जा रहा है।

​हालांकि, निशांत कुमार को लेकर दो तरह के विचार सामने आ रहे हैं। एक पक्ष का कहना है कि उन्हें सीधे बड़ी जिम्मेदारी देकर सरकार में जदयू का रसूख बरकरार रखा जाए। वहीं, दूसरा पक्ष, जिसमें खुद नीतीश कुमार के कुछ करीबी शामिल हैं, का मानना है कि निशांत को अभी सत्ता का आनंद लेने के बजाय संगठन और सरकार की बारीकियां सीखनी चाहिए। यदि निशांत कुमार उपमुख्यमंत्री बनते हैं, तो यह बिहार में एक नए ‘पुत्र उदय’ के रूप में देखा जाएगा, जो भाजपा-जदयू के रिश्तों को एक नई स्थिरता प्रदान कर सकता है।

एनडीए का अभेद्य किला: आंकड़ों का गणित

​बिहार विधानसभा में वर्तमान आंकड़े पूरी तरह से एनडीए के पक्ष में झुके हुए हैं। 243 सीटों वाले सदन में बहुमत के लिए 122 सीटों की आवश्यकता होती है, जबकि एनडीए के पास 202 सीटों का प्रचंड बहुमत है। इसमें भाजपा की 89 और जदयू की 85 सीटें शामिल हैं। अन्य छोटे दलों का समर्थन भी सरकार के पास है।

​इस भारी बहुमत के कारण सरकार गठन में कोई संवैधानिक अड़चन नहीं है, लेकिन भाजपा के सामने असली चुनौती ‘चेहरे’ के चयन की है। पार्टी नेतृत्व चाहता है कि जो भी मुख्यमंत्री बने, वह 2025 के आगामी विधानसभा चुनावों तक पार्टी की छवि को और अधिक लोकप्रिय बनाए। शिवराज सिंह चौहान का पटना आना यह दर्शाता है कि भाजपा इस प्रक्रिया में कोई भी कसर नहीं छोड़ना चाहती और हर गुट को संतुष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है।

शिवराज सिंह चौहान का रणनीतिक कौशल

​केंद्रीय पर्यवेक्षक के रूप में शिवराज सिंह चौहान का चयन काफी सोच-समझकर किया गया है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में लंबे समय तक गठबंधन और संगठन चलाने का उनका अनुभव बिहार की इस जटिल स्थिति को सुलझाने में मददगार साबित होगा। उन्हें यह जिम्मेदारी दी गई है कि वे भाजपा विधायक दल की बैठक में सर्वसम्मति से नेता का चुनाव कराएं ताकि पार्टी के भीतर किसी भी प्रकार के असंतोष की गुंजाइश न रहे।

​शिवराज सिंह चौहान मंगलवार दोपहर तक पटना पहुँच सकते हैं, जिसके बाद बैठकों का दौर शुरू होगा। भाजपा मुख्यालय में होने वाली यह बैठक न केवल मुख्यमंत्री तय करेगी, बल्कि उपमुख्यमंत्री और अन्य महत्वपूर्ण विभागों के बंटवारे का ब्लूप्रिंट भी तैयार करेगी। यह भी संभावना जताई जा रही है कि नई सरकार में दो के बजाय तीन उपमुख्यमंत्री हो सकते हैं, ताकि सभी प्रमुख समुदायों और सहयोगी दलों को प्रतिनिधित्व दिया जा सके।

बदलाव की लहर और जनता की अपेक्षाएं

​बिहार की जनता के लिए यह बदलाव एक नई उम्मीद लेकर आया है। सालों तक ‘बड़े भाई’ की भूमिका में रहे नीतीश कुमार के पीछे हटने और भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार आने से विकास की प्राथमिकताओं में बदलाव आने की संभावना है। औद्योगिक निवेश, कानून-व्यवस्था और रोजगार के मोर्चे पर भाजपा का नया नेतृत्व क्या अलग करता है, इस पर सबकी नजर रहेगी।

​मंगलवार की शाम तक राजभवन से निकलने वाली आधिकारिक सूचना बिहार की भावी राजनीति का स्वरूप तय कर देगी। सम्राट चौधरी की आक्रामकता या नित्यानंद राय का अनुभव—भाजपा किसे चुनती है, यह देखना दिलचस्प होगा। साथ ही, निशांत कुमार की ताजपोशी से जदयू का भविष्य भी तय होगा। फिलहाल, बिहार की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ से पीछे मुड़कर देखना नामुमकिन है और सामने एक नई सियासी सुबह का इंतजार है।

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