
हाजीपुर, वैशाली: उत्तर बिहार के प्रमुख व्यापारिक केंद्र और वैशाली जिला मुख्यालय हाजीपुर से एक ऐसी हृदयविदारक घटना सामने आई है जिसने न केवल एक परिवार को उम्र भर का गम दे दिया है, बल्कि निजी विद्यालयों में बच्चों की सुरक्षा पर भी बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। नगर थाना क्षेत्र के जढुआ ओपी अंतर्गत एक प्रतिष्ठित निजी विद्यालय परिसर में गुरुवार की दोपहर उस वक्त कोहराम मच गया, जब खेलने के दौरान स्कूल में लगे एक लोहे के स्लाइडर (झूले) में फंसकर साढ़े तीन साल की मासूम बच्ची इनाया फातिमा की दर्दनाक मौत हो गई। जो मां अपनी बेटी के उज्ज्वल भविष्य के सपने देख रही थी, उसे क्या पता था कि जिस स्कूल में वह अपने बेटे की किताबें खरीदने आई है, वहीं उसकी लाडली की अंतिम यात्रा शुरू हो जाएगी।
खुशियों की खरीदारी और फिर पसरी खामोशी
घटना की पृष्ठभूमि किसी सामान्य दिन की तरह शुरू हुई थी। जढुआ करबला क्षेत्र के रहने वाले मो. रेयाज कुरैशी के घर में नए शैक्षणिक सत्र की तैयारियां चल रही थीं। उनके बेटे मो. रेयान कुरैशी का दाखिला इस साल पहली कक्षा में हुआ था। गुरुवार को रेयान की मां, नेहा परवीन, अपने बेटे की नई किताबें और स्टेशनरी लेने के लिए जढुआ स्थित निजी स्कूल पहुंची थीं। साथ में साढ़े तीन साल की छोटी बेटी इनाया फातिमा भी चहकती हुई आई थी।
दोपहर करीब तीन बजे का वक्त था। नेहा परवीन अपने बेटे रेयान को लेकर स्कूल के दफ्तर के भीतर किताबें खरीदने और अन्य औपचारिकताओं को पूरा करने चली गईं। नन्हीं इनाया, जो अपनी उम्र के हिसाब से काफी चंचल थी, स्कूल परिसर में लगे रंग-बिरंगे झूलों और स्लाइडर को देखकर आकर्षित हो गई। मां की नजरों से ओझल होकर वह झूलों वाले हिस्से में पहुंच गई और खेलने लगी। इसी दौरान एक ऊंचे स्लाइडर पर चढ़ने या उससे फिसलने के क्रम में बच्ची का संतुलन बिगड़ा और उसकी गर्दन स्लाइडर के संकरे लोहे के ढांचे के बीच बुरी तरह फंस गई।
बेबसी की इंतहा: जब तक पहुंची मदद, तब तक टूट चुकी थी सांसों की डोर
प्रत्यक्षदर्शियों और विद्यालय के कर्मचारियों से मिली जानकारी के अनुसार, हादसा इतना अचानक और शांत तरीके से हुआ कि आसपास खड़े लोगों को तुरंत इसकी भनक तक नहीं लगी। इनाया का गला स्लाइडर के लोहे के एंगल्स के बीच इस कदर फंस गया था कि वह चीख भी नहीं सकी। कुछ मिनटों बाद जब मां किताबें लेकर बाहर निकलीं और अपनी बेटी को वहां नहीं पाया, तो उनकी खोजबीन शुरू हुई। जब वे झूलों की ओर पहुंचीं, तो वहां का मंजर देखकर उनकी रूह कांप गई। उनकी कलेजे का टुकड़ा बेजान हालत में स्लाइडर से लटका हुआ था।
आनन-फानन में स्कूल के कर्मचारियों और परिजनों ने बच्ची को वहां से निकाला और उसे अस्पताल ले जाने की कोशिश की गई, लेकिन मासूम के शरीर में कोई हरकत नहीं हो रही थी। प्राथमिक जांच में ही यह स्पष्ट हो गया कि दम घुटने के कारण बच्ची की मौत मौके पर ही हो चुकी थी। जिस परिसर में बच्चों की किलकारियां गूंजनी चाहिए थीं, वहां अब नेहा परवीन की चीखें और सिसकियां गूंज रही थीं। उनका बेटा रेयान, जो अपनी नई किताबों को लेकर उत्साहित था, अपनी बहन की मौत से स्तब्ध और डरा हुआ खड़ा था।
सुरक्षा गार्ड का तर्क और स्कूल प्रशासन की सफाई
हादसे के बाद स्कूल प्रशासन बचाव की मुद्रा में नजर आया। विद्यालय प्रबंधन की ओर से तर्क दिया गया कि परिसर में सुरक्षा गार्ड की तैनाती थी और उसने बच्ची को स्लाइडर की ओर जाने से एक बार रोका भी था। प्रबंधन का दावा है कि गार्ड जब परिसर के दूसरे हिस्से में किसी अन्य काम से गया, तभी बच्ची दोबारा वहां पहुंच गई। हालांकि, यह दलील कई सवाल खड़े करती है। यदि स्कूल परिसर में इतने छोटे बच्चों के लिए स्लाइडर लगाए गए हैं, तो उनकी बनावट ऐसी क्यों थी कि एक साढ़े तीन साल की बच्ची की गर्दन उसमें फंस जाए? क्या वहां कोई प्रशिक्षित केयरटेकर मौजूद नहीं था जो खेलते हुए बच्चों पर नजर रख सके?
