अंधविश्वास की आग में झुलसी इंसानियत: शेखपुरा में ‘डायन’ बताकर महिला और बच्चों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा; चार घायल सदर अस्पताल में भर्ती, समाज की कुप्रथा ने मासूमों के मन पर छोड़ा गहरा जख्म

  • बिहार के शेखपुरा जिले में शिक्षा और आधुनिकता के दावों के बीच अंधविश्वास का एक ऐसा खौफनाक चेहरा सामने आया है, जिसने समाज के माथे पर कलंक लगा दिया है।
  • ​टाउन थाना क्षेत्र के कटनीकोल में एक असहाय महिला और उसके तीन बच्चों को ‘डायन’ होने के झूठे और बेबुनियाद शक में न केवल अपमानित किया गया, बल्कि उन पर प्राणघातक हमला भी किया गया।
  • ​दरिंदगी की इंतिहा यह रही कि हमलावरों ने महिला के साथ-साथ उसके दो मासूम बेटों और एक भांजे को भी नहीं बख्शा, जिन्हें इलाज के लिए गंभीर हालत में सदर अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा है।
  • ​घटना के समय महिला का पति घर पर मौजूद नहीं था, वह रोजी-रोटी की तलाश में बाहर मजदूरी करता है, जिसका फायदा उठाकर पड़ोसियों ने इस जघन्य वारदात को अंजाम दिया।
  • ​पुलिस ने मामले का संज्ञान लेते हुए जांच तेज कर दी है, लेकिन यह घटना 21वीं सदी के बिहार में वैज्ञानिक सोच और सामाजिक जागरूकता के अभाव की एक पीड़ादायक कहानी बयां कर रही है।

शेखपुरा (द वॉयस ऑफ बिहार)।

अंधेरे युग की वापसी: जब बेड़ियों में जकड़ गई संवेदनाएं

हम मंगल ग्रह पर पहुँचने और डिजिटल इंडिया की बातें करते हैं, लेकिन शेखपुरा की सड़कों पर बीती रात जो हुआ, वह हमें मध्यकालीन बर्बरता की याद दिलाता है। अंधविश्वास की जड़ें हमारे समाज में कितनी गहरी और जहरीली हैं, इसका प्रमाण टाउन थाना क्षेत्र के कटनीकोल स्थित एफसीआई गोदाम के समीप देखने को मिला। एक साधारण परिवार, जो अपनी मेहनत-मजदूरी से जीवन बसर कर रहा था, उसे केवल इसलिए लहूलुहान कर दिया गया क्योंकि कुछ लोगों के मन में ‘डायन’ जैसी कुप्रथा का जहर भरा हुआ था। प्रतिमा देवी, जो अपने बच्चों की ढाल बनी हुई थी, उसे समाज के उन ठेकेदारों ने निशाना बनाया जो आज भी विज्ञान से ज्यादा जादू-टोने पर भरोसा करते हैं।

वारदात का खौफनाक मंजर: रूह कंपा देने वाली दरिंदगी

प्रत्यक्षदर्शियों और पीड़िता के बयानों के अनुसार, यह विवाद अचानक नहीं भड़का था। इसकी भूमिका कई दिनों से तैयार की जा रही थी। प्रतिमा देवी के पति अमरजीत राम घर से बाहर रहकर मजदूरी करते हैं। घर में महिला और बच्चों को अकेला पाकर पड़ोस के कुछ असामाजिक तत्वों ने उन पर ‘डायन’ होने का ठप्पा लगा दिया। बीती रात जब प्रतिमा देवी ने इन अपमानजनक आरोपों और लगातार हो रही मानसिक प्रताड़ना का विरोध किया, तो हमलावर हिंसक हो उठे।

​आरोपियों ने लाठी-डंडों से लैस होकर घर पर हमला बोल दिया। प्रतिमा देवी और उनके बच्चों को जान बचाने के लिए भागने तक का मौका नहीं दिया गया। हमलावरों ने महिला को सड़क पर दौड़ा-दौड़ा कर पीटा। इस दौरान जब उनके पुत्र रोशन कुमार, सत्यम कुमार और बहन का पुत्र दिलखुश कुमार उन्हें बचाने आए, तो उन पर भी बेरहमी से प्रहार किया गया। मासूम बच्चों की चीखें सन्नाटे को चीरती रहीं, लेकिन अंधविश्वास में अंधे हो चुके हमलावरों का दिल नहीं पसीजा।

