​अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस की पाकिस्तान यात्रा विफल: 21 घंटे की मैराथन वार्ता के बाद बिना किसी समझौते के लौटे वापस

इस्लामाबाद/वॉशिंगटन। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के केंद्र में रहे पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से रविवार, 12 अप्रैल 2026 की सुबह एक बड़ी और निराशाजनक खबर सामने आई है। संयुक्त राज्य अमेरिका के उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस, जो ईरान के साथ चल रहे भीषण तनाव और युद्ध जैसी स्थितियों को समाप्त करने के लिए एक ‘शांति मिशन’ पर पाकिस्तान पहुँचे थे, उनकी यह कोशिश फिलहाल नाकाम साबित हुई है। इस्लामाबाद के सेरेना होटल में करीब 21 घंटे तक चली मैराथन वार्ताओं और उच्च-स्तरीय बैठकों के बाद जेडी वेंस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आधिकारिक तौर पर यह घोषणा की है कि अमेरिका और ईरान के बीच किसी भी प्रकार का समझौता नहीं हो सका है। इस विफलता के बाद अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल वापस वॉशिंगटन के लिए रवाना हो गया है। इस घटनाक्रम ने न केवल पश्चिम एशिया की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि पाकिस्तान की मध्यस्थता की भूमिका और भारत सहित वैश्विक शक्तियों की रणनीतियों को भी प्रभावित किया है।

21 घंटे का कूटनीतिक ड्रामा: सेरेना होटल बना चर्चा का केंद्र

​अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस शनिवार दोपहर को एक विशेष विमान से इस्लामाबाद पहुँचे थे। उनके साथ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबी सलाहकार और दामाद जारेड कुशनर और विशेष दूत स्टीव विटकॉफ भी शामिल थे। इस दौरे का मुख्य उद्देश्य छह सप्ताह से जारी अमेरिका-ईरान संघर्ष को समाप्त करना और हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को फिर से खुलवाना था, जो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए जीवनरेखा मानी जाती है।

​वार्ता की शुरुआत शनिवार शाम करीब 5 बजे हुई। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभाई। अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का सामना ईरान के संसदीय अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबफ के नेतृत्व वाली टीम से हुआ। सूत्रों के अनुसार, पूरी रात चली इस बातचीत में कई बार गतिरोध की स्थिति बनी। जेडी वेंस लगातार राष्ट्रपति ट्रंप के संपर्क में थे, लेकिन रविवार सुबह 5 बजे तक यह स्पष्ट हो गया कि दोनों पक्ष किसी एक बिंदु पर सहमत नहीं हो पा रहे हैं।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में वेंस का बयान: “बुरी खबर यह है कि समझौता नहीं हुआ”

​रविवार की सुबह सूरज निकलने से ठीक पहले, जेडी वेंस ने होटल के खचाखच भरे हॉल में संवाददाताओं को संबोधित किया। उनके चेहरे पर थकान और वार्ता के विफल होने की निराशा साफ देखी जा सकती थी। उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के कहा, “बुरी खबर यह है कि हम किसी समझौते पर नहीं पहुँच पाए हैं।”

​वेंस ने स्पष्ट किया कि अमेरिका ने अपनी शर्तों में काफी लचीलापन दिखाया था, लेकिन ईरान ने उन बुनियादी शर्तों को मानने से इनकार कर दिया जो भविष्य की शांति के लिए अनिवार्य थीं। उन्होंने कहा, “ईरान ने हमारी शर्तों को स्वीकार नहीं करने का विकल्प चुना है। हमने अपनी ‘रेड लाइन्स’ (लक्ष्मण रेखा) बहुत स्पष्ट कर दी थीं। हम अपनी उन मांगों से समझौता नहीं कर सकते जो हमारी और हमारे सहयोगियों की सुरक्षा से जुड़ी हैं।”

विफलता का मुख्य कारण: परमाणु हथियारों पर फंसा पेंच

​इस वार्ता के विफल होने के पीछे सबसे बड़ा कारण परमाणु हथियारों का मुद्दा बताया जा रहा है। अमेरिकी उप-राष्ट्रपति ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान इस पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि अमेरिका चाहता था कि ईरान भविष्य में परमाणु हथियार विकसित न करने की एक दीर्घकालिक और पुख्ता प्रतिबद्धता दिखाए।

​हालिया संघर्ष के दौरान अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए हमलों ने ईरान की परमाणु क्षमताओं को काफी हद तक नुकसान पहुँचाया था, लेकिन वॉशिंगटन अब इस बात की गारंटी चाहता था कि ईरान दोबारा इन क्षमताओं को विकसित नहीं करेगा। ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने अमेरिका पर “कूटनीतिक विश्वासघात” का आरोप लगाते हुए कहा कि वे वादों पर नहीं, बल्कि धरातलीय सुरक्षा की गारंटी पर बात करेंगे। ईरान का रुख सख्त था और उन्होंने अमेरिकी शर्तों को अपनी संप्रभुता के खिलाफ करार दिया। इसी टकराव के कारण 21 घंटे की मेहनत बेकार चली गई।

