
भागलपुर। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग की पटरियों पर दौड़ रही प्रशासनिक व्यवस्था में शिथिलता बरतने वाले अधिकारियों के लिए अब कोई ‘सुरक्षित गलियारा’ नहीं बचा है। भागलपुर जिले के शाहकुंड अंचल में सरकारी फाइलों की कछुआ चाल और आम जनता के आवेदनों को ठंडे बस्ते में डालने का खामियाजा अंततः वहां की अंचलाधिकारी (CO) डॉ. हर्षा कोमल को भुगतना पड़ रहा है। जिलाधिकारी डॉ. नवल किशोर चौधरी ने एक कड़ा प्रशासनिक निर्णय लेते हुए डॉ. हर्षा कोमल के खिलाफ प्रपत्र ‘क’ (Prapatra Ka) गठित करने का आदेश दिया है। यह आदेश केवल एक विभागीय कार्रवाई नहीं है, बल्कि उन तमाम अधिकारियों के लिए एक गंभीर चेतावनी है जो जनता की शिकायतों और समयबद्ध कार्यों को अपनी प्राथमिकता सूची से बाहर रखते हैं। शाहकुंड अंचल में पिछले कई महीनों से लंबित पड़े सैकड़ों आवेदनों और सरकारी कार्य में बरती गई भारी लापरवाही ने इस कार्रवाई की पृष्ठभूमि तैयार की थी।
जांच रिपोर्ट की गाज: जब फाइलों के ढेर ने खोली पोल
शाहकुंड अंचल की कार्यप्रणाली को लेकर मिल रही लगातार शिकायतों के बाद, मुख्यालय के निर्देश पर एक उच्चस्तरीय जांच दल का गठन किया गया था। इस दल में दो वरिष्ठ पदाधिकारियों को शामिल किया गया था, जिन्होंने मार्च के महीने में शाहकुंड का दौरा कर वहां की जमीनी हकीकत परखी थी। जांच के दौरान जो तथ्य सामने आए, वे चौंकाने वाले थे।
अपर समाहर्ता (राजस्व) यानी एडीएम के साथ मिलकर की गई इस जांच में पाया गया कि अंचल कार्यालय में दाखिल-खारिज (म्यूटेशन), परिमार्जन और अन्य राजस्व संबंधी आवेदनों का अंबार लगा हुआ है। नियमतः जिन आवेदनों का निष्पादन एक निश्चित समय सीमा के भीतर हो जाना चाहिए था, वे महीनों से लंबित पड़े थे। जांच अधिकारियों ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि यह देरी किसी तकनीकी खराबी के कारण नहीं, बल्कि सीधे तौर पर अंचलाधिकारी की ‘कार्य के प्रति अरुचि’ और ‘घोर लापरवाही’ का परिणाम थी। इसी रिपोर्ट के आधार पर मुख्यालय ने डीएम को कार्रवाई के लिए हरी झंडी दी, जिसके बाद प्रपत्र ‘क’ गठित करने का यह आदेश जारी हुआ।
क्या है प्रपत्र ‘क’ और क्यों है यह खतरनाक?
प्रशासनिक शब्दावली में प्रपत्र ‘क’ का गठन किसी भी राजपत्रित अधिकारी के लिए एक ‘ब्लैक मार्क’ की तरह होता है। यह एक प्रकार की औपचारिक चार्जशीट (आरोप पत्र) है, जो विभागीय जांच की शुरुआत का संकेत देती है।
- गंभीर आरोपों का संकलन: इसमें अधिकारी द्वारा किए गए विशिष्ट नियमों के उल्लंघन, लापरवाही और अनुशासनहीनता के साक्ष्यों को सूचीबद्ध किया जाता है।
- जवाबदेही तय होना: एक बार प्रपत्र ‘क’ गठित हो जाने के बाद, संबंधित अधिकारी को हर आरोप का तार्किक और कानूनी जवाब देना होता है।
- करियर पर प्रभाव: यदि विभागीय जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो अधिकारी की वेतन वृद्धि (Increment) रोकी जा सकती है, उसे डिमोशन (पदावनति) का सामना करना पड़ सकता है या गंभीर स्थिति में सेवा से बर्खास्तगी की अनुशंसा भी की जा सकती है। एडीएम (राजस्व) को इस प्रक्रिया को त्वरित गति से पूरा करने और विभाग को इसकी प्रगति से अवगत कराने का निर्देश दिया गया है।
अनुपस्थिति और अनुशासनहीनता: आरोपों की लंबी फेहरिस्त
डॉ. हर्षा कोमल पर केवल कार्य में देरी का ही आरोप नहीं है, बल्कि उनके विरुद्ध अनुशासनहीनता के अन्य मामले भी लंबित हैं। जिलाधिकारी ने पूर्व में ही राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के प्रधान सचिव को एक पत्र भेजकर उनकी कार्यशैली से अवगत कराया था।
