बिहार की राजनीति में पिछले करीब दो दशकों से मुख्यमंत्री Nitish Kumar के नेतृत्व में कुर्मी समुदाय का मजबूत प्रभाव देखा गया है। 2005 से लेकर अब तक राज्य की सत्ता पर नीतीश कुमार का दबदबा रहा है, जिसे कई राजनीतिक विश्लेषक “कुर्मी नेतृत्व का दौर” भी मानते हैं।
लेकिन हाल के राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या बिहार में फिर से यादव नेतृत्व का दौर लौट सकता है। यादव समुदाय से आने वाले नेता नित्यानंद राय को लेकर भी राजनीतिक हलकों में अटकलें लगाई जा रही हैं।
हालांकि नित्यानंद राय ने स्पष्ट किया कि उनका मुख्यमंत्री बनने का कोई व्यक्तिगत लक्ष्य नहीं है। उन्होंने कहा, “मेरा समर्पण प्रधानमंत्री Narendra Modi के विजन को पूरा करने में है और मैं अपने कर्तव्यों का पालन पूरी लगन से करूंगा।”
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, नित्यानंद राय की चर्चा केवल उनके व्यक्तित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि बिहार में भाजपा और सियासी समीकरणों का संकेत भी देती है। यादव समुदाय से होने के कारण वे राज्य के जातीय और राजनीतिक समीकरणों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
1990 से 2005 तक बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव और बाद में Rabri Devi के नेतृत्व में यादव समुदाय का बड़ा राजनीतिक प्रभाव रहा था।
अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या आने वाले चुनावों में सत्ता का समीकरण बदल सकता है और बिहार की राजनीति में फिर से यादव नेतृत्व की वापसी हो सकती है, या फिर नीतीश कुमार का राजनीतिक प्रभाव आगे भी कायम रहेगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण, गठबंधन और जनसमर्थन आने वाले समय में बड़ा रोल निभाएंगे, जिससे राज्य की सत्ता की दिशा तय होगी।