स्कूल परिसर में लगे सीसीटीवी कैमरों में यह पूरी घटना कैद होने की बात कही जा रही है। पुलिस ने इन फुटेज को अपने कब्जे में लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि हादसा वास्तव में कैसे हुआ और क्या वहां किसी स्तर पर आपराधिक लापरवाही बरती गई थी। स्थानीय लोगों का आरोप है कि निजी स्कूल मोटी फीस तो वसूलते हैं, लेकिन सुरक्षा मानकों और खेलकूद के उपकरणों की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं देते।
पुलिस की जांच और कानूनी पेच
घटना की सूचना मिलते ही नगर थानाध्यक्ष सिकंदर कुमार पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंचे। पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण किया और स्लाइडर की बनावट की भी जांच की। पुलिस ने परिजनों और स्कूल के शिक्षकों के बयान दर्ज किए हैं। थानाध्यक्ष सिकंदर कुमार ने बताया कि प्रथम दृष्टया यह एक दुर्घटना का मामला प्रतीत होता है, लेकिन लापरवाही के पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
फिलहाल, मृतका इनाया फातिमा के परिजनों ने किसी के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज नहीं कराई है। गमजदा पिता मो. रेयाज कुरैशी और मां नेहा परवीन इस वक्त ऐसी स्थिति में नहीं हैं कि कोई कानूनी निर्णय ले सकें। पुलिस का कहना है कि यदि परिजनों की ओर से आवेदन प्राप्त होता है, तो विद्यालय प्रशासन या संबंधित जिम्मेदारों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर आगे की कार्रवाई की जाएगी। पुलिस ने शव का पोस्टमार्टम कराने की पेशकश की थी, लेकिन धार्मिक और भावनात्मक कारणों से परिजन इसके लिए तैयार नहीं थे।
निजी स्कूलों के ‘प्ले एरिया’ पर उठते सवाल
हाजीपुर की यह घटना बिहार के तमाम निजी स्कूलों के लिए एक चेतावनी है। हाल के वर्षों में ‘प्ले स्कूल’ और ‘किंडरगार्टन’ की तर्ज पर स्कूलों में फैंसी और ऊंचे झूले लगाने का चलन बढ़ा है। लेकिन इन झूलों की सुरक्षा ऑडिट शायद ही कभी होती है। अक्सर ये झूले लोहे के होते हैं जिनमें जंग लगी होती है या जिनके डिजाइन में तकनीकी कमियां होती हैं। इनाया की मौत ने यह साबित कर दिया है कि सुरक्षा गार्ड का होना मात्र पर्याप्त नहीं है, बल्कि उपकरणों की बनावट और उन पर लगातार निगरानी रखना भी उतना ही आवश्यक है।
जढुआ करबला के मोहल्ले में आज चूल्हा नहीं जला है। हर कोई उस मासूम बच्ची की तस्वीर देखकर अपनी आंखों को नम कर रहा है जिसकी जिंदगी की शुरुआत होने से पहले ही अंत हो गया। इनाया फातिमा की मौत एक परिवार का निजी दुख तो है ही, लेकिन यह समाज और प्रशासन के लिए भी एक सबक है कि बच्चों की सुरक्षा के नाम पर किसी भी स्तर पर समझौता करना जानलेवा साबित हो सकता है। अब देखना यह होगा कि क्या प्रशासन इस घटना के बाद अन्य निजी स्कूलों के सुरक्षा मानकों की जांच करता है या फिर एक और मासूम के साथ ऐसे ही हादसे का इंतजार किया जाएगा।


