​शब्दों के रणक्षेत्र में पटना की मेधा का परचम: ‘एकेड क्वॉड’ क्रॉसवर्ड में श्रद्धा और धैर्य ने मारी बाजी, त्रिशूर और चेन्नई के दिग्गजों ने भी दिखाया दम

पटना। बिहार की धरती सदियों से अपनी बौद्धिक क्षमता और मेधा के लिए विश्व विख्यात रही है। इसी परंपरा को आधुनिक डिजिटल युग में आगे बढ़ाते हुए पटना के दो मेधावी छात्रों ने राष्ट्रीय स्तर की क्रॉसवर्ड प्रतियोगिता में अपना लोहा मनवाया है। 3 अप्रैल 2026 को जारी किए गए ‘एकेड क्वॉड’ (ACAD QUAD) ऑनलाइन क्रॉसवर्ड प्रतियोगिता के परिणामों ने यह साफ कर दिया है कि शब्दों के इस मायाजाल और दिमागी कसरत में बिहार के युवाओं का कोई सानी नहीं है। मार्च 2026 के महीने के लिए आयोजित इस दैनिक स्पर्धा में जहाँ पटना के स्कूल और कॉलेज के छात्रों ने शीर्ष स्थान हासिल किए, वहीं सीनियर और ग्लोबल श्रेणियों में दक्षिण भारत के प्रतिभागियों का दबदबा रहा।

धैर्य और श्रद्धा: पटना के दो सितारे जो शब्दों के सिकंदर बने

​मार्च महीने की इस कठिन और चुनौतीपूर्ण क्रॉसवर्ड प्रतियोगिता में डॉन बॉस्को एकेडमी, पटना के छात्र धैर्य पांडे ने ‘एकेड स्कूल’ (ACAD School) श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त कर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। धैर्य की इस सफलता ने न केवल उनके विद्यालय बल्कि पूरे शहर का मान बढ़ाया है। वहीं, ‘एकेड कॉलेज’ (ACAD College) श्रेणी में सेंट माइकल्स हाई स्कूल, पटना की छात्रा श्रद्धा श्री ने देश भर के कॉलेज स्तर के प्रतिभागियों को पीछे छोड़ते हुए पहला स्थान कब्जाया।

​यह गौर करने वाली बात है कि क्रॉसवर्ड जैसी बौद्धिक विधा में जहाँ सटीक शब्दावली, सामान्य ज्ञान और त्वरित सोच की आवश्यकता होती है, वहाँ पटना के इन दो युवा मस्तिष्क ने अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की है। श्रद्धा और धैर्य की इस जीत ने साबित कर दिया है कि बिहार की नई पीढ़ी डिजिटल प्लेटफार्मों पर भी अपनी वैचारिक गहराई और भाषाई पकड़ को लेकर कितनी सजग है।

बेगूसराय का गौरव: आवासीय विद्यालय के छात्रों ने रचा इतिहास

​पटना के साथ-साथ बिहार के औद्योगिक शहर बेगूसराय ने भी इस राष्ट्रीय प्रतियोगिता में अपनी उपस्थिति मजबूती से दर्ज कराई है। ‘एकेड स्कूल’ श्रेणी में डॉ. भीमराव अंबेडकर आवासीय विद्यालय, बेगूसराय के दो छात्रों—दिलखुश कुमार और बिट्टू कुमार—ने क्रमशः दूसरा और तीसरा स्थान प्राप्त किया। एक आवासीय विद्यालय से निकलकर राष्ट्रीय स्तर की ऑनलाइन प्रतियोगिता में शीर्ष तीन में जगह बनाना यह दर्शाता है कि अवसर मिलने पर ग्रामीण और सरकारी स्कूलों के छात्र भी किसी बड़े निजी स्कूल से कमतर नहीं हैं। दिलखुश और बिट्टू की यह उपलब्धि उन हजारों छात्रों के लिए प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों में अपनी मेधा को निखार रहे हैं।

