​मोतिहारी शराब कांड पर सियासी घमासान: जन सुराज ने सरकार को घेरा, मनोज भारती बोले—’ज़हरीली मौत की ज़िम्मेदार नीतीश सरकार और निकम्मा प्रशासन’

मोतिहारी/पटना। पूर्वी चंपारण के मोतिहारी में ज़हरीली शराब ने एक बार फिर कोहराम मचा दिया है। मौतों का आंकड़ा पांच तक पहुँचने और दर्जनों लोगों की आंखों की रोशनी चले जाने के बाद अब इस मामले ने बड़ा राजनीतिक रूप ले लिया है। शुक्रवार को जन सुराज के प्रदेश अध्यक्ष मनोज भारती ने मोतिहारी पहुँचकर पीड़ितों और उनके परिवारों से मुलाकात की। तुरकौलिया के प्रभावित गांवों से लेकर सदर अस्पताल के वार्डों तक का दौरा करने के बाद मनोज भारती ने राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन पर तीखा हमला बोला। 3 अप्रैल 2026 की यह दोपहर मोतिहारी के लिए केवल मातम की नहीं, बल्कि सत्ता की नीतियों पर उठते गंभीर सवालों की गवाह बनी।

ग्राउंड जीरो पर जन सुराज: पीड़ितों का दर्द और प्रदेश अध्यक्ष का गुस्सा

​जन सुराज के प्रदेश अध्यक्ष मनोज भारती शुक्रवार दोपहर सबसे पहले तुरकौलिया प्रखंड के उन गांवों में पहुँचे जहां ‘ज़हरीले जाम’ ने घरों के चिराग बुझा दिए हैं। वहाँ उन्होंने मृतकों के परिजनों से मुलाकात की और उनकी व्यथा सुनी। इसके बाद वे सीधे मोतिहारी सदर अस्पताल पहुँचे, जहाँ ज़हरीली शराब के शिकार करीब आधा दर्जन से अधिक लोग जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। अस्पताल के बिस्तर पर तड़पते उन लोगों को देखकर, जिनकी आंखों के सामने अब हमेशा के लिए अंधेरा छा गया है, मनोज भारती ने व्यवस्था पर गहरा क्षोभ व्यक्त किया।

​मनोज भारती ने मीडिया ब्रीफिंग के दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा कि इन मौतों के लिए सीधे तौर पर नीतीश सरकार और स्थानीय प्रशासन ज़िम्मेदार है। उन्होंने आरोप लगाया कि जब प्रशासन ही पूरी तरह से नकारा हो जाए, तभी ऐसी घटनाएं बार-बार दोहराई जाती हैं। उनके अनुसार, पीड़ितों की चीखें यह बता रही हैं कि बिहार में शराबबंदी केवल एक कागजी ढकोसला बनकर रह गई है, जिसका खामियाजा केवल गरीब और वंचित तबके को अपनी जान देकर चुकाना पड़ रहा है।

इतिहास दोहरा रहा है खुद को: 2023 की याद और अनसुलझे सवाल

​मनोज भारती ने मोतिहारी के पुराने घावों को कुरेदते हुए याद दिलाया कि यह पहली बार नहीं है जब इस जिले में ऐसी त्रासदी हुई है। उन्होंने कहा कि साल 2023 में भी मोतिहारी में ज़हरीली शराब के कारण 44 लोगों की दर्दनाक मौत हुई थी। उस समय भी प्रशासन ने बड़े-बड़े दावे किए थे और सरकार ने सख्ती की बात कही थी। लेकिन तीन साल बीत जाने के बाद भी आज 2026 में स्थिति जस की तस बनी हुई है।

​जन सुराज के प्रदेश अध्यक्ष ने सवाल उठाया कि आखिर तीन साल में प्रशासन ने क्या सीखा? अगर 2023 की घटना के बाद ज़हरीली शराब के नेटवर्क को ध्वस्त कर दिया गया होता, तो आज परिछन मांझी और संपत साह जैसे लोग जीवित होते। मनोज भारती का तर्क है कि बार-बार होने वाली ये घटनाएं प्रशासन और सरकार की सामूहिक नाकामी का सबसे बड़ा प्रमाण हैं। उन्होंने कहा कि जब पुलिस का सूचना तंत्र (Intelligence) पूरी तरह फेल हो जाए और शराब माफियाओं के साथ सांठगांठ हो जाए, तभी ज़हर की बोतलें निर्बाध रूप से गांवों तक पहुँचती हैं।

बेवजह के कानूनों को हटाने की मांग: जन सुराज का कड़ा रुख (विशेष विश्लेषण)

​इस त्रासदी के बहाने जन सुराज ने बिहार के शराबबंदी कानून पर अब तक का सबसे कड़ा प्रहार किया है। मनोज भारती ने मांग की है कि सरकार को अपनी हठधर्मिता छोड़कर उन ‘बेवजह के कानूनों’ को तुरंत हटा देना चाहिए जो धरातल पर फेल हो चुके हैं।

द वॉयस ऑफ बिहार के विशेष विश्लेषण के अनुसार, जन सुराज का यह रुख बिहार की राजनीति में एक बड़ी बहस छेड़ने वाला है:

