
- भागलपुर जिले में आपदा के शिकार हुए व्यक्तियों के परिजनों के लिए राहत की एक बड़ी खबर सामने आई है, जहाँ जिलाधिकारी डॉ. नवल किशोर चौधरी ने मृतक अनुग्रह अनुदान की जटिल प्रक्रिया को पूरी तरह से सरल और पारदर्शी बनाने का नया सरकारी आदेश जारी किया है।
- 6 अप्रैल 2026 से प्रभावी हुए इस नए नियम के तहत अब फाइलों के ‘लूप’ को खत्म कर दिया गया है, जिससे पीड़ित परिवारों को तत्काल आर्थिक सहायता मिल सकेगी।
- अब अंचल अधिकारी (सीओ) को अपनी जांच रिपोर्ट सीधे अनुमंडल पदाधिकारी (एसडीओ) को भेजनी होगी, जिससे बीच के कई स्तरों पर होने वाली अनावश्यक देरी पर विराम लग जाएगा।
- सरकार की इस नई पहल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ‘रिवॉल्विंग फंड’ (चक्रीय निधि) का उपयोग है, जिसके माध्यम से फाइल स्वीकृत होते ही महज 24 घंटे के भीतर चेक या आरटीजीएस से भुगतान सुनिश्चित किया जाएगा।
- कागजी कमियों के कारण फाइलों को वापस अंचल भेजने की परंपरा को समाप्त कर दिया गया है; अब अधिकारी स्वयं आवेदक को बुलाकर त्रुटियों का निराकरण करेंगे।
भागलपुर (द वॉयस ऑफ बिहार)।
प्रशासनिक संवेदनशीलता की नई मिसाल: जब फाइल नहीं, ‘राहत’ दौड़ेगी
किसी भी आपदा में अपनों को खोने का दर्द शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता, लेकिन उस त्रासदी के बाद सरकारी मदद के लिए दफ्तरों की चौखट पर महीनों तक भटकना उस दर्द को और भी गहरा कर देता था। भागलपुर के जिलाधिकारी डॉ. नवल किशोर चौधरी ने इसी मानवीय पीड़ा को समझते हुए ‘मृतक अनुग्रह अनुदान’ की पूरी कार्यप्रणाली को ही बदल दिया है। 6 अप्रैल से लागू हुआ यह नया दिशा-निर्देश दरअसल उस प्रशासनिक ‘डेडलॉक’ को तोड़ने की कोशिश है, जिसमें एक गरीब पीड़ित की फाइल महीनों तक धूल फांकती रहती थी। अब सिस्टम को इस तरह ‘री-डिजाइन’ किया गया है कि मानवीय संवेदनाएं फाइलों के वजन से न दबें।
पुरानी व्यवस्था का ‘भूलभुलैया’: क्यों होता था भुगतान में विलम्ब?
अब तक की प्रचलित प्रक्रिया किसी भूलभुलैया से कम नहीं थी। पूर्व में जब कोई आश्रित आवेदन करता था, तो अंचल अधिकारी ऑफलाइन फाइल तैयार कर उसे भूमि सुधार उपसमाहर्त्ता (एलआरडीसी) को भेजते थे। एलआरडीसी उस फाइल की जांच कर उसे अनुमंडल पदाधिकारी (एसडीओ) के पास भेजते थे। अगर छोटी सी भी गलती होती, तो फाइल वापस अंचल भेज दी जाती थी।
एसडीओ से स्वीकृति मिलने के बाद फिर से अंचल अधिकारी जिला आपदा शाखा से पैसे की मांग करते थे, जो फिर पटना (मुख्यालय) भेजी जाती थी। पटना से आवंटन आने के बाद फिर से जिलों और अंचलों में पैसे का बंटवारा होता था और अंत में ट्रेजरी (खजाना) के माध्यम से भुगतान होता था। इस लंबी चेन के कारण आश्रित को तात्कालिक सहायता नहीं मिल पाती थी, जिससे अनुदान का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाता था।
नई कार्यप्रणाली: सीधा संवाद और तीव्र निष्पादन
जिलाधिकारी द्वारा जारी नए आदेश ने इस लंबी कड़ी को छोटा और प्रभावशाली बना दिया है। अब आवेदन अंचल अधिकारी या सीधे अपर समाहर्त्ता (आपदा प्रबंधन) के पास जमा किया जा सकेगा। आवेदन मिलते ही उसी दिन इसकी सूचना जिला आपदा प्रबंधन शाखा को देनी होगी।
सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब भूमि सुधार उपसमाहर्त्ता (एलआरडीसी) के स्तर को इस प्रक्रिया से हटा दिया गया है। अंचल अधिकारी 6 कार्य दिवसों के भीतर जांच पूरी कर फाइल सीधे एसडीओ को सौंपेंगे। यदि फाइल में कोई कमी है, तो एसडीओ उसे वापस नहीं करेंगे, बल्कि 3 दिनों के भीतर संबंधित कर्मचारी या आवेदक को बुलाकर उसे वहीं ठीक करवाएंगे।
अनिवार्य दस्तावेजों की सूची: आवेदन के समय रखें ध्यान
प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए जिलाधिकारी ने दस्तावेजों की सूची को भी स्पष्ट कर दिया है, ताकि आवेदकों को बार-बार दफ्तर न दौड़ना पड़े:
- प्राथमिकी (FIR) की प्रति
- पोस्टमार्टम रिपोर्ट
- मृत्यु प्रमाण पत्र
- घायल होने की स्थिति में अस्पताल की पर्ची
- आधार कार्ड
- बैंक पासबुक की छायाप्रति
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