न्यू ट्रेंड: मिट्टी की जांच के बाद ही उर्वरक का इस्तेमाल, बिहार में खेती का बदलता स्वरूप

पटना, 27 मार्च। बिहार में कृषि अब पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर आधुनिक तकनीकों की ओर तेजी से कदम बढ़ा रही है। बदलते समय के साथ किसान भी जागरूक हो रहे हैं और अब वे बिना जानकारी के उर्वरकों का उपयोग करने के बजाय वैज्ञानिक तरीके अपना रहे हैं। इसी बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण है—मिट्टी की जांच के बाद ही खेतों में रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल।

राज्य के सभी 38 जिलों में बड़े पैमाने पर मिट्टी की जांच की जा रही है, जिससे किसानों को यह स्पष्ट जानकारी मिल रही है कि उनके खेत की मिट्टी में कौन-कौन से पोषक तत्व मौजूद हैं और किनकी कमी है। इस जानकारी के आधार पर किसान अब संतुलित मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग कर रहे हैं। इससे न केवल फसल उत्पादन में वृद्धि हो रही है, बल्कि अनावश्यक खर्च में कमी आने से किसानों की आय भी बढ़ रही है।

वित्तीय वर्ष 2025-26 में राज्य भर में लगभग 3 लाख मिट्टी नमूनों की जांच की गई है। प्रयोगशालाओं में इन नमूनों का वैज्ञानिक विश्लेषण कर किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड उपलब्ध कराया जाता है। इस कार्ड में मिट्टी की गुणवत्ता, पोषक तत्वों की मात्रा और विभिन्न फसलों—जैसे धान, गेहूं, मक्का, दलहन और तिलहन—के लिए उर्वरकों की सटीक अनुशंसा दर्ज होती है। किसानों को यह कार्ड हर तीन वर्ष के अंतराल पर दिया जाता है, ताकि वे समय-समय पर अपनी मिट्टी की स्थिति को समझ सकें।

इस पहल का असर अब साफ तौर पर दिखने लगा है। जहां पहले किसान अनुमान के आधार पर उर्वरकों का उपयोग करते थे, वहीं अब वे जरूरत के अनुसार सीमित और संतुलित मात्रा में उर्वरक डाल रहे हैं। इससे भूमि की उर्वरता भी बनी रह रही है और पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।

सरकार ने मिट्टी जांच की सुविधा को और अधिक सुलभ बनाने के लिए स्थानीय स्तर पर व्यापक व्यवस्था की है। अब किसान अपने मृदा स्वास्थ्य कार्ड को WhatsApp और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से भी प्राप्त कर सकते हैं। डिजिटल सॉयल हेल्थ कार्ड में लगभग 100 से अधिक फसलों के लिए विस्तृत सुझाव उपलब्ध होते हैं, जिससे किसानों को फसल चयन और पोषण प्रबंधन में मदद मिलती है।

राज्य में इस समय 38 जिला स्तरीय मिट्टी जांच प्रयोगशालाएं, 14 अनुमंडल स्तरीय लैब और 9 चलंत (मोबाइल) प्रयोगशालाएं कार्यरत हैं। इसके अलावा, अनुमंडल स्तर पर 32 नई प्रयोगशालाएं स्थापित की जा रही हैं, जिससे गांव-गांव तक यह सुविधा पहुंचाई जा सके। मिट्टी जांच की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने के लिए 3 रेफरल प्रयोगशालाएं भी संचालित हो रही हैं, जो परीक्षण की सटीकता पर निगरानी रखती हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल बिहार में कृषि के क्षेत्र में एक “मौन क्रांति” साबित हो रही है। वैज्ञानिक खेती को अपनाने से जहां उत्पादन में बढ़ोतरी हो रही है, वहीं किसानों की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो रही है। आने वाले समय में यह मॉडल राज्य को कृषि के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है।

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