  1. कानून बनाम हकीकत: मनोज भारती का मानना है कि शराबबंदी ने बिहार में एक नया और खतरनाक ‘समानांतर अपराधी तंत्र’ खड़ा कर दिया है। जहाँ कानूनी शराब की जगह अब ज़हरीली और कच्ची शराब ने ले ली है।
  2. प्रशासनिक भ्रष्टाचार: जब कानून लागू करने वाली एजेंसी (पुलिस) ही वसूली में लग जाए, तो कानून का डर खत्म हो जाता है। जन सुराज का आरोप है कि शराबबंदी के नाम पर पुलिस का एक बड़ा हिस्सा केवल ‘कलेक्शन’ में जुटा है।
  3. गरीबों पर दोहरी मार: शराब पीने वाले को जेल भेजा जा रहा है और ज़हर बेचने वाला सिंडिकेट सुरक्षित है। मनोज भारती ने इसी विसंगति पर निशाना साधते हुए कानून की समीक्षा या उसे खत्म करने की मांग की है।

सदर अस्पताल की बदहाली और आंखों का अंधेरा

​मनोज भारती ने अस्पताल के भीतर की अव्यवस्था पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि मोतिहारी जैसे संवेदनशील जिले के सदर अस्पताल में ज़हरीली शराब के पीड़ितों के इलाज के लिए कोई विशेष ट्रौमा सेंटर या विशेषज्ञों की टीम नहीं है। जिन लोगों की आंखों की रोशनी चली गई है, उनके लिए क्या व्यवस्था है?

​अस्पताल में भर्ती मरीजों के परिजनों ने मनोज भारती को बताया कि कई लोग तो गिरफ्तारी के डर से अस्पताल आने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहे हैं। जन सुराज के नेता ने कहा कि यह कैसी विडंबना है कि ज़हर भी सरकार की नाक के नीचे बिक रहा है और इलाज कराने आने पर जेल का डर भी सरकार ही दिखा रही है। उन्होंने माँग की कि पीड़ितों का मुफ्त इलाज हो और मृतक आश्रितों को उचित मुआवजा दिया जाए।

प्रशासनिक कार्रवाई: गिरफ्तारी और निलंबन पर प्रतिक्रिया

​भले ही पुलिस ने हीरालाल राय और जम्बू बैठा जैसे एक दर्जन लोगों को गिरफ्तार किया है और एक चौकीदार को निलंबित कर दिया है, लेकिन मनोज भारती ने इसे ‘खानापूर्ति’ करार दिया। उन्होंने कहा कि केवल एक छोटे कर्मचारी या चौकीदार को सस्पेंड करने से सिस्टम नहीं सुधरेगा। असली ज़िम्मेदारी उन बड़े अधिकारियों और सफेदपोश चेहरों की है जो इस अवैध धंधे को संरक्षण देते हैं।

​उन्होंने पूछा कि क्या इन गिरफ्तारियों के बाद ज़हरीली शराब की भट्टियां बंद हो जाएंगी? उनका मानना है कि जब तक सप्लाई चेन के मुख्य सरगना सलाखों के पीछे नहीं जाते, तब तक ऐसी मौतें होती रहेंगी। पुलिस की वर्तमान कार्रवाई को उन्होंने केवल जनता के आक्रोश को शांत करने का एक अस्थायी तरीका बताया।

क्या कानून हटाना ही समाधान है?

​निष्पक्ष रूप से देखा जाए तो मनोज भारती और जन सुराज का हमला सरकार की दुखती रग पर है। लेकिन यह भी एक बड़ा सवाल है कि क्या शराबबंदी कानून को पूरी तरह हटा देने से ज़हरीली शराब की घटनाएं रुक जाएंगी?

  • एक पक्ष का तर्क: कानून हटने से सरकारी नियंत्रण वाली शुद्ध शराब उपलब्ध होगी, जिससे ज़हरीली शराब का बाज़ार खत्म हो जाएगा।
  • दूसरा पक्ष: शराबबंदी के सामाजिक लाभों (घरेलू हिंसा में कमी) को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। चुनौती कानून में नहीं, उसके क्रियान्वयन (Implementation) में है।

​मनोज भारती ने जिस तरह से 2023 की 44 मौतों का हवाला दिया, वह यह तो साबित करता है कि मौजूदा तरीका काम नहीं कर रहा है। सरकार को अब ‘ईगो’ (अहंकार) छोड़कर इस पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है।

सुशासन का संकट और इंसाफ की पुकार

​मोतिहारी के रघुनाथपुर और शंकर सरैया की गलियों से उठी ये चीखें अब पटना के गलियारों तक पहुँच चुकी हैं। मनोज भारती के दौरे ने इस मामले को एक ‘पॉलिटिकल माइलेज’ से ऊपर उठाकर ‘सिस्टम की नाकामी’ के रूप में स्थापित कर दिया है। 5 मौतों ने बिहार के सुशासन पर जो दाग लगाया है, उसे धोना अब सरकार के लिए आसान नहीं होगा।

द वॉयस ऑफ बिहार की टीम इस पूरी घटना और उस पर हो रही राजनीति पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए है। जन सुराज की मांग और सरकार की कार्रवाई के बीच पिसता हुआ वह आम आदमी है, जो व्यवस्था की कमियों के कारण आज या तो श्मशान में है या फिर अस्पताल के अंधेरे वार्ड में। मनोज भारती ने जो सवाल उठाए हैं, उनके जवाब मोतिहारी की जनता अब वोट और विरोध के जरिए तलाशने की कोशिश करेगी।

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