
पटना/किशगंज/सहरसा (द वॉयस ऑफ बिहार)।
बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अब केवल कागजों तक सीमित नहीं रही, बल्कि आर्थिक अपराध इकाई (EOU) की ताबड़तोड़ कार्रवाई ने इसे जमीन पर उतार दिया है। मंगलवार का दिन बिहार के प्रशासनिक और पुलिस महकमे के लिए किसी ‘ब्लैक ट्यूजडे’ से कम नहीं रहा। ईओयू की विशेष टीमों ने एक साथ दो बड़े अधिकारियों—किशनगंज के अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी (SDPO) गौतम कुमार और सहरसा के जिला ग्रामीण विकास अभिकरण (DRDA) के निदेशक वैभव कुमार के ठिकानों पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की। इस छापेमारी में जो सच बाहर आया है, उसने न केवल आम जनता को बल्कि जांच एजेंसियों को भी हक्का-बक्का कर दिया है। रक्षक ही भक्षक बनकर किस तरह सरकारी पद की आड़ में काली कमाई का पहाड़ खड़ा कर रहे थे, इसकी परतें अब एक-एक कर खुलने लगी हैं।
एसडीपीओ गौतम कुमार: वर्दी के पीछे छिपा ‘जमीन का जमींदार’
किशनगंज में तैनात एसडीपीओ गौतम कुमार के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज होने के बाद जब ईओयू की टीम उनके ठिकानों पर पहुंची, तो वहां किसी पुलिस अधिकारी का घर नहीं बल्कि किसी राजा-महाराजा की रियासत जैसा नजारा था। जांच में यह सनसनीखेज खुलासा हुआ कि गौतम कुमार और उनका परिवार अकेले 29 भूखंडों (प्लॉट्स) का मालिक है। एक पुलिस अधिकारी की सीमित आय में इतने कम समय में इतनी बड़ी संख्या में जमीनें खरीदना किसी करिश्मे से कम नहीं है। ये जमीनें केवल बिहार तक सीमित नहीं हैं; गौतम कुमार ने अपने निवेश के पंख सिलीगुड़ी के चाय बागानों से लेकर दिल्ली से सटे नोएडा और गुड़गांव के पॉश इलाकों तक फैला रखे हैं।
पूर्णिया में गौतम कुमार का जो आलीशान आशियाना मिला है, उसकी भव्यता देखकर अधिकारी भी दंग रह गए। करीब 2.5 करोड़ रुपये की लागत से बने इस मकान में विलासिता के तमाम साधन मौजूद हैं। तलाशी के दौरान घर से एक दर्जन अत्यंत कीमती और ब्रांडेड घड़ियां बरामद हुई हैं, जो उनकी शौकीन मिजाजी और अकूत संपत्ति की गवाही दे रही हैं। गैरेज में क्रेटा और थार जैसे महंगे वाहन खड़े मिले, जो उनकी ज्ञात आय के स्रोतों से पूरी तरह मेल नहीं खाते। उनके सरकारी आवास से भी 1.37 लाख रुपये नकद और निवेश के भारी भरकम दस्तावेज मिले हैं, जिनकी स्क्रूटनी जारी है।
माफियाओं के साथ ‘मधुर’ संबंध और काली कमाई का ‘सिंडिकेट’
गौतम कुमार की जांच में सबसे गंभीर मोड़ तब आया जब उनके मोबाइल और अन्य दस्तावेजों से उनके आपराधिक सांठगांठ का पता चला। ईओयू की जांच में यह तथ्य सामने आया है कि एसडीपीओ के संबंध कोयला माफिया, शराब तस्कर, एंट्री माफिया, लॉटरी सिंडिकेट और सुपारी तस्करों के साथ बेहद ‘मधुर’ थे। कानून की रक्षा करने की जिम्मेदारी जिनके कंधों पर थी, वे उन्हीं अपराधियों के साथ मिलकर समानांतर अर्थव्यवस्था चला रहे थे। यह संबंध केवल जान-पहचान तक सीमित नहीं थे, बल्कि जांच एजेंसियां इसे एक संगठित भ्रष्टाचार के मॉडल के रूप में देख रही हैं, जहां पुलिसिया संरक्षण के बदले माफियाओं से मोटी रकम वसूल की जाती थी।
महिला मित्र शगुफ्ता शमीम: बेनामी संपत्ति का ‘सेफ हाउस’