पाकिस्तान की मध्यस्थता और भारत में राजनीतिक हलचल

​इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका काफी चर्चा में रही है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने अमेरिका और ईरान को एक मेज पर लाने के लिए काफी प्रयास किए थे। पाकिस्तान चाहता था कि इस मध्यस्थता के जरिए वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी खोई हुई साख वापस पा सके। हालांकि, वार्ता के विफल होने से पाकिस्तान की उम्मीदों को भी झटका लगा है।

​इधर भारत में भी इस यात्रा को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने प्रधानमंत्री के ‘ह्यूग्लोमेसी’ (Huglomacy) पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस का आरोप है कि भारत अपनी विदेश नीति के जरिए पाकिस्तान को अलग-थलग करने में विफल रहा है और अब अमेरिका पाकिस्तान को एक मध्यस्थ के रूप में देख रहा है। कांग्रेस नेताओं ने सवाल किया कि 2025 के पहलगाम हमले के बाद भारत ने जो कूटनीतिक बढ़त बनाई थी, उसे कैसे गंवा दिया गया कि वॉशिंगटन अब इस्लामाबाद के जरिए शांति की राह तलाश रहा है।

हॉर्मुज जलडमरूमध्य और वैश्विक ऊर्जा संकट

​वार्ता के बेनतीजा रहने का सबसे तत्काल और नकारात्मक प्रभाव वैश्विक तेल बाजार पर पड़ने की आशंका है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य, जहाँ से दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल गुजरता है, फिलहाल बंद या अत्यधिक असुरक्षित बना हुआ है। अमेरिका इस वार्ता के जरिए इसे तुरंत खुलवाना चाहता था ताकि वैश्विक अर्थव्यवस्था को राहत मिल सके।

​ईरान ने इसे अपनी सुरक्षा की पहली ढाल बना रखा है। वार्ता की विफलता के बाद अब इस क्षेत्र में सैन्य तनाव फिर से बढ़ सकता है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) ने संकेत दिए हैं कि वे अपने ऊर्जा मार्गों की सुरक्षा के लिए ‘आवश्यक कदम’ उठाने को तैयार हैं। यदि अगले कुछ दिनों में कूटनीतिक माध्यमों से कोई वैकल्पिक रास्ता नहीं निकला, तो दुनिया को एक और बड़े तेल संकट का सामना करना पड़ सकता है।

क्या होगा अगला कदम? वेंस की वॉशिंगटन वापसी

​प्रेस कॉन्फ्रेंस समाप्त करने के तुरंत बाद जेडी वेंस और उनका प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद के नूर खान एयरबेस से वॉशिंगटन के लिए उड़ान भर चुका है। वेंस सीधे व्हाइट हाउस पहुँचकर राष्ट्रपति ट्रंप को इस विफल वार्ता की विस्तृत रिपोर्ट सौंपेंगे। ट्रंप प्रशासन के लिए यह एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती है क्योंकि वे “शांति स्थापित करने वाले” (Peace Maker) के रूप में अपनी छवि पेश करना चाहते थे।

​विशेषज्ञों का मानना है कि अब अमेरिका ईरान पर ‘अधिकतम दबाव’ (Maximum Pressure) की नीति को और अधिक कड़ा कर सकता है। इसमें और अधिक कड़े आर्थिक प्रतिबंध और सीमित सैन्य कार्रवाई शामिल हो सकती है। दूसरी ओर, ईरान भी पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रहा है। ईरानी मीडिया ने इस वार्ता की विफलता के लिए अमेरिका के “तानाशाही रवैये” को जिम्मेदार ठहराया है।

निष्कर्ष: अनिश्चितता के भंवर में पश्चिम एशिया

​12 अप्रैल 2026 की यह तारीख इतिहास में एक ऐसी कोशिश के रूप में दर्ज की जाएगी जो सफल होते-होते रह गई। जेडी वेंस की पाकिस्तान यात्रा से जो उम्मीदें जगी थीं, वे इस्लामाबाद की सुबह की धूप के साथ ही धुंधली पड़ गईं। 21 घंटे का संवाद अंततः शून्य पर खत्म हुआ।

​अब पूरी दुनिया की नजरें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अगले कदम पर टिकी हैं। क्या वे फिर से कोई वार्ता का प्रस्ताव देंगे या फिर पश्चिम एशिया एक और बड़े युद्ध की ओर बढ़ जाएगा? फिलहाल, जेडी वेंस का वापस लौटना यह संकेत देता है कि कूटनीति के दरवाजे पूरी तरह बंद भले न हुए हों, लेकिन उन पर ताला जरूर लग गया है। ‘द वॉइस ऑफ बिहार’ की टीम इस अंतरराष्ट्रीय संकट के भारत पर पड़ने वाले प्रभावों पर अपनी नजर बनाए रखेगी।

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