​मसौढ़ी में दोस्ती की चादर पर खून के धब्बे: ढलाई कर लौट रहे युवक की ‘दोस्त’ ने ही ली जान, हनुमान मंदिर में मिला शव

मसौढ़ी/पटना। राजधानी पटना से सटे मसौढ़ी अनुमंडल के भगवानपुर इलाके में इंसानियत और अटूट भरोसे को शर्मसार करने वाली एक रूह कंपा देने वाली वारदात सामने आई है। जहाँ एक ओर समाज दोस्ती की मिसालें देता है, वहीं मसौढ़ी के बेलौटी गांव के दो युवकों के बीच की गहरी मित्रता का अंत ‘खून’ से हुआ। एक साथ काम करने वाले और एक ही थाली में खाने वाले दो दोस्तों में से एक काल बन गया और दूसरे की बेरहमी से गला घोंटकर हत्या कर दी। 4 अप्रैल 2026 की सुबह जब भगवानपुर स्थित मंशापूर्ण पंचरूपी हनुमान मंदिर के प्रांगण में 20 वर्षीय रूपेश पासवान उर्फ टिलीहा का बेजान शरीर मिला, तो पूरे इलाके में सनसनी फैल गई। इस घटना ने न केवल दो परिवारों को तबाह किया है, बल्कि ग्रामीण अंचलों में बढ़ते अपराध और आपसी रंजिश के खौफनाक चेहरे को भी उजागर किया है।

गुरुवार की शाम और वो आखिरी मुलाकात

​घटना की पटकथा गुरुवार की शाम को ही लिख दी गई थी। मसौढ़ी के बेलौटी गांव के रहने वाले अरुण पासवान का पुत्र रूपेश और उसी गांव के संजय रविदास का पुत्र शंकर रविदास, दोनों ही पेशे से मजदूर थे और मेहनत-मजदूरी कर अपना गुजर-बसर करते थे। गुरुवार को दोनों पकड़ी गांव में एक मकान की ढलाई का काम करने गए थे। दिन भर साथ पसीना बहाने के बाद शाम को जब काम खत्म हुआ, तो दोनों साथ ही घर के लिए निकले।

​रास्ते में बलियारी के पास दोनों रुके। प्रत्यक्षदर्शियों और परिजनों के अनुसार, रूपेश और शंकर को बेलौटी मोड़ पर एक साथ देखा गया था। उस वक्त किसी को भी इस बात का आभास नहीं था कि यह इन दोनों की आखिरी साझा यात्रा होगी। रूपेश ने अपने घर पर खबर दी थी कि वह शंकर के साथ है और थोड़ी देर में घर लौटेगा। लेकिन जब रात गहरी होती गई और रूपेश घर नहीं पहुँचा, तो परिजनों की चिंता बढ़ने लगी। उधर शंकर का मोबाइल भी बंद आने लगा, जिससे संदेह गहरा गया।

हनुमान मंदिर में ‘मौत का सन्नाटा’: शुक्रवार की सुबह का मंजर

​शुक्रवार की सुबह जब भगवानपुर के लोग मंशापूर्ण पंचरूपी हनुमान मंदिर में दर्शन के लिए पहुँचे, तो वहां का दृश्य विचलित करने वाला था। मंदिर के परिसर में रूपेश का शव पड़ा हुआ था। उसके शरीर पर चोट के निशान थे और गर्दन पर रस्सी या हाथों से गला घोंटने के गहरे दाग मौजूद थे। यह साफ था कि हत्या से पहले रूपेश और कातिल के बीच काफी गुत्थमगुत्थी और मारपीट हुई थी।

​जैसे ही शव की शिनाख्त रूपेश के रूप में हुई, बेलौटी गांव से सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण मौके पर पहुँच गए। अपने युवा बेटे को खोने का गम आक्रोश में बदल गया। उग्र ग्रामीणों ने पुलिस प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी करते हुए सड़क जाम कर दिया और कुछ देर के लिए यातायात पूरी तरह ठप कर दिया। ग्रामीणों की मांग थी कि हत्यारे को तुरंत गिरफ्तार किया जाए और उसे सख्त से सख्त सजा दी जाए।

अपराधी का ‘सरेंडर’: एक मां का न्याय और पुलिस की मुस्तैदी

​इस मामले में सबसे दिलचस्प और प्रेरक मोड़ तब आया जब आरोपी शंकर रविदास की मां ने ही न्याय की मिसाल पेश की। हत्या के बाद से शंकर फरार था और पुलिस की कई टीमें उसकी तलाश में छापेमारी कर रही थी। शंकर की मां को जब बेटे की करतूत का पता चला, तो उन्होंने ममता पर नैतिकता को प्राथमिकता दी।

