पटना | 02 मार्च, 2026: बिहार की सियासत में भूचाल आ गया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जिस ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ यानी शराबबंदी कानून को अब तक केवल विपक्षी दल ही निशाने पर ले रहे थे, अब उस पर सत्ता पक्ष के भीतर से ही सबसे बड़ा प्रहार हुआ है। सीतामढ़ी के सांसद और जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के वरिष्ठ नेता देवेश चंद्र ठाकुर ने इस कानून को ‘अव्यावहारिक’ बताते हुए इसे तत्काल हटाने की मांग कर दी है। सांसद के इस बयान ने न केवल जेडीयू के भीतर की असहजता को उजागर किया है, बल्कि एनडीए गठबंधन में भी खलबली मचा दी है।
“नेक मंशा, पर धरातल पर फेल”: सांसद की दो टूक
एक निजी चैनल से बातचीत के दौरान सांसद देवेश चंद्र ठाकुर ने बिना लाग-लपेट के शराबबंदी की विफलता का कच्चा चिट्ठा खोल दिया। उनके तर्कों ने सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं:
- इतिहास की दलील: ठाकुर ने कहा कि दुनिया के इतिहास में आज तक कहीं भी शराबबंदी पूरी तरह सफल नहीं हुई है।
- तस्करी का जाल: उन्होंने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे पड़ोसी राज्यों से अवैध शराब की खेप बिहार पहुँच रही है, जिसे रोकना पूरी तरह नामुमकिन है।
- गरीबों पर मार: सांसद के अनुसार, मुख्यमंत्री नशाखोरी खत्म कर गरीबों का घर बचाना चाहते थे, लेकिन व्यवहार में यह संभव नहीं हो सका।
शपथ ग्रहण का ‘सीक्रेट’: “बिहार के बाहर पीने से परहेज नहीं”
सांसद ठाकुर ने उस समय के एक दिलचस्प वाकये का भी खुलासा किया जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सभी माननीय सदस्यों को शराब न पीने की शपथ दिलाई थी।
- दूरी बनाई: देवेश चंद्र ठाकुर ने बताया कि वे उस शपथ ग्रहण समारोह में शामिल नहीं हुए थे।
- नीतीश को जवाब: जब मुख्यमंत्री ने उनसे इस बारे में पूछा, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वे बिहार की सीमा के भीतर तो शराब नहीं पिएंगे, लेकिन राज्य से बाहर जाने पर उन्हें इससे कोई परहेज नहीं है। यह खुलासा बताता है कि जेडीयू के शीर्ष नेताओं के मन में इस कानून के प्रति कितनी ‘असहजता’ है।
एनडीए के ‘सुर में सुर’: मांझी से लेकर चिराग तक का दबाव
देवेश चंद्र ठाकुर अकेले नहीं हैं। एनडीए के अन्य घटक दल भी लगातार शराबबंदी की समीक्षा या उसे हटाने का दबाव बना रहे हैं:
- जीतनराम मांझी: वे वर्षों से कह रहे हैं कि यह कानून केवल गरीबों के उत्पीड़न का जरिया बन गया है।
- चिराग पासवान और माधव आनंद: दोनों नेताओं ने हाल ही में ‘होम डिलीवरी’ और ‘जहरीली शराब’ के सिंडिकेट का हवाला देते हुए समीक्षा की मांग की है।
- विनय बिहारी (भाजपा): भाजपा विधायक ने भी सार्वजनिक रूप से इस कानून पर पुनर्विचार की जरूरत बताई है।
इन नेताओं का सामूहिक तर्क है कि कानून ने पुलिस और तस्करों के बीच एक अवैध गठजोड़ पैदा कर दिया है, जिससे माफिया फल-फूल रहे हैं और सरकार का खजाना खाली हो रहा है।
आंकड़ों की जुबानी: 10 लाख केस और ₹40,000 करोड़ का नुकसान
2016 से अब तक बिहार में शराबबंदी का लेखा-जोखा राज्य की अर्थव्यवस्था और न्यायपालिका पर भारी बोझ की ओर इशारा करता है:
- गिरफ्तारी: 8 वर्षों में लगभग 16 लाख लोग गिरफ्तार किए गए हैं।
- मुकदमेबाजी: शराबबंदी के उल्लंघन के 10 लाख से अधिक मामले दर्ज हो चुके हैं, जिससे अदालतों में केस का अंबार लग गया है।
- राजस्व की हानि: एक अनुमान के मुताबिक, बिहार को हर साल ₹30,000 से ₹40,000 करोड़ के राजस्व का नुकसान हो रहा है।
- खतरनाक परिणाम: 4.50 करोड़ लीटर शराब की जब्ती के बावजूद तस्करी जारी है और जहरीली शराब से होने वाली मौतों का सिलसिला थम नहीं रहा है।
VOB का नजरिया: क्या ‘अड़ियल’ रुख छोड़ेंगे नीतीश?
जेडीयू सांसद देवेश चंद्र ठाकुर का यह बयान केवल एक व्यक्तिगत राय नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर दबी हुई उस नाराजगी की गूँज है जिसे अब तक अनुशासन के नाम पर दबाया गया था। जब घर के भीतर से ही “अव्यावहारिक” जैसे शब्द निकलें, तो समझ जाना चाहिए कि किले की दीवारें कमजोर हो रही हैं। अब गेंद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पाले में है—क्या वे अपने सहयोगियों और सांसदों की बात सुनकर कोई बीच का रास्ता निकालेंगे, या फिर अपनी इस ‘ड्रीम’ जिद पर कायम रहेंगे?
ब्यूरो रिपोर्ट, द वॉयस ऑफ बिहार (VOB)।