सीनियर और ग्लोबल वर्ग: अनुभव और वैश्विक पहुंच का संगम

​जहाँ युवा वर्ग में बिहार का बोलबाला रहा, वहीं अनुभव की कसौटी पर दक्षिण भारत के प्रतिभागियों ने बाजी मारी। ‘एकेड सीनियर’ (ACAD Senior) श्रेणी में, जो 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों के लिए विशेष रूप से बनाई गई है, केरल के त्रिशूर निवासी जैकब ब्रह्मकुलम ने प्रथम स्थान प्राप्त किया। सीनियर श्रेणी में चेन्नई की आर. उमा और एन. रेंगास्वामी क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे। यह वर्ग इस बात का प्रमाण है कि सीखने और दिमागी कसरत करने की कोई उम्र नहीं होती।

​’एकेड ग्लोबल’ (ACAD Global) श्रेणी में, जो पूरी दुनिया के क्रॉसवर्ड प्रेमियों के लिए खुला मंच है, चेन्नई के ही रामकृष्णन कृष्णन ने बाजी मारी। इस श्रेणी में दूसरे स्थान पर सिकंदराबाद के समीत कल्लियनपुर और तीसरे स्थान पर बेंगलुरु की मोना सोगल रहीं। यह श्रेणी दर्शाती है कि क्रॉसवर्ड की लोकप्रियता अब भौगोलिक सीमाओं को लांघ चुकी है और भारत के विभिन्न शहरों से लोग इस बौद्धिक अनुभव का हिस्सा बन रहे हैं।

एकेड (ACAD): एक दशक की सफलता का सफर (विशेष विश्लेषण)

​’ए-क्लू-ए-डे’ (A-Clue-A-Day) यानी एकेड की शुरुआत वर्ष 2014 में की गई थी। इसके पीछे मुख्य उद्देश्य यह था कि स्कूली छात्रों को प्रतिदिन कम से कम एक ऐसी शैक्षिक गतिविधि से जोड़ा जाए जो मनोरंजक भी हो और उनके मानसिक विकास में सहायक भी। पिछले 12 वर्षों में यह प्रतियोगिता एक छोटे से प्रयास से बढ़कर एक विशाल राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आयोजन बन चुकी है।

द वॉयस ऑफ बिहार की टीम ने जब इस प्रतियोगिता की संरचना का विश्लेषण किया, तो कुछ महत्वपूर्ण बिंदु सामने आए:

  • विविधता: यह प्रतियोगिता अब चार स्पष्ट वर्गों में विभाजित है—स्कूल, कॉलेज, सीनियर और ग्लोबल। इससे समाज के हर वर्ग को अपनी उम्र और योग्यता के अनुसार प्रतिस्पर्धा करने का मौका मिलता है।
  • आयोजन की निरंतरता: यह कोई एक दिन की घटना नहीं है, बल्कि 1 फरवरी से 31 अक्टूबर तक चलने वाली एक मैराथन है। इसमें विजेता बनने के लिए अनुशासन और निरंतरता की आवश्यकता होती है।
  • एक्स्ट्रा-सी (Extra-C) की पहल: एक सिविल सोसाइटी पहल के रूप में ‘एक्स्ट्रा-सी’ ने बौद्धिक खेलों को प्रोत्साहित करने में बड़ी भूमिका निभाई है। इसकी आधिकारिक वेबसाइट www.crypticsingh.com पर यह पूरी प्रक्रिया संचालित होती है।

क्रॉसवर्ड का महत्व: केवल खेल नहीं, दिमागी कसरत

​विशेषज्ञों का मानना है कि क्रॉसवर्ड सुलझाना केवल समय बिताने का जरिया नहीं है, बल्कि यह संज्ञानात्मक (Cognitive) विकास के लिए एक बेहतरीन उपकरण है। यह आपकी तर्कशक्ति को बढ़ाता है, शब्दावली को समृद्ध करता है और धैर्य का पाठ पढ़ाता है। पटना और बेगूसराय के छात्रों की इस उपलब्धि से यह संकेत मिलता है कि बिहार की शिक्षा प्रणाली में धीरे-धीरे तर्क और विश्लेषण पर आधारित गतिविधियों को महत्व दिया जा रहा है।