रिपोर्ट के अनुसार, सीओ अक्सर बिना किसी पूर्व सूचना या सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के मुख्यालय से अनुपस्थित पाई गई थीं। एक अंचलाधिकारी का पद संवेदनशील होता है, जहाँ आपदा प्रबंधन से लेकर कानून-व्यवस्था और राजस्व कार्यों के लिए अधिकारी की 24×7 उपलब्धता अनिवार्य मानी जाती है। बिना सूचना के कार्यस्थल छोड़ना न केवल सेवा नियमावली का उल्लंघन है, बल्कि यह उन हजारों ग्रामीणों के साथ भी विश्वासघात है जो दूर-दराज के गांवों से अपने काम के लिए अंचल कार्यालय पहुँचते हैं और अधिकारी की कुर्सी खाली पाते हैं।
शाहकुंड अंचल: लंबित आवेदनों का बोझ और जनता की पीड़ा
शाहकुंड जैसे ग्रामीण प्रधान अंचल में जमीन से जुड़े विवाद और उनके कागजी समाधान (दाखिल-खारिज) स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं। जब एक सीओ सैकड़ों आवेदनों को दबाकर बैठ जाता है, तो इसके कई सामाजिक और कानूनी परिणाम होते हैं:
- भूमि विवादों में वृद्धि: समय पर रसीद न कटने या म्यूटेशन न होने से जमीनी विवाद बढ़ते हैं, जो अक्सर हिंसक रूप ले लेते हैं।
- भ्रष्टाचार की आशंका: फाइलों के लंबित रहने से ‘बिचौलिया संस्कृति’ को बढ़ावा मिलता है, जहाँ लोग जल्द काम कराने के लिए अवैध रास्तों का सहारा लेने पर मजबूर होते हैं।
- सरकारी योजनाओं में बाधा: कई सरकारी योजनाओं (जैसे किसान सम्मान निधि या कृषि ऋण) का लाभ लेने के लिए अद्यतन भू-अभिलेखों की आवश्यकता होती है। सीओ की लापरवाही ने शाहकुंड के किसानों को इन लाभों से भी वंचित रखा।
डीएम नवल किशोर चौधरी का सख्त संदेश
जिलाधिकारी डॉ. नवल किशोर चौधरी ने पदभार ग्रहण करने के बाद से ही जिले के सभी अंचलाधिकारियों को ‘परफॉर्म या पेरिश’ (काम करो या भुगतो) का स्पष्ट संदेश दिया था। उन्होंने समय-समय पर बैठकों के माध्यम से राजस्व कार्यों में पारदर्शिता और गति लाने के निर्देश दिए थे। शाहकुंड सीओ के खिलाफ यह कार्रवाई यह दर्शाती है कि भागलपुर प्रशासन अब केवल चेतावनियों तक सीमित नहीं रहेगा।
डीएम ने एडीएम को इस मामले में ‘त्वरित प्रक्रिया’ अपनाने को कहा है, जिसका अर्थ है कि जांच को लंबा खींचने या ढिलाई बरतने की कोई गुंजाइश नहीं है। विभाग को सूचित करने के आदेश का तात्पर्य यह है कि इस मामले की निगरानी अब सीधे राज्य मुख्यालय (पटना) से की जाएगी।
जवाबदेही की नई इबारत
भागलपुर जिले के प्रशासनिक इतिहास में डॉ. हर्षा कोमल पर हुई यह कार्रवाई एक नजीर की तरह देखी जा रही है। यह मामला यह साबित करता है कि कोई भी पद ‘विशेषाधिकार’ नहीं, बल्कि ‘जनसेवा का उत्तरदायित्व’ है। शाहकुंड की जनता के लिए यह खबर एक बड़ी राहत है, क्योंकि उन्हें उम्मीद जगी है कि अब उनके लंबित पड़े आवेदनों पर धूल नहीं जमेगी।
आने वाले दिनों में प्रपत्र ‘क’ की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, यह स्पष्ट होगा कि क्या डॉ. हर्षा कोमल अपने पक्ष में कोई ठोस तर्क दे पाती हैं या उन्हें कड़ी विभागीय सजा का सामना करना पड़ेगा। फिलहाल, भागलपुर कलेक्ट्रेट से शाहकुंड अंचल तक इस कार्रवाई ने खलबली मचा दी है और अन्य अंचलाधिकारी भी अब अपनी पेंडिंग फाइलों को तेजी से निपटाने में जुट गए हैं। प्रशासनिक शुचिता बनाए रखने की दिशा में जिलाधिकारी का यह प्रहार एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगा।


