
पटना। बिहार की राजधानी पटना के पॉश इलाकों में शुमार शास्त्रीनगर में कानून की रक्षा का दावा करने वाले ‘काले कोट’ के पीछे छिपे एक बड़े अपराधी नेटवर्क का पर्दाफाश हुआ है। खुद को वकील बताकर आम जनता की लाचारी और कानूनी अज्ञानता का फायदा उठाने वाले एक शातिर गिरोह को शास्त्रीनगर पुलिस ने सलाखों के पीछे पहुँचा दिया है। यह मामला केवल सात हजार रुपये की ठगी का नहीं है, बल्कि सरकारी तंत्र के समानांतर एक ‘फर्जी सचिवालय’ चलाने जैसा है। पुलिस ने छापेमारी के दौरान आरोपियों के पास से विभिन्न जिलों के आला अधिकारियों के 39 नकली मोहर बरामद किए हैं, जो यह साबित करते हैं कि यह गिरोह बिहार के प्रशासनिक ढांचे में ‘डिजिटल और मैन्युअल’ सेंधमारी कर रहा था। 5 अप्रैल 2026 की यह बड़ी कार्रवाई पटना पुलिस की सक्रियता का परिणाम है, जिसने ‘अथर्व लीगल सर्विसेज’ के नाम पर चल रहे धोखाधड़ी के इस बड़े साम्राज्य को जमींदोज कर दिया है।
ठगी की पटकथा: जब ‘राजपत्र’ के नाम पर हुआ विश्वासघात
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत अजीत नामक एक पीड़ित के साहस से हुई। अजीत के सरकारी कागजात में नाम की एक छोटी सी त्रुटि थी, जिसे सुधारने के लिए उन्हें ‘राजपत्र’ (Gazette) में प्रकाशन की आवश्यकता थी। सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने से बचने के लिए अजीत पटेल नगर स्थित ‘अथर्व लीगल सर्विसेज’ पहुँचे, जहाँ उनकी मुलाकात खुद को वकील बताने वाले चैतन्य कृष्णन से हुई।
चैतन्य ने अजीत को भरोसा दिलाया कि वह कानूनी प्रक्रिया के जरिए नाम में सुधार करवा देगा और इसके बदले सात हजार रुपये की मांग की। अजीत ने काम की जल्दी और वकील की साख पर भरोसा कर रकम का भुगतान कर दिया। लेकिन कई दिन बीत जाने के बाद भी जब कागजात में कोई सुधार नहीं हुआ, तो अजीत ने सवाल पूछना शुरू किया। जब उन्होंने अपना पैसा और मूल दस्तावेज वापस मांगे, तो चैतन्य और उसके साथियों ने अपना असली रंग दिखाया। अजीत के साथ न केवल गाली-गलौज की गई, बल्कि उनके साथ मारपीट और दुर्व्यवहार भी किया गया। इसी अपमान और धोखाधड़ी की शिकायत लेकर अजीत शास्त्रीनगर थाना पहुँचे, जिसने इस बड़े रैकेट की कलाई खोल दी।
गोकुल पथ पर छापेमारी: फर्जी मोहरों का ‘खजाना’ बरामद
शास्त्रीनगर थाना पुलिस ने अजीत के आवेदन पर त्वरित कार्रवाई करते हुए गोकुल पथ, पटेल नगर स्थित गिरोह के ठिकाने पर छापेमारी की। पुलिस की टीम जब वहां पहुँची, तो आरोपी भागने की फिराक में थे, लेकिन घेराबंदी कर मुख्य आरोपी चैतन्य कृष्णन और उसके दो सहयोगियों—मनीष कुमार और आलोक कुमार को गिरफ्तार कर लिया गया।
तलाशी के दौरान पुलिस को जो मिला, उसने अधिकारियों के भी होश उड़ा दिए। कमरे से एक या दो नहीं, बल्कि कुल 39 अलग-अलग अधिकारियों के नकली मोहर बरामद हुए। इन मोहरों का उपयोग फर्जी हलफनामा, राजपत्र आवेदन और अन्य सरकारी दस्तावेज तैयार करने में किया जा रहा था। यह गिरोह पटना में बैठकर गया, किशनगंज और सिवान जैसे जिलों के प्रशासन को चुनौती दे रहा था।
फर्जीवाड़े का ‘कॉकटेल’: गया से किशनगंज तक फैला नेटवर्क (विशेष विश्लेषण)
द वॉयस ऑफ बिहार के विशेष विश्लेषण के अनुसार, बरामद किए गए 39 मोहरों की सूची यह स्पष्ट करती है कि यह गिरोह कितना संगठित था। जब्त किए गए मोहरों में शामिल हैं:
- एसडीओ (SDO) गया, किशनगंज और सिवान: इन जिलों के अनुमंडल पदाधिकारियों के पदनाम वाली फर्जी मोहरें।
- कार्यपालक पदाधिकारी (सदर): प्रशासनिक कार्यों के सत्यापन के लिए उपयोग की जाने वाली मोहर।
- नोटरी और शपथ आयुक्त: कानूनी दस्तावेजों को प्रमाणित करने के नाम पर उपयोग किए जाने वाले फर्जी ठप्पे।
