
भागलपुर। बिहार के भागलपुर जिले में बिजली विभाग की कार्यप्रणाली और बिलिंग सिस्टम एक बार फिर सवालों के घेरे में है। ताजा मामला सन्हौला प्रखंड क्षेत्र से सामने आया है, जहां एक उपभोक्ता ने विभाग की ‘मनमानी’ और ‘हवाई’ बिलिंग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उपभोक्ता का आरोप है कि उसके घर की बिजली खपत और विभाग द्वारा भेजे गए बिल के बीच जमीन-आसमान का अंतर है। यह समस्या केवल एक उपभोक्ता की नहीं, बल्कि बिहार के ग्रामीण इलाकों में बिजली बिल को लेकर चल रहे एक बड़े ‘सिस्टम फेलियर’ की ओर इशारा करती है। उपभोक्ता ने अपनी शिकायतों को लेकर सहायक विद्युत अभियंता के दफ्तर में लिखित आवेदन देकर न्याय की गुहार लगाई है और चेतावनी दी है कि यदि सुधार नहीं हुआ, तो यह लड़ाई उच्चाधिकारियों की दहलीज तक पहुंचेगी।
सन्हौला जैसे इलाकों में जहां लोग अपनी मेहनत की कमाई का एक बड़ा हिस्सा बुनियादी सुविधाओं पर खर्च करते हैं, वहां बिजली बिल में हजारों रुपये की गड़बड़ी किसी ‘झटके’ से कम नहीं है। उपभोक्ता संख्या 52247740584 के धारक ने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा कि उनके परिसर में बिजली की वास्तविक खपत बहुत ही सीमित है, लेकिन विभाग की ओर से भेजे जा रहे बिल की राशि लगातार बढ़ती जा रही है।
कागजी मीटर रीडिंग और ‘हवाई’ बिल का खेल
उपभोक्ता ने अपने लिखित आवेदन में विभाग की सबसे बड़ी कमजोरी पर प्रहार किया है—वह है ‘गलत मीटर रीडिंग’। ग्रामीण इलाकों में अक्सर यह देखा जाता है कि मीटर रीडर घर तक नहीं पहुंचते और दफ्तर में बैठकर ही अनुमान के आधार पर यूनिट्स दर्ज कर देते हैं। सन्हौला के इस उपभोक्ता का भी यही आरोप है। आवेदन में स्पष्ट कहा गया है कि बिना किसी वास्तविक जांच या मीटर की रीडिंग लिए ही मनमाने तरीके से यूनिट्स चढ़ा दी गई हैं।
यह ‘एवरेज बिलिंग’ का वह जाल है जिसमें फंसकर आम आदमी कर्जदार बनता जा रहा है। जब मीटर रीडर समय पर रीडिंग नहीं लेता, तो कई महीनों की खपत एक साथ जुड़ जाती है या फिर विभाग अपने ‘टारगेट’ पूरे करने के लिए उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ डाल देता है। इस उपभोक्ता के मामले में भी यही हुआ है—खपत कम होने के बावजूद बिल का आंकड़ा डरावना होता जा रहा है। उपभोक्ता का कहना है कि यह केवल एक तकनीकी गलती नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं के साथ की जा रही ‘वित्तीय धोखाधड़ी’ है।
शिकायतों की अनदेखी: जब विभाग बन जाता है ‘बहरी दीवार’
इस मामले का सबसे दुखद पहलू यह है कि उपभोक्ता ने पहली बार आवाज नहीं उठाई है। आवेदन में इस बात का जिक्र है कि पूर्व में भी कई बार मौखिक और लिखित रूप से विभागीय कर्मचारियों और अधिकारियों को इस गड़बड़ी से अवगत कराया गया था। लेकिन हर बार केवल ‘जांच करेंगे’ का आश्वासन मिला और बिल में सुधार होने के बजाय उसमें ब्याज और पेनाल्टी जुड़ती चली गई।
बिहार के बिजली विभाग में शिकायतों के निवारण की प्रक्रिया अक्सर फाइलों में दबी रह जाती है। उपभोक्ता का कहना है कि बार-बार गुहार लगाने के बाद भी जब कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो उन्हें मजबूरन फिर से लिखित शिकायत दर्ज करानी पड़ी। एक आम नागरिक के लिए अपनी दैनिक मजदूरी या काम छोड़कर बिजली दफ्तर के चक्कर काटना न केवल आर्थिक नुकसान है, बल्कि मानसिक प्रताड़ना भी है। विभाग की यह उदासीनता उपभोक्ताओं के भरोसे को तोड़ रही है।
आर्थिक बोझ और सामाजिक दबाव: एक उपभोक्ता की विवशता