​आईआईटी मद्रास की तिशा तनेजा और गोवा डेंटल कॉलेज की समृद्धि सालगांवकर जैसे कॉलेज स्तर के विजेताओं की मौजूदगी यह बताती है कि तकनीकी और चिकित्सा शिक्षा में जुटे छात्र भी अपनी भाषाई क्षमताओं को संवारने में रुचि ले रहे हैं। यह एक सकारात्मक संतुलन है जो भविष्य के पेशेवरों के लिए अत्यंत आवश्यक है।

निःशुल्क शिक्षा और प्रोत्साहन का मॉडल

​एकेड प्रतियोगिता की एक सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें भाग लेना पूरी तरह से निःशुल्क है। वेबसाइट पर पंजीकरण कर कोई भी व्यक्ति पासवर्ड प्राप्त कर सकता है और प्रतिदिन अपनी बौद्धिक क्षमता को चुनौती दे सकता है। प्रतियोगिता के दौरान उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वालों के लिए ‘सरप्राइज गिफ्ट्स’ का भी प्रावधान है, जो छात्रों और बुजुर्गों के बीच उत्साह बनाए रखने का एक अच्छा माध्यम है।

चुनौतियों के बीच जीत का अहसास

​आज जब सोशल मीडिया और शॉर्ट वीडियो के इस दौर में लोगों की ‘अटेंशन स्पैन’ (एकाग्रता की अवधि) कम होती जा रही है, ऐसे समय में क्रॉसवर्ड जैसे खेलों की ओर युवाओं का रुझान एक सुखद बदलाव है। पटना के धैर्य और श्रद्धा की जीत यह भी याद दिलाती है कि डिजिटल तकनीक का सही इस्तेमाल शिक्षा को कितना सुलभ और प्रतिस्पर्धी बना सकता है।

​हालाँकि, यह भी सच है कि ऐसी प्रतियोगिताओं की जानकारी अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों के बड़े हिस्से तक नहीं पहुँच पाई है। बेगूसराय के आवासीय विद्यालय के छात्रों की सफलता इस बात का संकेत है कि अगर प्रचार-प्रसार बढ़ाया जाए, तो बिहार के सुदूर इलाकों से और भी कई रत्न निकलकर सामने आएंगे। प्रशासन और शिक्षा विभाग को चाहिए कि वे ऐसी ऑनलाइन शैक्षिक पहलों को सरकारी स्कूलों के पाठ्यक्रम और गतिविधियों का हिस्सा बनाएं।

बौद्धिक बिहार की नई तस्वीर

​मार्च 2026 के परिणाम बिहार के लिए एक उत्सव का विषय हैं। धैर्य पांडे और श्रद्धा श्री ने पटना की बौद्धिक विरासत को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया है। जैकब ब्रह्मकुलम और रामकृष्णन कृष्णन जैसे वरिष्ठ प्रतिभागियों ने हमें सिखाया है कि मेधा कभी पुरानी नहीं पड़ती। 31 अक्टूबर तक चलने वाली इस प्रतियोगिता में अभी कई और अध्याय लिखे जाने बाकी हैं।

द वॉयस ऑफ बिहार की टीम सभी विजेताओं को उनके शानदार प्रदर्शन के लिए बधाई देती है। यह केवल एक जीत नहीं है, बल्कि शब्दों और संकेतों की उस दुनिया में बिहार की धाक है, जहाँ केवल और केवल बुद्धिमत्ता की पूजा होती है। एकेड क्वॉड के अगले चरणों में भी बिहार के इन मेधावियों से और भी बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है। फिलहाल, पटना और बेगूसराय के इन छात्रों ने यह साबित कर दिया है कि शब्दों के इस खेल में बिहार का नाम सबसे ऊपर रहेगा।

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