डायल 112 की सक्रियता और अस्पताल की तस्वीरें

चीख-पुकार सुनकर जब कुछ स्थानीय लोगों ने हिम्मत दिखाई और पुलिस को सूचना दी, तब जाकर मामला शांत हुआ। सूचना मिलते ही डायल 112 की टीम मौके पर पहुँची। पुलिस के पहुँचते ही हमलावर अंधेरे का फायदा उठाकर फरार हो गए। पुलिस ने बिना देरी किए चारों घायलों को अचेत और लहूलुहान अवस्था में सदर अस्पताल पहुँचाया। अस्पताल के बेड पर पड़े बच्चों के चेहरे और प्रतिमा देवी की आंखों में छिपी दहशत यह बता रही थी कि उन्होंने मौत को बहुत करीब से देखा है। फिलहाल सभी का इलाज जारी है, लेकिन शारीरिक चोटों से ज्यादा उनके मन पर लगे घाव गहरे हैं।

एक दिन पहले की चेतावनी को नजरअंदाज करना पड़ा भारी

पीड़िता प्रतिमा देवी ने बताया कि यह कोई पहली घटना नहीं थी। एक दिन पहले भी आरोपियों ने इसी मुद्दे को लेकर विवाद किया था और उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी थी। उस समय भी पुलिस ने मौके पर पहुँचकर हस्तक्षेप किया था और दोनों पक्षों को शांत कराया था। लेकिन पुलिस की वह कार्रवाई केवल ‘अस्थायी राहत’ बनकर रह गई। अगर उस समय आरोपियों के खिलाफ सख्त निरोधात्मक कार्रवाई की गई होती, तो शायद अगले दिन यह खूनी खेल नहीं खेला जाता। पुलिस की ढिलाई और समाज की चुप्पी ने अपराधियों के हौसले बुलंद कर दिए, जिसका खामियाजा एक मासूम परिवार को भुगतना पड़ा।

डायन प्रथा: बिहार का एक पुराना अभिशाप

बिहार में ‘डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम 1999’ लागू है, जिसके तहत किसी भी महिला को ‘डायन’ कहना या उसे प्रताड़ित करना एक गंभीर संज्ञेय अपराध है। इसके बावजूद, राज्य के ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में महिलाओं को निशाना बनाने के लिए इस कुप्रथा का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में किया जाता है। अक्सर संपत्ति विवाद, आपसी रंजिश या व्यक्तिगत ईर्ष्या को छिपाने के लिए महिला पर ‘डायन’ होने का आरोप मढ़ दिया जाता है। शेखपुरा की यह घटना इसी कड़वी हकीकत का हिस्सा है, जहाँ एक मजदूर की पत्नी को असहाय समझकर उस पर यह सामाजिक हमला बोला गया।

पुलिस प्रशासन का रुख: न्याय की उम्मीद

टाउन थाना पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए प्राथमिकी दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। थाना प्रभारी का कहना है कि पुलिस की टीमें आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए संभावित ठिकानों पर छापेमारी कर रही हैं। पुलिस ने भरोसा दिलाया है कि इस मामले में किसी भी अपराधी को बख्शा नहीं जाएगा और कानून के कड़े प्रावधानों के तहत उन्हें सजा दिलाई जाएगी। हालांकि, पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन गवाहों को सामने लाना है जो पड़ोस में रहकर भी इस घटना के समय मूकदर्शक बने रहे।

सामाजिक जिम्मेदारी और जागरूकता का अभाव

यह केवल पुलिस का मामला नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक विफलता भी है। जिस समाज में एक महिला और बच्चों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा जाए और लोग तमाशबीन बने रहें, वहां की नैतिकता पर सवाल उठना लाजिमी है। अंधविश्वास के खिलाफ लड़ाई केवल कानून से नहीं जीती जा सकती, इसके लिए शिक्षा और जागरूकता की एक लहर की जरूरत है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को आगे आकर ऐसी घटनाओं की निंदा करनी चाहिए और पीड़ित परिवार को सुरक्षा का भरोसा दिलाना चाहिए।

क्या हमें और ‘रोशनी’ और ‘सत्यम’ की चीखें सुननी होंगी?

रोशन, सत्यम और दिलखुश जैसे मासूमों का क्या कसूर था? क्या उनका कसूर केवल इतना था कि वे अपनी मां को पिटता देख चुप नहीं रह सके? शेखपुरा की यह घटना हमें चेतावनी दे रही है कि यदि हमने समय रहते इन कुप्रथाओं की जड़ों पर प्रहार नहीं किया, तो विकास के तमाम ऊंचे दावे खोखले साबित होंगे। प्रतिमा देवी को न्याय मिलना चाहिए, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है उस सोच को सलाखों के पीछे पहुँचाना जो इंसान को हैवान बना देती है।

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