
राजगीर/नालंदा (द वॉयस ऑफ बिहार)।बिहार की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक भूमि राजगीर में मंगलवार का दिन सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया। अवसर था नालंदा अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय का दूसरा दीक्षांत समारोह, जहां ज्ञान की प्राचीन रश्मियों और आधुनिक मेधा का अद्भुत संगम देखने को मिला। भारत की राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु ने इस गरिमामयी समारोह को संबोधित करते हुए नालंदा के वैभव को वैश्विक फलक पर पुनर्जीवित करने का आह्वान किया। उनके शब्दों में केवल एक विश्वविद्यालय की प्रशंसा नहीं थी, बल्कि यह भारत की उस प्राचीन बौद्धिक विरासत के पुनर्जागरण की घोषणा थी, जिसने कभी पूरी दुनिया को राह दिखाई थी। मुर्मु ने स्पष्ट किया कि नालंदा आज केवल ईंट-पत्थरों से बनी एक इमारत या डिग्री बांटने वाला संस्थान नहीं है, बल्कि यह पूरी मानवता के लिए ज्ञान, स्वस्थ संवाद और सहअस्तित्व का एक जीवंत प्रतीक बन चुका है।
ज्ञान के सूर्य का उदय: प्राचीन परंपरा का आधुनिक अवतार
राष्ट्रपति मुर्मु ने अपने संबोधन की शुरुआत नालंदा की ऐतिहासिकता को नमन करते हुए की। उन्होंने कहा कि नालंदा अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ ही इस क्षेत्र में ज्ञान का सूर्य एक बार फिर उग चुका है। सदियों पहले जब नालंदा के प्राचीन पुस्तकालयों की लपटें शांत हुई थीं, तब दुनिया ने ज्ञान के एक बड़े केंद्र को खो दिया था। लेकिन आज, यह नया परिसर उसी प्राचीन बौद्धिक परंपरा के पुनर्जन्म का एक सशक्त उदाहरण पेश कर रहा है। राष्ट्रपति के अनुसार, अब समय आ गया है कि इस ज्ञान की रोशनी को केवल भारत तक सीमित न रखकर वैश्विक स्तर पर फैलाया जाए। उन्होंने विश्वास जताया कि जिस तरह प्राचीन नालंदा ने दुनिया भर के जिज्ञासुओं को अपनी ओर खींचा था, उसी तरह यह आधुनिक विश्वविद्यालय भी एशिया ही नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व का अग्रणी शिक्षण संस्थान बनकर उभरेगा।
30 देशों के छात्र: एक लघु विश्व का जीवंत स्वरूप
इस वर्ष के दीक्षांत समारोह की सबसे बड़ी विशेषता इसका अंतरराष्ट्रीय स्वरूप रहा। राष्ट्रपति ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि इस वर्ष स्नातक करने वाले छात्रों में 30 से अधिक देशों के विद्यार्थी शामिल हैं। यह आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि यह नालंदा की उस वैश्विक पहचान और आकर्षण का प्रमाण है जो धीरे-धीरे पूरी दुनिया में अपनी जड़ें जमा रहा है। मुर्मु ने कहा कि जब अलग-अलग संस्कृतियों, भाषाओं और विचारधाराओं के छात्र एक ही परिसर में बैठकर ज्ञानार्जन करते हैं, तो वहां सहअस्तित्व की भावना स्वतः ही विकसित हो जाती है। यह विविधता ही नालंदा को अन्य विश्वविद्यालयों से अलग बनाती है और इसे ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के भारतीय दर्शन का एक वैश्विक मंच प्रदान करती है। विभिन्न देशों के छात्रों की उपस्थिति यह सिद्ध करती है कि दुनिया आज भी भारत की ओर ज्ञान और शांति की तलाश में देख रही है।
बौद्ध अध्ययन का वैश्विक हब: सांस्कृतिक विरासत की नई पहचान
प्राचीन काल में नालंदा का मुख्य आकर्षण उसका बौद्ध अध्ययन केंद्र होना था। चीन, तिब्बत, कोरिया और दक्षिण-पूर्व एशिया से विद्वान यहां केवल दर्शन पढ़ने नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सीखने आते थे। राष्ट्रपति मुर्मु ने इस बात पर जोर दिया कि आज भी यह क्षेत्र पूरी दुनिया के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बना हुआ है। उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन और शैक्षणिक जगत से आग्रह किया कि वे बौद्ध अध्ययन की दिशा में और अधिक ठोस और मजबूत प्रयास करें। उन्होंने कहा कि बुद्ध का संदेश आज के युद्धग्रस्त और तनावपूर्ण विश्व में सबसे अधिक प्रासंगिक है। नालंदा विश्वविद्यालय को इस दिशा में एक वैश्विक नेतृत्वकर्ता की भूमिका निभानी चाहिए, ताकि भारत की सांस्कृतिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई और वैज्ञानिक पहचान मिल सके। यह संस्थान केवल इतिहास न पढ़ाए, बल्कि इतिहास से सीख लेकर भविष्य की चुनौतियों का समाधान भी प्रस्तुत करे।
