बिहार के बोधगया में स्थित माता सरस्वती का यह अति प्राचीन मंदिर अपनी विशिष्टता और मान्यताओं के कारण विशेष पहचान रखता है। यहां माता सरस्वती काले पत्थरों से बनी अष्टभुजी प्रतिमा के रूप में विराजमान हैं। माता के हाथों में वीणा, शंख, पुस्तक सहित अन्य आयुध हैं और वे आशीर्वाद की मुद्रा में भक्तों को दर्शन देती हैं। यह मंदिर अपने चमत्कारों और गहरी आस्था के लिए प्रसिद्ध है। बसंत पंचमी के अवसर पर यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।
नौकरी और संतान प्राप्ति के लिए विशेष मान्यता
मंदिर की सबसे अधिक प्रसिद्धि नौकरी और संतान प्राप्ति की मन्नत को लेकर है। यहां के पुजारियों के अनुसार, माता सरस्वती चमत्कार करने वाली देवी के रूप में जानी जाती हैं। सच्चे मन से आने वाला कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं लौटता। विशेष रूप से नौकरी और संतान के लिए की गई पूजा के सफल होने की मान्यता यहां सबसे अधिक है।
पुजारी ललन प्रसाद बताते हैं,
“माता सरस्वती यहां अष्टभुजी स्वरूप में विराजमान हैं। सामान्यतः माता श्वेत रूप में पूजी जाती हैं, लेकिन यहां काले पत्थर में उनका अष्टभुजी रूप अद्भुत है। माता का स्वरूप तीनों पहर बदलता है, जो स्वयं में एक चमत्कार है।”
तीनों पहर बदलता है माता का स्वरूप
माता सरस्वती की यह प्रतिमा लगभग चार फीट ऊंची है। पुजारियों के अनुसार, माता सुबह बाल रूप में, दोपहर में युवा रूप में और संध्या के समय प्रौढ़ रूप में दर्शन देती हैं। यह परिवर्तन प्रतिदिन देखा जाता है, जिसे भक्त चमत्कार के रूप में मानते हैं।
ललन प्रसाद के अनुसार,
“यह एक गुप्त मंदिर माना जाता है, क्योंकि इसके बारे में हर किसी को जानकारी नहीं होती। यहां पहुंचना भी सहज नहीं है। कई श्रद्धालुओं ने यहां पूजा कर नौकरी और संतान प्राप्ति की मन्नत पूरी होने का अनुभव किया है। प्रतिमा को स्पर्श करने पर छन-छन की ध्वनि भी सुनाई देती है।”
युवाओं की बड़ी आस्था
इस मंदिर में बड़ी संख्या में युवा नौकरी की मन्नत लेकर पहुंचते हैं। पूजा करने आए युवक जतन शर्मा बताते हैं कि काफी प्रयासों के बावजूद उन्हें नौकरी नहीं मिल पा रही थी, ऐसे में उन्होंने यहां माता के दर्शन कर मन्नत मांगी है।
जतन शर्मा कहते हैं,
“मैं मेहनत करता हूं, लेकिन नौकरी नहीं लग रही थी। यहां के बारे में सुना कि पूजा करने से मनोकामना पूरी होती है, इसलिए दर्शन के लिए आया हूं। देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग यहां आते हैं।”
शंकराचार्य काल से जुड़ा मंदिर
ब्राह्मणी घाट के आचार्य मनोज कुमार मिश्रा के अनुसार, यह सरस्वती मंदिर शंकराचार्य काल से जुड़ा हुआ माना जाता है। माता की यह प्रतिमा अत्यंत दुर्लभ है और संभवतः अष्टभुजी स्वरूप में बनी इकलौती प्रतिमा मानी जाती है।
मनोज कुमार मिश्रा बताते हैं,
“सरस्वती माता के मंदिर वैसे ही बहुत कम हैं और जहां हैं, वहां प्रतिमा श्वेत रूप में होती है। लेकिन यहां काले पत्थर में अष्टभुजी स्वरूप की प्रतिमा अपने आप में अनूठी है।”
भगवान बुद्ध से भी जुड़ी है मान्यता
स्थानीय मान्यता के अनुसार, भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति से पूर्व माता सरस्वती के इस मंदिर के निकट वट वृक्ष के नीचे साधना की थी। कहा जाता है कि तीन दिनों की साधना के बाद माता ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए, जिसके पश्चात बोधगया में उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई।
सरस्वती तीर्थ के रूप में भी प्रसिद्ध
यह मंदिर सरस्वती तीर्थ के रूप में भी जाना जाता है और गया जी की प्रमुख पिंड वेदियों में से एक माना जाता है। पितृपक्ष मेले के दौरान और सामान्य दिनों में भी यहां पिंडदान के लिए श्रद्धालु पहुंचते हैं। यह तीर्थ निरंजना और मुहाने नदी के संगम स्थल पर स्थित है। मान्यता है कि दो नदियों के संगम पर अंतरधारा सरस्वती स्वरूप में प्रवाहित होती है।
सरस्वती तीर्थ पर पहुंचने वाले श्रद्धालु माता के दर्शन कर स्वयं को धन्य मानते हैं और पूर्वजों की मोक्ष प्राप्ति की कामना करते हैं।


