HIGHLIGHTS: कोर्ट रूम में ‘कानून’ नहीं, सीलिंग फैन टूटा
- बड़ा हादसा: सोमवार को भरी अदालत में अचानक उखड़कर गिरा चलता हुआ पंखा।
- जज घायल: एडिशनल सेशन जज की सीट पर गिरा पंखा; सिर और कंधे पर आईं गंभीर चोटें।
- बाल-बाल बची जान: प्राथमिक उपचार के बाद जज की हालत खतरे से बाहर, कोर्ट परिसर में दहशत।
- आक्रोश: वकीलों ने जर्जर बिल्डिंग और पुरानी वायरिंग को लेकर खोला मोर्चा; नई बिल्डिंग की मांग तेज।
इंदौर | 18 मार्च, 2026
मध्य प्रदेश की व्यावसायिक राजधानी इंदौर की जिला अदालत सोमवार को उस वक्त ‘रणक्षेत्र’ जैसी चीख-पुकार से गूंज उठी, जब न्याय की कुर्सी पर ही खतरा मंडरा गया। एक महिला एडिशनल सेशन जज जब अपनी कुर्सी पर बैठकर मामलों की सुनवाई कर रही थीं, तभी मौत बनकर एक भारी-भरकम सीलिंग फैन सीधे उनके ऊपर आ गिरा। यह हादसा महज एक तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि सिस्टम की जर्जर हालत का जीता-जागत सबूत है।
हादसे का ‘फाइल’ रिकॉर्ड: एक नजर में
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विवरण |
जानकारी |
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घटनास्थल |
जिला अदालत, इंदौर (कोर्ट रूम)। |
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पीड़ित |
महिला एडिशनल सेशन जज। |
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चोटें |
सिर और कंधे पर प्रहार (हालत स्थिर)। |
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वकीलों का पक्ष |
एलएल यादव (अध्यक्ष, अभिभाषक संघ) और विनोद द्विवेदी। |
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मुख्य शिकायत |
पुरानी वायरिंग, लीकेज और जर्जर ढांचा। |
“मरम्मत के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति” — वकीलों का गुस्सा
हादसे के बाद कोर्ट परिसर में वकीलों और कर्मचारियों का हुजूम उमड़ पड़ा। वकीलों ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा:
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- पुराना ढांचा: बिल्डिंग की छतों में लीकेज है और वायरिंग दशकों पुरानी हो चुकी है।
- नई बिल्डिंग में देरी: आरोप है कि संबंधित विभाग जानबूझकर नई कोर्ट बिल्डिंग के निर्माण में देरी कर रहा है।
- सुरक्षा पर सवाल: वकीलों ने चेतावनी दी है कि आज जज घायल हुई हैं, कल किसी वकील या पक्षकार की जान भी जा सकती है।
”मरम्मत के नाम पर केवल खानापूर्ति की जाती है। जब तक कोई बड़ा हादसा न हो जाए, प्रशासन नहीं जागता। यह सीधे तौर पर जान से खिलवाड़ है।”
— एलएल यादव, अध्यक्ष, जिला कोर्ट अभिभाषक संघ
VOB का नजरिया: जहाँ ‘न्याय’ सुरक्षित नहीं, वहाँ जनता का क्या होगा?
इंदौर कोर्ट की यह घटना केवल एक पंखा गिरने की खबर नहीं है, बल्कि देश के अदालती बुनियादी ढांचे (Infrastructure) की बदहाली का विज्ञापन है। जिस कुर्सी से समाज को सुरक्षा और न्याय की उम्मीद होती है, अगर वही कुर्सी जर्जर छत के नीचे असुरक्षित है, तो यह सिस्टम के लिए शर्म की बात है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ का मानना है कि ‘स्मार्ट सिटी’ के दावों के बीच ऐसी जर्जर इमारतें प्रशासन की पोल खोलती हैं। क्या अब जज साहिबा को हेलमेट पहनकर सुनवाई करनी होगी? नई बिल्डिंग का काम केवल कागजों पर नहीं, जमीन पर दिखना चाहिए।