सन्हौला के इस उपभोक्ता ने अपनी शिकायत में ‘आर्थिक बोझ’ का विशेष उल्लेख किया है। ग्रामीण परिवेश में मध्यमवर्गीय या निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए बिजली का बिल एक बड़ा मासिक खर्च होता है। जब बिल में गड़बड़ी के कारण अनावश्यक रूप से दो से तीन हजार रुपये अतिरिक्त जुड़कर आते हैं, तो पूरे घर का बजट बिगड़ जाता है।
उपभोक्ता ने आवेदन में कहा है कि वे ईमानदारी से बिल का भुगतान करना चाहते हैं, लेकिन केवल उसी राशि का जो उन्होंने वास्तव में खर्च की है। गलत बिल जमा न करने पर बिजली कटने का डर बना रहता है, और जमा करने पर मेहनत की कमाई लुटने का अहसास होता है। यह स्थिति उपभोक्ता को विद्रोह करने पर मजबूर कर देती है। उन्होंने विभाग को दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही बिल की सूक्ष्मता से जांच कर उसमें सुधार नहीं किया गया, तो वे जिला स्तर और राज्य स्तर के वरीय अधिकारियों तक इस मामले को ले जाएंगे।
विभागीय आश्वासन: क्या इस बार बदलेगी तस्वीर?
उपभोक्ता की इस तीखी शिकायत के बाद विभाग में थोड़ी हलचल जरूर देखी गई है। सहायक विद्युत अभियंता कार्यालय ने आवेदन प्राप्त होने की पुष्टि की है। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि उपभोक्ता संख्या 52247740584 के मामले को गंभीरता से लिया जा रहा है। उन्होंने आश्वासन दिया है कि एक टीम गठित कर उपभोक्ता के परिसर में लगे मीटर की जांच की जाएगी और पिछले रिकॉर्ड्स का मिलान किया जाएगा।
अधिकारियों का दावा है कि यदि बिलिंग सॉफ्टवेयर में कोई तकनीकी खराबी पाई जाती है या मीटर रीडर की लापरवाही सामने आती है, तो उसे तुरंत दुरुस्त किया जाएगा और संबंधित कर्मचारी पर भी कार्रवाई होगी। हालांकि, भागलपुर के उपभोक्ताओं के लिए यह ‘आश्वासन’ कोई नई बात नहीं है। अब देखना यह होगा कि यह जांच कब शुरू होती है और उपभोक्ता को वास्तव में राहत मिलती है या नहीं।
भागलपुर में ‘स्मार्ट मीटर’ और बिलिंग की बढ़ती चुनौतियां
यह शिकायत ऐसे समय में आई है जब पूरे भागलपुर और बिहार में ‘स्मार्ट मीटर’ को लेकर बहस छिड़ी हुई है। एक ओर सरकार इसे पारदर्शिता की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, वहीं दूसरी ओर सन्हौला जैसे ग्रामीण क्षेत्रों के उपभोक्ता अभी भी पुरानी व्यवस्था और तकनीकी खामियों से जूझ रहे हैं। चाहे स्मार्ट मीटर हो या पुराना पोस्ट-पेड मीटर, ‘ह्यूमन एरर’ (मानवीय गलती) हर जगह उपभोक्ताओं की परेशानी का कारण बन रही है।
सन्हौला के इस उपभोक्ता का मामला बिजली विभाग के लिए एक ‘अलार्म’ की तरह है। यदि एक उपभोक्ता को अपनी सही खपत साबित करने के लिए अधिकारियों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं, तो इसका मतलब है कि सिस्टम में पारदर्शिता का अभाव है। भागलपुर के नागरिक अब जागरूक हो रहे हैं और अपने हक के लिए आवाज उठा रहे हैं। विभाग को चाहिए कि वह केवल आवेदन लेकर उसे ठंडे बस्ते में न डाले, बल्कि जमीनी स्तर पर जाकर मीटर रीडिंग की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाए।
सन्हौला की यह आवाज अब केवल एक उपभोक्ता की नहीं, बल्कि उन हजारों लोगों की है जो बिजली विभाग के ‘बिल करंट’ से झुलस रहे हैं। यदि विभाग समय रहते नहीं जागा, तो उपभोक्ताओं का यह आक्रोश आने वाले समय में बड़े विरोध प्रदर्शनों का रूप ले सकता है। फिलहाल, सन्हौला का यह उपभोक्ता अपने मीटर की सही जांच और न्यायपूर्ण बिल की प्रतीक्षा कर रहा है।


