10 अप्रैल को राज्यसभा सदस्य की शपथ लेंगे नीतीश कुमार, बिहार की सियासत में हलचल तेज

बिहार की राजनीति में एक बार फिर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। मुख्यमंत्री आगामी 10 अप्रैल 2026 को राज्यसभा सदस्य के रूप में पद और गोपनीयता की शपथ लेने जा रहे हैं। इस खबर के सामने आते ही राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है और संभावित सियासी बदलावों को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं।

संसदीय सफर का नया अध्याय

गौरतलब है कि नीतीश कुमार 16 मार्च को निर्विरोध राज्यसभा के लिए चुने गए थे। इसके बाद उन्होंने 30 मार्च को बिहार विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था, जिससे उनके राज्यसभा जाने का रास्ता साफ हो गया। 10 अप्रैल को शपथ लेने के साथ ही उनका कार्यकाल औपचारिक रूप से शुरू हो जाएगा।

नीतीश कुमार का यह कदम उनके लंबे राजनीतिक करियर में एक और महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। राज्यसभा की सदस्यता ग्रहण करते ही वे उन चुनिंदा नेताओं की सूची में शामिल हो जाएंगे, जिन्होंने देश के चारों प्रमुख सदनों—विधानसभा, विधान परिषद, लोकसभा और राज्यसभा—में सदस्य के रूप में अपनी भूमिका निभाई है। इससे पहले बिहार में , और दिवंगत इस उपलब्धि को हासिल कर चुके हैं।

मुख्यमंत्री पद को लेकर बढ़ी अटकलें

नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के साथ ही सबसे बड़ा सवाल उनके मुख्यमंत्री पद को लेकर उठ खड़ा हुआ है। फिलहाल वे न तो विधानसभा और न ही विधान परिषद के सदस्य हैं। ऐसे में उनकी संवैधानिक स्थिति को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

भारतीय संविधान के प्रावधानों के अनुसार, कोई भी व्यक्ति बिना किसी सदन का सदस्य बने अधिकतम 6 महीने तक मुख्यमंत्री या मंत्री पद पर बना रह सकता है। इस अवधि के भीतर उन्हें किसी एक सदन की सदस्यता लेनी होती है, अन्यथा पद छोड़ना पड़ता है।

क्या होगा अगला कदम?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार के सामने दो विकल्प हैं—या तो वे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर नई राजनीतिक रणनीति अपनाएं, या फिर छह महीने की संवैधानिक अवधि का उपयोग करते हुए पद पर बने रहें और बाद में किसी सदन के सदस्य बन जाएं।

हालांकि, अब तक मुख्यमंत्री कार्यालय या जदयू की ओर से इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। लेकिन 10 अप्रैल को होने वाले शपथ ग्रहण समारोह के बाद स्थिति और स्पष्ट होने की उम्मीद जताई जा रही है।

बदल सकते हैं सियासी समीकरण

नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना केवल एक संसदीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत भी माना जा रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस कदम का असर राज्य की सत्ता और विपक्ष दोनों पर किस तरह पड़ता है।

फिलहाल, बिहार की राजनीति 10 अप्रैल पर टिकी हुई है, जहां से आगे की सियासी दिशा तय होने के संकेत मिल सकते हैं।

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