​थानाध्यक्ष विवेक भारती के अनुसार, शंकर की मां ने पूर्व मुखिया रामनाथ पासवान और कुछ स्थानीय समर्थकों के माध्यम से अपने बेटे को पुलिस के हवाले कर दिया। यह ग्रामीण समाज में एक बड़ा संदेश है कि अपराधी चाहे अपना ही क्यों न हो, उसे कानून के सामने झुकना ही होगा। पुलिस ने शंकर को हिरासत में लेकर जब कड़ाई से पूछताछ की, तो उसने अपना जुर्म कबूल कर लिया।

निशानदेही पर बरामदगी: खेत में छिपा था सच

​गिरफ्तार शंकर रविदास की निशानदेही पर पुलिस ने एक खेत से मृतक रूपेश का मोबाइल फोन भी बरामद कर लिया है। शंकर ने हत्या के बाद साक्ष्य मिटाने के उद्देश्य से मोबाइल को झाड़ियों और खेत के बीच फेंक दिया था। पुलिस अब मोबाइल के कॉल डेटा रिकॉर्ड (CDR) को खंगाल रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि हत्या से पहले उन दोनों के बीच क्या बातचीत हुई थी और क्या इस साजिश में कोई तीसरा व्यक्ति भी शामिल था।

​विवेक भारती ने बताया कि रूपेश के पिता अरुण पासवान द्वारा लिखित आवेदन मिलने के बाद प्राथमिकी दर्ज कर ली गई है। पुलिस अब हत्या के वास्तविक कारणों की जांच कर रही है। हालांकि शंकर ने हत्या की बात मान ली है, लेकिन वह अभी तक यह स्पष्ट नहीं कर पाया है कि ऐसी क्या बात हुई कि उसने अपने ही जिगरी दोस्त का गला घोंट दिया। क्या यह विवाद पैसों के लेन-देन को लेकर था या इसके पीछे कोई पुरानी रंजिश थी, इसका खुलासा विस्तृत जांच के बाद ही होगा।

दोस्ती, विश्वासघात और समाज की चुनौती (विशेष विश्लेषण)

​द वॉयस ऑफ बिहार के विशेष विश्लेषण के अनुसार, मसौढ़ी की यह घटना समाज के गिरते नैतिक मूल्यों की ओर इशारा करती है। 2026 के इस दौर में, जहाँ युवा वर्ग पर नशे और त्वरित गुस्से (Instant Rage) का असर बढ़ रहा है, ऐसी घटनाएं आम होती जा रही हैं।

  1. भरोसे का कत्ल: रूपेश को जरा भी अंदाजा नहीं होगा कि जिसके साथ उसने दिन भर काम किया, वही रात में उसकी जान ले लेगा। यह ‘दोस्त’ शब्द की गरिमा पर एक बड़ा आघात है।
  2. ग्रामीण कानून-व्यवस्था: मंदिर जैसे सार्वजनिक और धार्मिक स्थल पर हत्या होना यह दर्शाता है कि अपराधियों के मन में कानून का डर कम होता जा रहा है।
  3. सामाजिक न्याय: पूर्व मुखिया रामनाथ पासवान और शंकर की मां की भूमिका इस केस में सराहनीय रही। यदि ग्रामीण इसी तरह पुलिस का सहयोग करें, तो अपराधियों को भागने की जगह नहीं मिलेगी।

पीड़ित परिवार की व्यथा: बुझ गया घर का चिराग

​अरुण पासवान के घर में मातम छाया हुआ है। 20 साल का रूपेश घर की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहा था। उसके जाने से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है और वे बार-बार एक ही सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर शंकर ने ऐसा क्यों किया? जिस शंकर को वे अपने बेटे की तरह मानते थे, वही उनके घर का चिराग बुझा देगा, ऐसी कल्पना किसी ने नहीं की थी।

न्याय की आस में मसौढ़ी

​मसौढ़ी पुलिस ने इस मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए मुख्य आरोपी को जेल भेजने की तैयारी कर ली है। 4 अप्रैल की यह दोपहर बेलौटी गांव के लिए सन्नाटे भरी है, जहाँ अब रंजिश और बदले की भावना की जगह इंसाफ की चर्चा हो रही है। विवेक भारती ने आश्वासन दिया है कि केस को स्पीडी ट्रायल के जरिए जल्द से जल्द तार्किक परिणति तक पहुँचाया जाएगा ताकि रूपेश की आत्मा को शांति मिल सके।

द वॉयस ऑफ बिहार की टीम इस पूरी स्थिति पर नजर बनाए हुए है। हमारा मानना है कि जब तक समाज में युवाओं के बीच बढ़ती हिंसक प्रवृत्तियों को नहीं रोका जाएगा, तब तक ऐसी ‘खूनी दोस्ती’ की खबरें हमें झकझोरती रहेंगी। फिलहाल, मसौढ़ी की सड़कों से जाम हट चुका है, लेकिन लोगों के दिलों में जमा गुस्सा अभी भी न्याय की प्रतीक्षा कर रहा है।

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