भ्रष्टाचार के दलदल में धंसे कलेक्ट्रेट के दो ‘मोहरे’ सस्पेंड: डीएम की बड़ी कार्रवाई से भागलपुर प्रशासनिक गलियारे में हड़कंप

भागलपुर। सरकारी दफ्तरों की दीवारों के पीछे जब फाइलें ‘गांधी छाप’ नोटों की गर्मी से सरकने लगती हैं, तो सिस्टम की शुचिता पर ग्रहण लग जाता है। भागलपुर के सदर अनुमंडल पदाधिकारी (एसडीओ) कार्यालय में फैला भ्रष्टाचार का ऐसा ही एक जाल उस समय तार-तार हो गया जब विजिलेंस (निगरानी) की टीम ने दबिश दी। अब इस मामले में प्रशासनिक हंटर चला है। रिश्वतखोरी के आरोप में रंगे हाथों पकड़े गए एसडीओ कार्यालय के स्टेनो प्रेम कुमार और लिपिक मयंक कुमार को जिलाधिकारी (डीएम) ने तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। यह कार्रवाई उस भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक कड़ा संदेश है जो अक्सर ‘कागजी संपुष्टि’ के नाम पर अधिकारियों और कर्मचारियों का हक मारता है। जिलाधिकारी ने न केवल निलंबन की मुहर लगाई है, बल्कि दोनों के विरुद्ध विभागीय जांच की प्रक्रिया यानी प्रपत्र ‘क’ गठित करने का भी आदेश दिया है।

​निगरानी की जाल में फंसे ‘साहब’ के खासमखास

​भ्रष्टाचार की यह कहानी भागलपुर कलेक्ट्रेट परिसर के उस हिस्से से शुरू होती है जहाँ आम जनता और छोटे अधिकारियों की फाइलों का भविष्य तय होता है। नाथनगर के प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी (एमओ) अपनी सेवा पुस्तिका (Service Book) में संपुष्टि कराने के लिए काफी समय से परेशान थे। नियम के अनुसार जो काम एक निश्चित समय सीमा में हो जाना चाहिए था, उसे स्टेनो प्रेम कुमार और लिपिक मयंक कुमार ने ‘कमाई’ का जरिया बना लिया।

​आरोप है कि इन दोनों कर्मियों ने सेवा पुस्तिका में संपुष्टि करने के बदले एमओ से 70 हजार रुपये की मांग की थी। एक सरकारी सेवक से ही दूसरे सरकारी सेवक द्वारा इतनी बड़ी रकम की मांग करना यह दर्शाता है कि भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं। लेकिन एमओ ने घुटने टेकने के बजाय कानून का रास्ता चुना और पटना स्थित निगरानी अन्वेषण ब्यूरो को इसकी लिखित शिकायत कर दी।

​30 मार्च का वह ‘ट्रैप’ और कार्यालय में मची अफरा-तफरी

​निगरानी टीम ने शिकायत की सत्यापन के बाद 30 मार्च को जाल बिछाया। जैसे ही एमओ रिश्वत के पैसे लेकर एसडीओ कार्यालय के कक्ष में पहुँचे और पैसे प्रेम कुमार व मयंक कुमार के सुपुर्द किए, पहले से घात लगाए बैठी विजिलेंस की टीम ने दोनों को दबोच लिया। कार्यालय कक्ष से ही रिश्वत की राशि बरामद की गई, जिसने इन दोनों कर्मियों के पास बचने का कोई रास्ता नहीं छोड़ा।

​विजिलेंस की इस कार्रवाई के बाद पूरे कलेक्ट्रेट में सन्नाटा पसर गया था। गिरफ्तारी के नौ दिनों बाद, जब सदर एसडीओ ने पूरी घटना की विस्तृत रिपोर्ट जिला स्थापना शाखा को सौंपी, तब जाकर डीएम ने निलंबन की आधिकारिक गाज गिराई। 30 मार्च की उस दोपहर ने इन दोनों कर्मियों के करियर पर ऐसा दाग लगा दिया है जिसे धो पाना अब नामुमकिन सा लग रहा है।

​प्रपत्र ‘क’ और विभागीय जांच का चक्रव्यूह

​निलंबन तो केवल शुरुआत है, असली चुनौती अब इन कर्मियों के लिए प्रपत्र ‘क’ (Prapatra Ka) का सामना करना है। जिलाधिकारी ने सदर एसडीओ को कड़े निर्देश दिए हैं कि एक पखवाड़े (15 दिन) के भीतर दोनों कर्मियों के खिलाफ सभी आवश्यक साक्ष्यों और दस्तावेजों के साथ आरोप पत्र गठित कर जिला स्थापना शाखा को उपलब्ध कराएं।