नेट जीरो कैंपस: जलवायु परिवर्तन के खिलाफ नालंदा की पहल
दीक्षांत समारोह के दौरान राष्ट्रपति ने विश्वविद्यालय के पर्यावरण-अनुकूल दृष्टिकोण की जमकर सराहना की। नालंदा विश्वविद्यालय का नया परिसर ‘नेट जीरो’ (Net Zero) सिद्धांतों पर आधारित है, जो ऊर्जा संरक्षण और पर्यावरण संतुलन का एक उत्कृष्ट मॉडल है। मुर्मु ने कहा कि आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के गंभीर संकट से जूझ रही है, तब उच्च शिक्षण संस्थानों को केवल सिद्धांतों में नहीं, बल्कि व्यवहार में भी पर्यावरण संरक्षण का नेतृत्व करना होगा। उन्होंने नेट जीरो कैंपस को एक बड़ी उपलब्धि बताते हुए कहा कि यह आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाएगा कि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन कैसे बनाया जाता है। प्राचीन नालंदा भी प्रकृति की गोद में बसा था और आज का आधुनिक नालंदा भी उसी हरित परंपरा को आगे बढ़ा रहा है, जो प्रशंसनीय है।
छात्रों के लिए संदेश: आप केवल स्नातक नहीं, नालंदा के दूत हैं
दीक्षांत समारोह में डिग्री प्राप्त करने वाले छात्रों को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति का लहजा काफी प्रेरणादायक था। उन्होंने कहा कि आज जब ये छात्र इस परिसर से बाहर निकलेंगे, तो वे केवल एक डिग्री लेकर नहीं जाएंगे, बल्कि वे अपने साथ नालंदा की हजारों वर्षों की विरासत और उसके मूल्यों को लेकर जाएंगे। उन्होंने छात्रों से अपेक्षा की कि वे दुनिया के जिस भी कोने में जाएं, वहां नालंदा के ‘संवाद और सहअस्तित्व’ के संदेश को फैलाएं। मुर्मु ने कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल करियर बनाना नहीं, बल्कि समाज और मानवता के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझना है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि ये युवा पेशेवर दुनिया की जटिल समस्याओं का समाधान खोजने में अपनी मेधा का सदुपयोग करेंगे और भारत के गौरव को बढ़ाएंगे।
पुनर्जागरण का सशक्त उदाहरण: भारत की सॉफ्ट पावर का उदय
राष्ट्रपति मुर्मु का यह दौरा और उनका भाषण भारत की बढ़ती ‘सॉफ्ट पावर’ (Soft Power) की ओर भी इशारा करता है। नालंदा विश्वविद्यालय का पुनरुद्धार केवल एक शैक्षणिक प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि यह भारत की उस कूटनीतिक और सांस्कृतिक शक्ति का प्रदर्शन है जो पूर्व और पश्चिम के बीच एक सेतु का काम कर रही है। राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि भारत अपनी प्राचीन जड़ों की ओर लौट रहा है, लेकिन उसकी आंखें भविष्य की आधुनिकता पर टिकी हैं। यह विश्वविद्यालय एक ऐसा संगम स्थल है जहां परंपरा और तकनीक, दर्शन और विज्ञान, तथा राष्ट्रवाद और अंतरराष्ट्रीयवाद एक साथ मिलकर काम कर रहे हैं। मुर्मु के संबोधन ने यह स्पष्ट कर दिया कि सरकार की प्राथमिकता में नालंदा एक ऐसा केंद्र है जो आने वाले समय में विश्व गुरु के रूप में भारत की पहचान को और अधिक पुख्ता करेगा।
एक नई वैश्विक बौद्धिक क्रांति की आहट
नालंदा के दूसरे दीक्षांत समारोह ने यह संदेश दे दिया है कि बिहार की यह ऐतिहासिक भूमि एक बार फिर से दुनिया को राह दिखाने के लिए तैयार है। राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु के प्रेरक उद्बोधन ने छात्रों, शिक्षकों और प्रशासन के भीतर एक नई ऊर्जा का संचार किया है। ज्ञान का वह सूर्य, जिसका जिक्र राष्ट्रपति ने किया, अब अपनी पूरी चमक बिखेरने के लिए बेताब है। 30 देशों के विद्यार्थियों का यहां से दीक्षित होकर निकलना इस बात की पुष्टि है कि नालंदा का आकर्षण वैश्विक है और इसकी गूंज अब सात समंदर पार भी सुनाई देगी। आने वाले समय में नालंदा विश्वविद्यालय केवल एक शोध केंद्र नहीं, बल्कि विश्व शांति और बौद्धिक विकास का एक ऐसा प्रकाश स्तंभ बनेगा, जिसकी कल्पना हमारे पूर्वजों ने की थी।


