​चंपारण में ‘जहरीली’ मौत का तांडव: पांच घरों के बुझे चिराग, अपनों को खोने के बाद अब ‘अंधेरे’ से जंग, पुलिस ने धंधेबाजों के सिंडिकेट पर कसा शिकंजा

मोतिहारी/पूर्वी चंपारण। बिहार के पूर्वी चंपारण जिले में एक बार फिर ‘मौत के प्याले’ ने कई परिवारों की खुशियां छीन ली हैं। तुरकौलिया और रघुनाथपुर थाना क्षेत्रों में कथित तौर पर जहरीली शराब या संदिग्ध तरल पदार्थ के सेवन से मरने वालों की संख्या अब बढ़कर पांच हो गई है। शुक्रवार का दिन चंपारण के लिए मातम भरा रहा, जहाँ तीन और लोगों ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। वहीं, करीब नौ लोग अब भी अस्पतालों में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं, जिनमें से कई की आंखों की रोशनी पर भी संकट मंडरा रहा है। इस त्रासदी ने न केवल जिला प्रशासन के दावों की पोल खोल दी है, बल्कि पुलिस महकमे के भीतर मौजूद उस भ्रष्टाचार और लापरवाही को भी उजागर किया है, जो ‘शराबबंदी’ की जड़ों को खोखला कर रही है। 4 अप्रैल 2026 की यह दोपहर चंपारण की सड़कों पर सन्नाटा और अस्पतालों में चीख-पुकार लेकर आई है।

मौतों का सिलसिला: गुरुवार से शुक्रवार तक का ‘डेथ चार्ट’

​इस हृदयविदारक घटना की शुरुआत गुरुवार को हुई थी, जब तुरकौलिया थाना क्षेत्र के जयसिंहपुर फुलवार निवासी 22 वर्षीय ई-रिक्शा चालक चंदू कुमार और शंकर सरैया परसौना के 40 वर्षीय प्रमोद यादव की संदिग्ध परिस्थितियों में तबीयत बिगड़ने के बाद मौत हो गई। चंदू ने जहां घर पर ही दम तोड़ा, वहीं प्रमोद ने एक निजी नर्सिंग होम में अंतिम सांस ली।

​शुक्रवार को यह त्रासदी और गहरी हो गई। परसौना की दलित बस्ती में कोहराम मच गया जब 50 वर्षीय परीक्षण मांझी की मौत हो गई। इसके कुछ ही घंटों बाद रघुनाथपुर थाना क्षेत्र के हरदिया निवासी 52 वर्षीय हरीलाल भगत और बालगंगा के 30 वर्षीय सम्पत साह ने भी दम तोड़ दिया। सम्पत साह का इलाज मुजफ्फरपुर के एसकेएमसीएच (SKMCH) में चल रहा था, जहाँ डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका। यह केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि उन पांच परिवारों की बर्बादी की कहानी है जिनके कमाने वाले सदस्य अब इस दुनिया में नहीं हैं।

अंधेरे से जंग: नौ घायल और ‘धुंधली’ होती दुनिया

​मौत का यह तांडव केवल श्मशान तक सीमित नहीं है। जिले के विभिन्न सरकारी और निजी अस्पतालों में अभी भी नौ लोग उपचाराधीन हैं। इनमें से चार की हालत अत्यंत नाजुक बताई जा रही है, जिन्हें वेंटिलेटर या गहन चिकित्सा इकाई (ICU) में रखा गया है। इस घटना का एक और डरावना पहलू यह है कि आधे दर्जन से अधिक मरीजों ने ‘धुंधला दिखने’ की शिकायत की है। मेडिकल विशेषज्ञों के अनुसार, मेथेनॉल जैसे जहरीले रसायनों का सेवन सीधे आंखों की रोशनी (Optic Nerve) पर प्रहार करता है। चंपारण के इन गांवों में अब कई ऐसे लोग हैं जो शायद अब कभी दुनिया को अपनी आंखों से न देख सकें।

प्रशासनिक ‘आउटपुट’: एसआईटी का गठन और खाकी पर गाज (विशेष विश्लेषण)

​घटना की गंभीरता को देखते हुए पूर्वी चंपारण के पुलिस अधीक्षक स्वर्ण प्रभात ने कड़ा रुख अख्तियार किया है। उन्होंने तुरकौलिया थानाध्यक्ष उमाशंकर मांझी को कर्तव्यहीनता और लापरवाही के आरोप में तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। इसके साथ ही, परसौना के चौकीदार भरत राय को भी गिरफ्तार किया गया है, जिसकी नाक के नीचे यह पूरा अवैध धंधा फल-फूल रहा था।

द वॉयस ऑफ बिहार के विशेष विश्लेषण के अनुसार, पुलिस ने इस बार केवल ‘मोहरों’ पर नहीं, बल्कि ‘मास्टरमाइंड’ पर भी हाथ डाला है:

