वैश्विक अर्थव्यवस्था की ‘लाइफलाइन’ पर संकट और कूटनीति की बिसात: होर्मुज और लेबनान पर निर्णायक मोड़

तेहरान/वाशिंगटन। दुनिया इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ एक तरफ युद्ध की विभीषिका है और दूसरी तरफ शांति की धुंधली सी उम्मीद। लेबनान पर इजरायली हमलों और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच, शनिवार को अमेरिका और ईरान के बीच होने वाली वार्ता पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं। यह वार्ता केवल दो देशों के बीच का संवाद नहीं, बल्कि वैश्विक तेल आपूर्ति और पश्चिम एशिया के भविष्य को तय करने वाला एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकती है। जहाँ एक तरफ डोनाल्ड ट्रंप ‘ताकत के माध्यम से शांति’ की नीति अपना रहे हैं, वहीं ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी भी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है।

​होर्मुज जलडमरूमध्य: 15 पोत और वैश्विक तेल संकट की आहट

​होर्मुज जलडमरूमध्य को दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण ‘ऑयल चोक पॉइंट’ माना जाता है। यहाँ से जारी ताजा अपडेट्स वैश्विक बाजारों के लिए चिंताजनक हैं:

  • कोटा सिस्टम: रूसी एजेंसी तास के अनुसार, ईरान ने अब इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों की संख्या को सीमित कर दिया है। अब प्रतिदिन केवल 15 पोत ही यहाँ से गुजर सकेंगे।
  • ईरान की मंजूरी अनिवार्य: किसी भी पोत के गुजरने के लिए अब तेहरान की पूर्व अनुमति आवश्यक होगी। गुरुवार को आवाजाही पूरी तरह ठप रहने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में उछाल की आशंका प्रबल हो गई है।
  • सामरिक दबाव: इस जलमार्ग को नियंत्रित कर ईरान वैश्विक अर्थव्यवस्था पर अपना दबाव बनाना चाहता है, ताकि बातचीत की मेज पर उसकी शर्तों को गंभीरता से लिया जाए।

​ट्रंप की चेतावनी और ‘ट्रुथ सोशल’ कूटनीति

​अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस संकट को हल करने के लिए एक आक्रामक और सीधी रणनीति अपनाई है। उन्होंने बेंजामिन नेतन्याहू से बात कर यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि शनिवार की वार्ता में कोई सैन्य खलल न पड़े। ट्रंप के रुख के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • सैन्य घेराबंदी: ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि अमेरिकी सेना ईरान के चारों ओर तब तक तैनात रहेगी जब तक कि शांति समझौता पूरी तरह लागू नहीं हो जाता।
  • अंतिम चेतावनी: उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर पोस्ट किया कि यदि यह समझौता विफल होता है, तो भविष्य के हमले पहले से कहीं ज्यादा विनाशकारी होंगे।
  • मध्यस्थता में रूस: रूस ने भी इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए ईरान को सलाह दी है कि शांति समझौते की परिधि में लेबनान को भी शामिल किया जाए, ताकि व्यापक क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित हो सके।

​ईरान का अल्टीमेटम: “युद्धविराम या अंतहीन जंग”

​ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिका को एक बेहद कठिन चुनाव करने के लिए मजबूर कर दिया है। उनके बयान के निहितार्थ काफी गहरे हैं:

​”अमेरिका को यह तय करना होगा कि वह युद्धविराम चाहता है या इजरायल के माध्यम से जंग को जारी रखना चाहता है। यदि लेबनान पर इजरायली हमले नहीं रुकते, तो होर्मुज में तनाव को फिर से भड़कने से कोई नहीं रोक पाएगा।”

 

​ईरान ने यह साफ कर दिया है कि वह लेबनान (हिजबुल्लाह) और होर्मुज के मुद्दों को अलग-अलग नहीं देखता। उसके लिए यह एक ‘पैकेज डील’ की तरह है, जिसमें सभी मोर्चों पर शांति अनिवार्य है।

​शनिवार की वार्ता: पाकिस्तान में होगी ‘शांति की परीक्षा’

​शनिवार को होने वाली यह वार्ता संभवतः पाकिस्तान की मध्यस्थता या वहां के किसी तटस्थ स्थल पर आयोजित की जा सकती है। इस बैठक के परिणाम निम्नलिखित पहलुओं को प्रभावित करेंगे:

  1. तेल की कीमतें: यदि होर्मुज से यातायात सुचारू नहीं होता, तो वैश्विक स्तर पर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भारी वृद्धि हो सकती है।
  2. लेबनान का भविष्य: क्या इजरायल लेबनान से अपनी सेना पीछे हटाएगा या हमले जारी रखेगा?
  3. ट्रंप की विदेश नीति: क्या ट्रंप का ‘प्रेशर टैक्टिक्स’ काम करेगा या ईरान अपनी शर्तों पर अड़ा रहेगा?

​तनाव की तलवार पर संतुलन

​वर्तमान स्थिति अत्यंत नाजुक है। होर्मुज में केवल 15 पोतों की आवाजाही की अनुमति देना ईरान का एक बड़ा ‘पावर मूव’ है। शनिवार की वार्ता का सफल होना न केवल पश्चिम एशिया के लिए, बल्कि भारत सहित उन तमाम देशों के लिए जरूरी है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस समुद्री मार्ग पर निर्भर हैं।

​ट्रंप की ‘बड़ी कार्रवाई’ की धमकी और अराघची का ‘अल्टीमेटम’ यह बताता है कि कूटनीति के कमरे में इस समय तनाव चरम पर होगा। क्या दुनिया एक बड़े युद्ध की ओर बढ़ रही है या शनिवार को शांति का कोई नया रास्ता निकलेगा?

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