​प्रपत्र ‘क’ गठित होने का अर्थ है कि अब इनके खिलाफ औपचारिक विभागीय कार्यवाही शुरू होगी, जिसमें दोष सिद्ध होने पर सेवा से बर्खास्तगी तक की नौबत आ सकती है। प्रशासन अब यह सुनिश्चित करने में जुटा है कि इस मामले में किसी भी स्तर पर ढिलाई न बरती जाए। साक्ष्यों के रूप में निगरानी टीम की जब्ती सूची, एमओ का बयान और मौके की रिपोर्ट को आधार बनाया गया है।

​जीवन निर्वाह भत्ता और पदस्थापना का गणित

​नियमों के मुताबिक, निलंबन की अवधि के दौरान इन दोनों कर्मियों को उनके वर्तमान पदस्थापन कार्यालय से ही जीवन निर्वाह भत्ता (Subsistence Allowance) का भुगतान किया जाएगा। हालांकि, इस दौरान वे किसी भी आधिकारिक कार्य का हिस्सा नहीं होंगे और न ही कार्यालय की फाइलों को छू पाएंगे।

​डीएम के आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि ये कर्मी जांच में सहयोग नहीं करते हैं या शुक्रवार की शाम तक दी गई किसी अन्य प्रशासनिक समय सीमा का उल्लंघन करते हैं, तो उनके विरुद्ध और भी कठोर कदम उठाए जा सकते हैं। निलंबन की इस अवधि में उन्हें मुख्यालय छोड़ने की अनुमति भी नहीं होगी।

​क्या कहता है एसडीओ का रिपोर्ट कार्ड?

​सदर एसडीओ की रिपोर्ट इस मामले में सबसे अहम कड़ी साबित हुई। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि किस तरह इन दोनों कर्मियों ने अपने पद का दुरुपयोग किया और एक कनिष्ठ अधिकारी को मानसिक व आर्थिक रूप से प्रताड़ित करने की कोशिश की। सेवा पुस्तिका में संपुष्टि एक अनिवार्य प्रशासनिक प्रक्रिया है, लेकिन इसे रोकना और इसके बदले धन की मांग करना सेवा नियमावली का घोर उल्लंघन है।

​एसडीओ की रिपोर्ट ने यह भी उजागर किया कि कार्यालय के भीतर अनुशासन की स्थिति कितनी नाजुक थी कि कर्मी साहब के नाक के नीचे ही रिश्वत का लेन-देन कर रहे थे। इस रिपोर्ट के आधार पर ही डीएम ने यह माना कि इन कर्मियों का सेवा में बने रहना जनहित और प्रशासनिक शुचिता के खिलाफ है।

​भ्रष्टाचार के विरुद्ध संदेश या केवल खानापूर्ति?

​भागलपुर में इस तरह की कार्रवाई पहले भी हुई है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या केवल निचले स्तर के कर्मियों को सस्पेंड करने से सिस्टम बदल जाएगा? अक्सर यह देखा जाता है कि बड़े अधिकारियों के संरक्षण के बिना छोटे बाबू इतनी बड़ी हिम्मत नहीं जुटा पाते। हालांकि, इस मामले में विजिलेंस और डीएम की तत्परता सराहनीय है।

​प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि प्रपत्र ‘क’ गठित करने का आदेश यह संकेत देता है कि सरकार इस बार ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति पर अडिग है। 70 हजार रुपये की घूस एक बड़ी रकम है, जो यह बताती है कि भ्रष्टाचार की दरें तय हो चुकी हैं। अब इस कार्रवाई से अन्य कर्मियों के बीच यह खौफ पैदा होना चाहिए कि गलत कमाई का अंत केवल सलाखों और निलंबन में ही होता है।

​शुचिता की तलाश में भागलपुर प्रशासन

​प्रेम कुमार और मयंक कुमार का निलंबन भागलपुर कलेक्ट्रेट के इतिहास में एक और काला अध्याय है। एक तरफ जहाँ सरकार डिजिटल इंडिया और पारदर्शिता की बातें कर रही है, वहीं दूसरी तरफ ‘फाइल पास’ कराने के लिए सत्तर हजार की मांग होना शर्मनाक है। जिलाधिकारी की यह कार्रवाई उन तमाम ईमानदार कर्मचारियों के मनोबल को बढ़ाएगी जो बिना किसी लालच के अपनी ड्यूटी करते हैं।

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