  1. सिंडिकेट का भंडाफोड़: पुलिस ने 20 घंटे के भीतर सघन छापेमारी कर 30 से अधिक शराब धंधेबाजों को दबोचा है। इनमें मुख्य साजिशकर्ता नागा राय, स्पिरिट की सप्लाई करने वाला कन्हैया और राजा शामिल हैं। यह तीनों ही इस पूरे ‘डेथ रैकेट’ के संचालक माने जा रहे हैं।
  2. एसआईटी की मुस्तैदी: सदर डीएसपी दिलीप कुमार के नेतृत्व में एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया है, जिसमें साइबर डीएसपी और डीआईयू (DIU) प्रभारी को भी शामिल किया गया है। यह टीम कॉल डिटेल्स और तकनीकी साक्ष्यों के जरिए यह पता लगा रही है कि जहरीले स्पिरिट की खेप कहाँ से आई थी।
  3. धाराओं का पेच: तुरकौलिया पुलिस ने इस मामले में ‘हत्या’ (धारा 103, BNS) का मुकदमा दर्ज किया है, जो यह दर्शाता है कि पुलिस अब इसे केवल ‘दुर्घटना’ नहीं बल्कि एक ‘सोची-समझी हत्या’ मानकर चल रही है।

परिजनों का फर्दबयान: ‘शराब’ ही थी मौत का सबब?

​जहाँ जिला प्रशासन अपने आधिकारिक बयानों में ‘जहरीले पदार्थ’ शब्द का उपयोग कर रहा है, वहीं परिजनों ने अपनी प्राथमिकी (FIR) में साफ तौर पर शराब के सेवन की बात कही है। तुरकौलिया में प्रमोद यादव और रघुनाथपुर में हीरालाल भगत के परिजनों ने जो आवेदन दिया है, उसमें स्पष्ट लिखा है कि शराब पीने के कुछ ही घंटों बाद पेट दर्द, उल्टियां और आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा था। सदर डीएसपी दिलीप कुमार ने भी प्रथम दृष्टया इसे शराब के सेवन से जुड़ी घटना माना है।

​यह विरोधाभास अक्सर ऐसी घटनाओं में देखा जाता है, जहाँ प्रशासन ‘शराबबंदी’ की साख बचाने के लिए शब्दों के मायाजाल का उपयोग करता है, लेकिन अस्पताल के बेड पर पड़े मरीज की व्यथा हकीकत बयां कर देती है।

दलित बस्तियों में पसरा सन्नाटा: सामाजिक और आर्थिक चोट

​परसौना की दलित बस्ती जहाँ परीक्षण मांझी रहते थे, वहां अब केवल सन्नाटा और पुलिस के जूतों की आवाज सुनाई दे रही है। यह बस्ती इस त्रासदी का केंद्र बनी हुई है। यहाँ के लोग डरे हुए हैं और कई लोग पुलिस के डर से इलाज के लिए सामने आने से भी कतरा रहे हैं। जहरीली शराब की मार अक्सर समाज के सबसे निचले तबके पर पड़ती है, जहाँ सस्ते नशे के चक्कर में लोग अपनी जान गंवा बैठते हैं। मृतक चंदू कुमार केवल 22 साल का था और ई-रिक्शा चलाकर अपने बूढ़े माता-पिता का पेट पाल रहा था। अब उसके जाने के बाद उस परिवार के सामने दाने-दाने का संकट खड़ा हो गया है।

व्यवस्था की विफलता या माफिया का रसूख?

​एक तटस्थ दृष्टिकोण से देखें तो चंपारण की यह घटना बिहार में शराबबंदी कानून की क्रियान्वयन क्षमता पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है।

  • पुलिस की भूमिका: थानाध्यक्ष का निलंबन यह साबित करता है कि स्थानीय पुलिस की मिलीभगत के बिना इतनी बड़ी मात्रा में स्पिरिट की सप्लाई और शराब का निर्माण संभव नहीं था।
  • स्पिरिट का काला बाजार: कन्हैया और राजा जैसे लोग जो स्पिरिट मंगा रहे थे, वे औद्योगिक स्पिरिट का उपयोग शराब बनाने में कर रहे थे। क्या औद्योगिक स्पिरिट के उपयोग की कोई निगरानी व्यवस्था नहीं है?
  • धंधेबाजों का साहस: 20 घंटे में 30 गिरफ्तारियां यह बताती हैं कि धंधेबाज समाज के बीच ही मौजूद थे, बस पुलिस की आंखों पर ‘लापरवाही’ की पट्टी बंधी थी।

समाधान की दिशा में बढ़ते कदम या केवल खानापूर्ति?

​पूर्वी चंपारण के पुलिस अधीक्षक स्वर्ण प्रभात ने जो सख्ती दिखाई है, उससे विभाग के भीतर एक संदेश तो गया है, लेकिन क्या यह पांच मौतों की भरपाई कर पाएगा? 30 गिरफ्तारियां और एसआईटी का गठन उन परिवारों के लिए कोई सांत्वना नहीं है जिन्होंने अपना सब कुछ खो दिया है। चंपारण अब केवल न्याय और उन दोषियों के लिए फांसी की सजा मांग रहा है जिन्होंने चंद रुपयों के लालच में पांच घरों के दीये बुझा दिए।

द वॉयस ऑफ बिहार की टीम इस पूरी त्रासदी पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए है। हमारा मानना है कि जब तक ‘चेन ऑफ सप्लाई’ को जड़ से नहीं काटा जाएगा, तब तक तुरकौलिया और रघुनाथपुर जैसे कांड बिहार की नियति बने रहेंगे। फिलहाल, पुलिस की टीमें छापेमारी कर रही हैं और पूरा चंपारण उन चार गंभीर मरीजों की सलामती की दुआ मांग रहा है जो अभी भी मौत से लड़ रहे हैं।

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