
HIGHLIGHTS
- बड़ा बदलाव: ‘जल-जीवन-हरियाली’ अभियान के तहत राज्य भर में 26,383 तालाबों और पोखरों का हुआ जीर्णोद्धार।
- ग्राउंड वाटर में सुधार: सूखते जलस्रोतों में लौटी मुस्कान; पशु-पक्षियों और किसानों के लिए बने ‘संजीवनी’।
- औरंगाबाद टॉप पर: अकेले औरंगाबाद जिले में 1,675 नई जल संचयन संरचनाओं का हुआ निर्माण।
- सीधा फायदा: सिंचाई की समस्या खत्म और पेयजल संकट से मिली बड़ी राहत।
पटना | 14 मार्च, 2026
बिहार में दम तोड़ते पारंपरिक जलस्रोतों के लिए ‘जल-जीवन-हरियाली’ अभियान एक नई जिंदगी लेकर आया है। साल 2019 से शुरू हुई इस मुहिम ने राज्य के गांवों में उपेक्षित पड़े तालाबों, पोखरों, आहर और पइन की तस्वीर बदल दी है। सात वर्षों के इस लंबे सफर में अब तक 26 हजार से अधिक जलस्रोतों को पुनर्जीवित किया जा चुका है, जिसका सीधा असर अब ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी पर दिखने लगा है।
7 साल का ‘रिपोर्ट कार्ड’: कब, कितने तालाब चमके?
ग्रामीण विकास विभाग के आंकड़े बताते हैं कि यह अभियान साल-दर-साल नई ऊंचाइयों को छू रहा है।
- शुरुआती रफ्तार: 2019-20 में रिकॉर्ड 7,137 तालाबों का जीर्णोद्धार हुआ।
- निरंतरता: इसके बाद हर साल औसतन 2,500 से 4,500 जलस्रोतों पर काम किया गया।
- ताजा आंकड़ा: मौजूदा वित्तीय वर्ष 2025-26 में अब तक 1,612 नए तालाबों का निर्माण और जीर्णोद्धार पूरा किया जा चुका है।
औरंगाबाद की सफलता: 1,675 संरचनाओं से बदली जिले की तासीर
अभियान के तहत औरंगाबाद जिले ने विशेष उपलब्धि हासिल की है। जिले में कुल 1,675 जल संचयन संरचनाएं तैयार की गई हैं। विभाग का मानना है कि इससे न केवल भूजल स्तर (Groundwater Level) में वृद्धि हुई है, बल्कि अवैध रूप से अतिक्रमित जलस्रोतों को भू-माफियाओं के चंगुल से भी मुक्त कराया गया है।
ग्राउंड रिपोर्ट: पतेया गांव में चापाकल फिर उगलने लगे पानी
औरंगाबाद के पतेया गांव के निवासी उदय प्रसाद और पंकज कुमार इस बदलाव के चश्मदीद गवाह हैं। वे बताते हैं कि दशकों पुराना गांव का पोखर पूरी तरह सूख चुका था, जिससे सिंचाई तो दूर, चापाकल और ट्यूबवेल भी फेल हो गए थे। अब पोखर की उड़ाही के बाद गांव के डेढ़ हजार से अधिक लोगों को लाभ मिल रहा है। गांव में जलस्तर सुधरा है और गर्मी के दिनों में पशु-पक्षियों के लिए पानी की किल्लत खत्म हो गई है।
ग्रामीण विकास मंत्री का संकल्प: “जलवायु परिवर्तन का एकमात्र तोड़”
ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार ने कहा कि जल-जीवन-हरियाली अभियान जलवायु परिवर्तन की वैश्विक समस्या से निपटने का हमारा स्वदेशी मॉडल है। गांवों में तालाबों के निर्माण से न केवल सिंचाई के विकल्प बढ़े हैं, बल्कि पारंपरिक जलस्रोतों के संरक्षण का मार्ग भी प्रशस्त हुआ है। यह अभियान गांवों में खुशहाली लाने की गारंटी है।
VOB का नजरिया
’जल-जीवन-हरियाली’ महज एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि बिहार के भविष्य की सुरक्षा का बीमा है। 26 हजार से अधिक तालाबों का जीर्णोद्धार एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन चुनौती अब इनके ‘रखरखाव’ की है। अक्सर देखा जाता है कि सरकारी पैसे से तालाब की खुदाई तो हो जाती है, लेकिन रखरखाव के अभाव में वे फिर से कचरे का ढेर बन जाते हैं। सरकार को इन तालाबों के किनारे फलदार वृक्ष लगाने और ‘मछली पालन’ को बढ़ावा देने पर जोर देना चाहिए ताकि स्थानीय ग्रामीण ही इसके रक्षक बनें। औरंगाबाद मॉडल को पूरे बिहार के हर प्रखंड में लागू करने की जरूरत है।


