मुंगेर | 10 मार्च, 2026 : रिश्तों को कलंकित और ममता की मर्यादा को तार-तार कर देने वाले एक जघन्य मामले में मुंगेर की अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अपनी ही दो मासूम बेटियों का यौन शोषण करने वाले एक कलयुगी पिता को विशेष न्यायाधीश (पोक्सो एक्ट) प्रदीप कुमार चौधरी की अदालत ने मरते दम तक सलाखों के पीछे रहने की सजा सुनाई है। यह फैसला उन दरिंदों के लिए कड़ा संदेश है जो घर की चारदीवारी के भीतर मासूमियत का गला घोंटते हैं।
[वारदात का सच] – जब माँ ने ही उतारा पति के चेहरे से ‘नकाब’
यह मामला साल 2022 का है, जिसने तब पूरे जमालपुर क्षेत्र को हिलाकर रख दिया था।
- साहसी माँ की पहल: जब एक माँ को अपने ही पति की काली करतूतों का पता चला, तो उसने ममता का फर्ज निभाते हुए पति के खिलाफ जमालपुर थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई।
- होटल में ‘रंगे हाथ’ गिरफ्तारी: पुलिस ने माँ की शिकायत पर त्वरित कार्रवाई की और आरोपी पिता को जमालपुर के ही एक होटल से आपत्तिजनक स्थिति में रंगे हाथों गिरफ्तार किया था।
- क्रूर तरीका: जांच में यह दिल दहला देने वाला खुलासा हुआ कि वह पिता होटल में कमरे बुक करता था और अपनी ही दो नाबालिग बेटियों को वहां ले जाकर उनके साथ दुष्कर्म करता था।
[अदालती कार्यवाही] – 11 गवाहों ने साबित किया गुनाह
विशेष लोक अभियोजक (पोक्सो) प्रीतम कुमार वैश्य ने अदालत में इस केस को मजबूती से रखा।
- पुख्ता सबूत: पुलिस द्वारा दाखिल चार्जशीट और अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए 11 गवाहों की गवाही ने आरोपी के बचने के सारे रास्ते बंद कर दिए।
- सजा का ऐलान: 24 फरवरी 2026 को दोषी करार दिए जाने के बाद, सोमवार को अदालत ने सजा मुकर्रर की।
[सजा का ‘स्कोरकार्ड’] – उम्रकैद और जुर्माना
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धारा / एक्ट |
सजा का स्वरूप |
आर्थिक दंड (जुर्माना) |
जुर्माना न देने पर सजा |
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IPC एवं POCSO एक्ट |
आजीवन कारावास (Life Imprisonment) |
₹30,000 |
3 माह अतिरिक्त जेल |
[न्यायाधीश की टिप्पणी]
सजा सुनाते समय अदालत का रुख बेहद सख्त रहा। न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि पिता का पद सुरक्षा और विश्वास का होता है, लेकिन जब वही पद हैवानियत का जरिया बन जाए, तो कानून में रियायत की कोई गुंजाइश नहीं बचती। ऐसे अपराधियों का समाज से अलग रहना ही बेहतर है।
VOB का नजरिया: ‘माँ’ की बहादुरी को सलाम!
मुंगेर का यह मामला जितना शर्मनाक है, उतना ही उस माँ की हिम्मत की मिसाल भी है जिसने समाज के डर से ऊपर उठकर अपनी बेटियों के हक में आवाज उठाई। अक्सर ऐसे मामलों में ‘लोक-लाज’ के नाम पर जुल्म को दबा दिया जाता है, लेकिन इस महिला ने साबित कर दिया कि एक माँ अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए ‘काली’ भी बन सकती है। कोर्ट का यह फैसला उन बच्चियों के लिए इंसाफ है, जिनका बचपन उनके अपने पिता ने ही छीन लिया था।


