
पटना (द वॉयस ऑफ बिहार)।बिहार की राजनीति में मोकामा का नाम आते ही बाहुबल, संघर्ष और रसूख की तस्वीरें जेहन में उभरने लगती हैं। इसी कड़ी में एक बड़ी कानूनी खबर निकलकर सामने आई है, जिसने मोकामा के पूर्व विधायक अनंत सिंह के परिवार को बड़ी राहत दी है। पटना हाईकोर्ट ने बहुचर्चित दुलारचंद यादव हत्याकांड में आरोपी बनाए गए अनंत सिंह के दो भतीजों, राजवीर सिंह और कर्मवीर सिंह उर्फ कर्मवीर सिंह की अग्रिम जमानत अर्जी मंजूर कर ली है। न्यायमूर्ति प्रभात कुमार सिंह की एकलपीठ ने इस मामले की गहन सुनवाई के बाद दोनों आरोपियों को गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान की है। इस फैसले के बाद जहां विधायक के समर्थकों में खुशी की लहर है, वहीं क्षेत्र की राजनीति में एक बार फिर पुराने केसों की फाइलें चर्चा का विषय बन गई हैं।
न्यायालय का फैसला: राजवीर और कर्मवीर को मिली कानूनी सुरक्षा
पटना हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति प्रभात कुमार सिंह ने मंगलवार को इस मामले पर सुनवाई की। बचाव पक्ष की ओर से दी गई दलीलों और पुलिस डायरी के तथ्यों का अवलोकन करने के बाद न्यायालय ने पाया कि राजवीर सिंह और कर्मवीर सिंह को फिलहाल हिरासत में लेकर पूछताछ करने की अनिवार्य आवश्यकता नहीं है। न्यायालय ने दोनों भाइयों को अग्रिम जमानत देते हुए निर्देश दिया कि वे जांच में पूर्ण सहयोग करेंगे और जब भी आवश्यकता होगी, जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित होंगे। यह आदेश अनंत सिंह परिवार के लिए एक बड़ी संजीवनी माना जा रहा है, क्योंकि पिछले कुछ समय से परिवार के कई सदस्य विभिन्न कानूनी विवादों में घिरे हुए हैं।
दुलारचंद यादव हत्याकांड: वो वाकया जिसने हिला दिया था मोकामा
यह पूरा मामला दुलारचंद यादव की हत्या से जुड़ा है, जो मोकामा और आसपास के इलाकों में एक चर्चित नाम थे। इस हत्याकांड ने उस वक्त काफी तूल पकड़ा था जब प्राथमिकी में सीधे तौर पर अनंत सिंह के करीबियों और परिवार के सदस्यों के नाम आए थे। आरोपों के अनुसार, दुलारचंद यादव को एक सोची-समझी साजिश के तहत निशाना बनाया गया था। प्राथमिकी में यह उल्लेख किया गया था कि राजवीर सिंह और कर्मवीर सिंह ने दुलारचंद यादव को जबरन उनकी गाड़ी से नीचे खींचा था। इस खींचतान के बाद हुई हिंसक घटना में दुलारचंद की जान चली गई थी। पुलिस ने इस मामले में धारा 302 (हत्या) सहित अन्य गंभीर धाराओं के तहत केस दर्ज किया था, जिसके बाद से ही दोनों भतीजे गिरफ्तारी से बचने के लिए कानूनी रास्ते तलाश रहे थे।
बचाव पक्ष की दलीलें: राजनीतिक रंजिश का दिया गया हवाला
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकीलों ने मजबूती से अपना पक्ष रखा। उनकी मुख्य दलील यह थी कि राजवीर और कर्मवीर सिंह का नाम केवल राजनीतिक विद्वेष के कारण इस केस में घसीटा गया है। वकीलों ने तर्क दिया कि घटनास्थल पर उनकी उपस्थिति के कोई पुख्ता वैज्ञानिक साक्ष्य मौजूद नहीं हैं और केवल चश्मदीदों के विरोधाभासी बयानों के आधार पर उन्हें मुख्य आरोपी बनाना न्यायसंगत नहीं है। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि दोनों का कोई पुराना आपराधिक इतिहास इस तरह की वारदातों में नहीं रहा है और वे प्रतिष्ठित परिवार से संबंध रखते हैं, इसलिए उन्हें अग्रिम जमानत दी जानी चाहिए।
अभियोजन पक्ष का विरोध: “शक्ति का दुरुपयोग कर सकते हैं आरोपी”