यह गिरोह केवल नाम सुधारने तक सीमित नहीं था। अंदेशा जताया जा रहा है कि इन मोहरों का उपयोग फर्जी जाति प्रमाणपत्र, आय प्रमाणपत्र और यहाँ तक कि अदालती जमानत के कागजात तैयार करने में भी किया जाता होगा। चैतन्य कृष्णन ने ‘अथर्व लीगल सर्विसेज’ को एक वैध कंपनी के रूप में पेश किया था ताकि लोग बिना किसी शक के उसे अपने संवेदनशील दस्तावेज सौंप दें।
अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी साकेत कुमार की मुस्तैदी
सचिवालय-2 के अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी साकेत कुमार ने प्रेस को संबोधित करते हुए बताया कि चैतन्य कृष्णन एक पेशेवर जालसाज है जो वकील का चोला ओढ़कर लोगों की जेब काट रहा था। साकेत कुमार के अनुसार, शुरुआती जांच में यह पता चला है कि यह गिरोह पटना के बाहर के लोगों को भी निशाना बनाता था। मनीष और आलोक का काम ग्राहकों को फांसना और उन्हें चैतन्य के चेंबर तक पहुँचाना था।
पुलिस अब इस बिंदु पर जांच कर रही है कि इन 39 मोहरों का उपयोग कर अब तक कितने फर्जी दस्तावेज बनाए गए हैं और उनके माध्यम से सरकारी योजनाओं या अदालती प्रक्रियाओं को कितना नुकसान पहुँचाया गया है। साकेत कुमार ने यह भी स्पष्ट किया कि गिरोह के तार अन्य जिलों के कुछ बिचौलियों से भी जुड़े हो सकते हैं, जिनकी पहचान की जा रही है।
काले कोट का दुरुपयोग: विधिक पेशे पर प्रहार
चैतन्य कृष्णन जैसे लोग केवल एक व्यक्ति को नहीं ठगते, बल्कि वे पूरी न्यायपालिका और अधिवक्ता समाज की छवि को धूमिल करते हैं। एक कथित वकील का मारपीट पर उतारू हो जाना और घर में ‘मोहरों की फैक्ट्री’ चलाना यह दर्शाता है कि पटना में ‘अवैध लीगल कंसल्टेंसी’ का एक खतरनाक चलन बढ़ रहा है। आम आदमी जब कचहरी या वकीलों के पास जाता है, तो वह न्याय की उम्मीद में होता है, लेकिन जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो विश्वास का संकट खड़ा हो जाता है।
द वॉयस ऑफ बिहार के सूत्रों के अनुसार, पुलिस अब उन सभी ग्राहकों का डेटा खंगाल रही है जिन्होंने ‘अथर्व लीगल सर्विसेज’ से काम कराया था। यह संभव है कि कई लोगों के पास वर्तमान में जो दस्तावेज हैं, वे पूरी तरह फर्जी हों और उन्हें इस बात की जानकारी तक न हो।
प्रशासनिक सतर्कता और जनता की जिम्मेदारी
एक तटस्थ दृष्टिकोण से देखें तो, यह मामला प्रशासन की आंखों में धूल झोंकने की पराकाष्ठा है। इतने जिलों के एसडीओ के मोहरों का एक साथ मिलना यह बताता है कि हमारे प्रशासनिक तंत्र में ‘मोहरों और प्रमाणपत्रों’ के सत्यापन की प्रक्रिया अभी भी काफी पुरानी और कमजोर है।
- प्रशासनिक चूक: क्या इन अधिकारियों को कभी अंदेशा नहीं हुआ कि उनके नाम पर फर्जी राजपत्र आवेदन चल रहे हैं?
- जनता की भूल: अजीत ने सात हजार रुपये तो दिए, लेकिन क्या उन्होंने चैतन्य की बार काउंसिल की सदस्यता या वकालत का लाइसेंस चेक किया?
प्रशासन को चाहिए कि वह राजपत्र और नाम सुधार जैसी प्रक्रियाओं को पूरी तरह ऑनलाइन और ‘ओटीपी’ आधारित बनाए ताकि बिचौलियों की गुंजाइश ही न रहे।
समाधान की दिशा में शास्त्रीनगर पुलिस का एक्शन
4 अप्रैल और 5 अप्रैल 2026 की यह कार्रवाई पटना के उन तमाम फर्जी गिरोहों के लिए एक चेतावनी है जो ‘काले कोट’ या ‘लीगल फर्म’ के नाम पर दुकान चला रहे हैं। चैतन्य कृष्णन, मनीष कुमार और आलोक कुमार अब सलाखों के पीछे हैं, लेकिन 39 मोहरों की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। साकेत कुमार के नेतृत्व में चल रही यह जांच जल्द ही कुछ और बड़े खुलासे कर सकती है।
द वॉयस ऑफ बिहार की टीम इस पूरे मामले पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए है। हमारा मानना है कि न्याय तभी पूर्ण होगा जब इन आरोपियों को ऐसी सजा मिले जो मिसाल बन सके। फिलहाल, पटेल नगर के उस ‘अथर्व लीगल’ के दफ्तर में ताला लटका है और पटना के पीड़ित अब पुलिस के पास अपनी आपबीती लेकर पहुँच रहे हैं।


