पटना: पटना हाईकोर्ट ने दहेज उत्पीड़न के एक पुराने मामले में अहम फैसला सुनाते हुए 95 वर्षीय बुजुर्ग रविंद्र चौधरी को राहत दी है। अदालत ने पाया कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप बेबुनियाद थे। कोर्ट ने साफ कहा कि कई बार विवाहित महिलाओं द्वारा पूरे ससुराल वालों पर झूठे आरोप लगाकर दहेज कानून का दुरुपयोग किया जाता है।
13 साल पुराना मामला, कोर्ट ने दी राहत
रविंद्र चौधरी के खिलाफ यह मामला 2008 में दर्ज हुआ था। लंबी सुनवाई के बाद जस्टिस पूर्णेंदु सिंह की एकलपीठ ने उनकी आपराधिक याचिका स्वीकार करते हुए मामले से उन्हें बरी कर दिया। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि निचली अदालत ने बिना उचित आधार के उनकी याचिका खारिज कर दी थी, जिसे अब रद्द कर दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के नवीनतम दिशा-निर्देशों का उल्लेख करते हुए कहा कि:
- अक्सर देखा जाता है कि विवाहिता अपने पूरे ससुराल पक्ष को दहेज प्रताड़ना के मामलों में घसीट देती हैं।
- दहेज हत्या समेत कई गंभीर कानूनों का गलत तरीके से प्रयोग हो रहा है।
कोर्ट ने इस प्रवृत्ति की कड़ी निंदा की।
क्या था मामला?
- 3 मार्च 2008 को रविंद्र चौधरी के बेटे की शादी सोनी (बदला हुआ नाम) से हुई थी।
- एक साल बाद दोनों को एक बेटा भी हुआ।
- कुछ समय बाद पति-पत्नी में विवाद बढ़ा और बहू ने दरभंगा न्यायालय में अपने पति, सास और 95 वर्षीय ससुर पर दहेज मांगने का आरोप लगाते हुए मुकदमा दायर कर दिया।
- बुजुर्ग ससुर ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर न्याय की गुहार लगाई।
हाईकोर्ट ने कहा—“झूठे मामलों से बुजुर्ग परेशान”
कोर्ट ने माना कि:
- बुजुर्ग और दूर के रिश्तेदारों को कई बार अनावश्यक रूप से मामले में शामिल कर दिया जाता है।
- ऐसे मामलों में जांच और प्रक्रिया में सुधार की ज़रूरत है।
निचली अदालत का आदेश रद्द
हाईकोर्ट ने 1 मार्च 2019 के उस आदेश को भी रद्द कर दिया जिसमें निचली अदालत ने बुजुर्ग की याचिका को खारिज कर दिया था।