दूसरी ओर, सरकारी वकील यानी अभियोजन पक्ष ने जमानत अर्जी का कड़ा विरोध किया। अभियोजन का कहना था कि चूंकि मामला सीधे तौर पर हत्या से जुड़ा है और आरोपी प्रभावशाली परिवार से आते हैं, इसलिए उनके बाहर रहने से गवाहों को डराया-धमकाया जा सकता है। उन्होंने दलील दी कि दुलारचंद यादव को गाड़ी से खींचने का कृत्य यह दर्शाता है कि आरोपियों की मंशा स्पष्ट थी। हालांकि, न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अंततः आरोपियों के पक्ष में फैसला सुनाया, जो पुलिस की अब तक की जांच पर भी सवालिया निशान खड़े करता है।
मोकामा की राजनीति और अनंत सिंह का प्रभाव
अनंत सिंह, जिन्हें क्षेत्र में ‘छोटे सरकार’ के नाम से जाना जाता है, उनकी राजनीति हमेशा से ही उतार-चढ़ाव भरी रही है। उनके भतीजों को मिली यह राहत केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसके गहरे राजनीतिक मायने भी हैं। मोकामा विधानसभा क्षेत्र में अनंत सिंह का परिवार दशकों से वर्चस्व रखता है। राजवीर और कर्मवीर सिंह उनके संगठन के जमीनी कार्यों को देखते रहे हैं। उनकी गिरफ्तारी की लटकती तलवार ने समर्थकों के बीच एक बेचैनी पैदा कर दी थी। अब जमानत मिलने के बाद, अनंत सिंह गुट एक बार फिर से अपनी खोई हुई जमीन को मजबूत करने की कोशिश करेगा।
क्या होता है अग्रिम जमानत का प्रभाव?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, अग्रिम जमानत (Anticipated Bail) मिलने का मतलब यह नहीं है कि आरोपी केस से बरी हो गए हैं। इसका अर्थ केवल इतना है कि पुलिस उन्हें इस मामले में गिरफ्तार कर जेल नहीं भेज सकती, बशर्ते वे कोर्ट द्वारा तय की गई शर्तों का पालन करें। अगर पुलिस को उनके खिलाफ चार्जशीट दाखिल करनी होगी, तो वह करेगी और ट्रायल कोर्ट में नियमित सुनवाई चलती रहेगी। राजवीर और कर्मवीर सिंह को अब निचली अदालत में जमानत बांड भरना होगा और भविष्य की हर तारीख पर हाजिर होना होगा। यदि वे किसी भी शर्त का उल्लंघन करते हैं, तो हाईकोर्ट उनकी जमानत रद्द भी कर सकता है।
दुलारचंद यादव के परिवार की प्रतिक्रिया और आगे की राह
इस फैसले के बाद दुलारचंद यादव के परिजनों में एक तरह की निराशा देखी जा रही है। उनके करीबियों का मानना है कि बाहुबल के प्रभाव के कारण न्याय की गति धीमी हो रही है। पीड़ित परिवार अब सुप्रीम कोर्ट जाने या उच्च स्तरीय जांच की मांग करने पर विचार कर रहा है। मोकामा में इस तरह के भूमिगत संघर्ष दशकों पुराने हैं, जहां एक गुट की जीत दूसरे के लिए चुनौती बन जाती है। दुलारचंद यादव हत्याकांड केवल एक मर्डर केस नहीं है, बल्कि यह मोकामा के दो गुटों के बीच सत्ता और वर्चस्व की लड़ाई का प्रतीक भी है।
प्रशासन और पुलिस के लिए चुनौती
पटना हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अब मोकामा पुलिस और जांच टीम पर दबाव बढ़ गया है। पुलिस को अब ऐसे पुख्ता सबूत पेश करने होंगे जो कोर्ट के सामने टिक सकें। यदि पुलिस समय रहते वैज्ञानिक साक्ष्य और विश्वसनीय गवाहों को पेश नहीं कर पाती है, तो ट्रायल के दौरान आरोपियों को बरी होने में आसानी हो सकती है। फिलहाल, राजवीर और कर्मवीर सिंह के लिए यह एक बड़ी जीत है, जिसने उन्हें सलाखों के पीछे जाने से बचा लिया है।
मोकामा की गलियों में आज इस बात की चर्चा है कि ‘सरकार’ का हाथ एक बार फिर अपने परिवार की ढाल बन गया है। अब देखना यह है कि आने वाले दिनों में इस हत्याकांड की जांच क्या नया मोड़ लेती है और क्या दुलारचंद यादव के परिवार को कभी वह इंसाफ मिल पाएगा जिसकी वे पिछले कई महीनों से उम्मीद लगाए बैठे हैं। द वॉयस ऑफ बिहार की टीम इस मामले के हर कानूनी पड़ाव पर नजर बनाए रखेगी।