छापेमारी का एक बड़ा हिस्सा गौतम कुमार की महिला मित्र शगुफ्ता शमीम के घर पर भी केंद्रित रहा। अक्सर भ्रष्ट अधिकारी अपनी काली कमाई को अपने करीबियों के नाम पर निवेश करते हैं, और यहां भी वही कहानी दोहराई गई। शगुफ्ता के घर की तलाशी में 7 कीमती भूखंडों के कागजात और करीब 60 लाख रुपये के सोने-चांदी के जेवर मिले हैं। ईओयू को संदेह है कि शगुफ्ता के नाम पर की गई ये संपत्तियां असल में गौतम कुमार द्वारा ही खरीदी गई थीं। यह महिला मित्र का घर भ्रष्टाचार की कमाई को छिपाने के लिए एक ‘सेफ हाउस’ की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था।
डीआरडीए निदेशक वैभव कुमार: विकास के पैसे से बनाया अपना ‘आईटीआई साम्राज्य’
दूसरी ओर, सहरसा के डीआरडीए निदेशक वैभव कुमार की कहानी भी कुछ कम दिलचस्प नहीं है। जिस विभाग का काम ग्रामीण विकास और गरीबों को रोजगार मुहैया कराना है, उसके निदेशक ने खुद के और अपने परिवार के विकास में कोई कसर नहीं छोड़ी। 2016 से अब तक वैभव कुमार ने कुल 16 कीमती भूखंड खरीदे हैं। ये जमीनें मुजफ्फरपुर और पटना के प्राइम लोकेशन पर हैं और इन्हें बड़ी चालाकी से खुद के अलावा पत्नी, पुत्र और पिता के नाम पर रजिस्टर कराया गया है।
वैभव कुमार ने मुजफ्फरपुर में एक निजी आईटीआई (ITI) प्रशिक्षण केंद्र भी खोला है। इसे बनाने में करीब 1.5 करोड़ रुपये का निवेश किया गया है। सरकारी सेवा में रहते हुए इतना बड़ा निजी संस्थान खड़ा करना अपने आप में पद के दुरुपयोग का बड़ा उदाहरण है। उन्होंने अपने पिता के नाम पर एक ‘चैरिटेबल ट्रस्ट’ भी बनाया है, जिसके नाम पर एक बीघा जमीन लीज पर ली गई है। अक्सर ट्रस्ट का इस्तेमाल टैक्स बचाने और अवैध संपत्तियों को ठिकाने लगाने के लिए किया जाता है, और जांच टीम इसी बिंदु पर काम कर रही है। उनके पास टाटा नेक्सॉन सहित दो महंगी कारें मिली हैं और बैंक खातों में 20 लाख रुपये जमा होने का पता चला है। स्टेट बैंक के एक लॉकर को भी फ्रीज कराया गया है, जिसमें और भी राज छिपे होने की संभावना है।
प्रशासनिक शुचिता पर प्रहार और ईओयू का कड़ा संदेश
ये दोनों छापे यह दर्शाते हैं कि बिहार में भ्रष्टाचार किस कदर जड़ों तक पहुंच चुका है। जब एक एसडीपीओ स्तर का अधिकारी तस्करों का साथी बन जाए और विकास का जिम्मा संभालने वाला निदेशक खुद का साम्राज्य खड़ा करने लगे, तो आम जनता का सिस्टम पर से भरोसा उठने लगता है। ईओयू की यह कार्रवाई उन सभी अधिकारियों के लिए एक खुली चेतावनी है जो यह समझते हैं कि वे अपनी ‘सेटिंग’ और रसूख के दम पर बच निकलेंगे।
इन छापों के बाद बिहार के प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा हुआ है। कई और अधिकारी अब जांच के रडार पर हैं। ईओयू के अधिकारियों का कहना है कि यह केवल शुरुआत है; इन दोनों अधिकारियों के बैंक ट्रांजेक्शन और कॉल रिकॉर्ड्स खंगालने पर कई और रसूखदार सफेदपोशों के नाम सामने आ सकते हैं। फिलहाल, जब्त किए गए दस्तावेजों की फॉरेंसिक जांच की जा रही है और बहुत जल्द इन अधिकारियों की गिरफ्तारी और उनकी अवैध संपत्तियों को कुर्क करने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। बिहार की जनता अब इन ‘सफेदपोश लुटेरों’ के खिलाफ और भी सख्त कार्रवाई की उम्मीद कर रही है।


