पटना | 25 फरवरी, 2026: बिहार के ग्रामीण इलाकों में अब ‘सरकारी दफ्तर’ का मतलब सिर्फ ब्लॉक या जिला मुख्यालय नहीं रह गया है। राज्य के पैक्स (PACS) अब खेती-किसानी के साथ-साथ डिजिटल क्रांति के नए केंद्र बन गए हैं। सहकारिता विभाग की पहल पर शुरू किए गए कॉमन सर्विस सेंटरों (CSC) ने महज कुछ समय में ₹6 करोड़ से अधिक का कारोबार कर यह साबित कर दिया है कि गांवों में डिजिटल सेवाओं की जबरदस्त मांग है।
पैक्स बना ‘मिनी सचिवालय’: 300+ सेवाएं अब एक ही छत के नीचे
राज्य के 6,301 पैक्सों में अब वह सब कुछ संभव है, जिसके लिए पहले ग्रामीणों को शहर की दौड़ लगानी पड़ती थी। इन केंद्रों पर 300 से अधिक डिजिटल सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं, जिनमें प्रमुख हैं:
- बैंकिंग और बीमा: घर बैठे खाते की जानकारी और बीमा की सुविधा।
- यात्रा और टिकट: रेल, बस और हवाई जहाज की टिकट बुकिंग अब गांव के पैक्स सेंटर पर ही उपलब्ध है।
- सरकारी दस्तावेज: आधार नामांकन, पैन कार्ड, और आरटीपीएस (RTPS) से जुड़ी तमाम सेवाएं (जैसे जाति, आय, निवास प्रमाण पत्र)।
- अन्य सेवाएं: कानूनी सलाह, स्वास्थ्य सेवाएं और कृषि उपादानों की जानकारी।
ग्रामीणों की जेब और समय, दोनों की बचत
पैक्स में सीएससी सेवाएं शुरू होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नई संजीवनी मिली है।
- बिचौलियों का अंत: आरटीपीएस और आधार जैसी सेवाओं के लिए अब ग्रामीणों को दलालों के चक्कर नहीं काटने पड़ते।
- पारदर्शिता: हर सेवा का शुल्क और प्रक्रिया डिजिटल होने से भ्रष्टाचार पर लगाम लगी है।
- स्थानीय रोजगार: पैक्सों के जरिए स्थानीय स्तर पर युवाओं को काम मिला है और पैक्स की अपनी कार्यक्षमता भी बढ़ी है।
सहकारिता विभाग का मास्टरस्ट्रोक: ₹6 करोड़ का सफल बिजनेस मॉडल
सहकारिता विभाग के अनुसार, इन सेंटरों के माध्यम से अब तक ₹6 करोड़ से अधिक का ट्रांजेक्शन होना यह दर्शाता है कि ग्रामीण समाज डिजिटल रूप से सशक्त हो रहा है। विभाग का लक्ष्य हर एक पैक्स को सीएससी से जोड़ना है ताकि कोई भी गांव डिजिटल मुख्यधारा से पीछे न छूटे।
”हमारा उद्देश्य केवल अनाज खरीदना नहीं, बल्कि किसान को डिजिटल रूप से सशक्त बनाना भी है। सीएससी के माध्यम से पैक्स अब ग्रामीण समाज की रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं।”
— सहकारिता विभाग, बिहार
VOB का नजरिया: डिजिटल बिहार का ‘नया चेहरा’
अभी कल ही हमने खबर दी थी कि कैसे ‘सुधा डेयरी’ की समितियां अब बैंक मित्र बनने जा रही हैं, और आज पैक्सों का यह ₹6 करोड़ का बिजनेस मॉडल यह बता रहा है कि बिहार का ग्रामीण ढांचा पूरी तरह बदल रहा है। पैक्स अब केवल खाद-बीज तक सीमित नहीं हैं, वे गांवों के ‘आईटी हब’ बन रहे हैं।
ब्यूरो रिपोर्ट, द वॉयस ऑफ बिहार।


